बद्रीनाथ मन्दिर
अलकनन्दा के तट पर भगवान विष्णु की तपोभूमि, चार धाम का उत्तरी धाम
बद्रीनाथ मन्दिर, जिसे बद्रीनारायण या बद्री विशाल भी कहते हैं, उत्तराखण्ड के गढ़वाल हिमालय में अलकनन्दा के किनारे, नर और नारायण पर्वतों के बीच लगभग 3,133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह चार धाम का उत्तरी धाम, 108 दिव्य देशों में से एक और उत्तराखण्ड के छोटा चार धाम का भी हिस्सा है। सर्दियों में बर्फ़ के कारण मन्दिर बन्द रहता है; साल के लगभग छह महीने श्रद्धालु यहाँ ध्यानमुद्रा में विराजमान भगवान विष्णु की काले शालिग्राम शिला की प्रतिमा के दर्शन करने आते हैं।

इतिहास
महाभारत, श्रीमद्भागवत, स्कन्द पुराण और विष्णु पुराण में बद्रिकाश्रम की महिमा गाई गई है — वह स्थान जहाँ भगवान विष्णु नर-नारायण ऋषियों के रूप में संसार के कल्याण के लिए तप करते हैं। तमिल आलवार सन्तों पेरियालवार और तिरुमंगै आलवार ने नालायिर दिव्य प्रबन्धम् (लगभग 7वीं–9वीं शताब्दी) में इसकी स्तुति की है, जहाँ इसे 'तिरुवदरियाच्चिरामम्' कहा गया है। यह श्रीवैष्णव परम्परा के 108 दिव्य देशों में गिना जाता है।
मन्दिर समिति का विवरण स्कन्द पुराण की परम्परा पर आधारित है: आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने अलकनन्दा के नारद कुण्ड से भगवान बद्रीनारायण की प्रतिमा निकालकर उसकी पुनः प्रतिष्ठा की — पहले तप्त कुण्ड के पास एक गुफा में। इसी विवरण के अनुसार सोलहवीं शताब्दी में गढ़वाल नरेश ने प्रतिमा को वर्तमान मन्दिर में स्थापित कराया। लगभग 45 किलोमीटर नीचे स्थित ज्योतिर्मठ, शंकराचार्य के चार मठों में से एक, भी इसी परम्परा की याद दिलाता है, और चारों दिशाओं के चार धाम — बद्रीनाथ, पुरी, द्वारका और रामेश्वरम — परम्परा से उन्हीं से जुड़े माने जाते हैं। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य और वल्लभाचार्य जैसे आचार्यों का भी इस धाम से सम्बन्ध रहा है।
गढ़वाल के परमार (पंवार) राजा मन्दिर के संरक्षक और नाममात्र के प्रमुख थे। उन्होंने मन्दिर को गाँव दान किए, जिनकी आय से यात्रियों के भोजन और ठहरने की व्यवस्था होती थी; यात्री राजा को 'बोलन्दा बद्रीनाथ' यानी 'बोलते बद्रीनाथ' कहकर प्रणाम करते थे। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में मन्दिर का विस्तार हुआ और 1803 के भीषण गढ़वाल भूकम्प में इसे भारी क्षति पहुँची, जिसके बाद जयपुर के राजा की सहायता से इसका बड़ा भाग फिर से बनाया गया। वाल्टर हैमिल्टन के 'ईस्ट-इंडिया गज़ेटियर' (1828) में 40–50 फ़ुट ऊँचे शंक्वाकार मन्दिर का वर्णन है, जिसे भूकम्प के बाद सहारा देकर टिकाना पड़ा था; मरम्मत का काम उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक चलता रहा।
1815 में पूर्वी गढ़वाल ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधीन आने के बाद अंग्रेज़ अधिकारी भी मन्दिर के मामलों में शामिल हो गए। यात्रियों के भोजन के लिए दान किए गए 'सदाबर्त' गाँवों की अतिरिक्त आय से कर्णप्रयाग और रुद्रप्रयाग में पुल, और यात्रा मार्ग पर दवाखाने व धर्मशालाएँ बनीं। सरकार मन्दिर के प्रबन्ध में कितना दख़ल दे, इस पर लम्बा विवाद चला। 1899 की एक व्यवस्था में प्रबन्ध रावल (मुख्य पुजारी) के हाथ में रहा और टिहरी दरबार को निगरानी के अधिकार मिले; मन्दिर समिति के अनुसार इससे मनमुटाव बढ़ा और यात्रियों की सुविधाओं की उपेक्षा हुई।
वर्तमान व्यवस्था संयुक्त प्रान्त के 'श्री बदरीनाथ तथा श्री केदारनाथ मन्दिर अधिनियम, 1939' से चली आ रही है। तब से श्री बदरीनाथ–केदारनाथ मन्दिर समिति (बीकेटीसी) बद्रीनाथ, केदारनाथ और लगभग 45 अन्य मन्दिरों का प्रबन्ध करती है, और रावल की भूमिका पूजा-अर्चना तक सीमित है। 2019 में उत्तराखण्ड सरकार ने चार धाम को देवस्थानम प्रबन्धन बोर्ड के अधीन किया था, पर तीर्थ पुरोहितों के विरोध के बाद 2021 में यह क़ानून वापस ले लिया गया और समिति की व्यवस्था बहाल हो गई।
आज बद्रीनाथ देश के सबसे व्यस्त तीर्थों में है; आधिकारिक आँकड़ों के हवाले से विकिपीडिया के अनुसार 2022 में केवल दो महीनों में लगभग 28 लाख यात्री यहाँ पहुँचे। जनवरी 2026 में बीकेटीसी अध्यक्ष ने समिति के मन्दिरों में ग़ैर-हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक का प्रस्ताव रखा, और समाचारों के अनुसार मार्च 2026 में समिति ने इस आशय का प्रस्ताव पारित किया। बद्रीनाथ धाम क्षेत्र का एक मास्टर प्लान के तहत पुनर्विकास भी हो रहा है।
पौराणिक कथा
वामन पुराण और श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान विष्णु ने धर्म और मूर्ति (दक्ष प्रजापति की पुत्री) के पुत्रों के रूप में नर-नारायण ऋषियों का अवतार लिया और बद्रिकाश्रम में सब प्राणियों के कल्याण के लिए दीर्घ तप किया। मन्दिर समिति के अनुसार उनका जन्म सहस्रकवच नामक असुर के विनाश के लिए हुआ था। घाटी के दोनों ओर खड़े नर पर्वत और नारायण पर्वत उन्हीं के नाम पर हैं, और माणा गाँव के पास माता मूर्ति का मन्दिर उनकी माता को समर्पित है।
सबसे प्रसिद्ध कथा इस धाम के नाम से जुड़ी है। जब भगवान विष्णु बर्फ़ और कड़ाके की ठण्ड से बेख़बर ध्यान में लीन थे, तब माता लक्ष्मी ने बद्री (बेर) के वृक्ष का रूप लेकर उन्हें छाया दी। ध्यान से उठकर उनकी सेवा देखी तो भगवान ने इस स्थान का नाम बद्रिकाश्रम और अपना नाम बद्रीनाथ — 'बद्री के स्वामी' — रखा। श्रद्धालु मानते हैं कि इसीलिए यहाँ माता लक्ष्मी का विशेष स्थान है, और शीतकाल में कपाट बन्द होते समय उन्हें भगवान के पास गर्भगृह में विराजमान किया जाता है।
बीकेटीसी द्वारा दिए गए स्कन्द पुराण के विवरण के अनुसार हर युग में इस क्षेत्र का अलग नाम रहा — सतयुग में मुक्तिप्रदा, त्रेता में योगसिद्धिदा, द्वापर में विशाला और कलियुग में बद्रिकाश्रम। कहा जाता है कि भगवान ने अलकनन्दा में नारद शिला के नीचे एक दिव्य प्रतिमा छोड़ी, जिसे बाद में देवताओं ने स्थापित किया और नारद मुनि को उसका पहला पुजारी बनाया। इसीलिए मान्यता है कि शीतकाल में, जब मनुष्य पुजारी चले जाते हैं, नारद जी भगवान की पूजा करते हैं। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में अनेक तीर्थ हैं, 'पर बद्री जैसा तीर्थ न हुआ है, न होगा'।
स्थानीय परम्परा इस घाटी को पाण्डवों से भी जोड़ती है। घाटी के ऊपर स्थित स्वर्गारोहिणी शिखर को वह मार्ग माना जाता है जहाँ से पाण्डवों ने स्वर्ग की अन्तिम यात्रा शुरू की, और माणा के पास भीम पुल वह शिला कही जाती है जो भीम ने द्रौपदी के लिए सरस्वती नदी पर रखी थी। माणा की व्यास गुफा को वह स्थान माना जाता है जहाँ वेदव्यास ने महाभारत की रचना की, और पास की गणेश गुफा में गणेश जी ने उसे लिखा।
स्थापत्य कला
बद्रीनाथ एक सुगठित हिमालयी मन्दिर है, जो मैदानों के विशाल पाषाण मन्दिरों से बिल्कुल अलग दिखता है। चटकीले रंगों से सजा अग्रभाग, मेहराबदार खिड़कियाँ और चौड़ी सीढ़ियाँ मुख्य द्वार 'सिंहद्वार' तक ले जाती हैं। मन्दिर समिति के अनुसार मन्दिर के तीन भाग हैं — गर्भगृह, दर्शन मण्डप जहाँ पूजा-विधि होती है, और सभा मण्डप जहाँ श्रद्धालु एकत्र होते हैं। बीकेटीसी के अनुसार मन्दिर लगभग 50 फ़ुट ऊँचा है और इसकी छत एक छोटे गुम्बद पर समाप्त होती है, जिस पर सुनहरी परत चढ़ी है।
मण्डप की दीवारों और स्तम्भों पर बारीक नक़्क़ाशी है। सोने की चादर से मढ़े छत्र के नीचे काले शालिग्राम पत्थर से बनी भगवान बद्रीनारायण की प्रतिमा पद्मासन में ध्यानमुद्रा में विराजमान है। ऊपर उठे दो हाथों में शंख और चक्र हैं, और दो हाथ योगमुद्रा में गोद में रखे हैं। गर्भगृह में उनके साथ कुबेर, गरुड़, नारद मुनि, उद्धव और नर-नारायण विराजते हैं। प्रतिमा के आकार पर स्रोत एकमत नहीं — विकिपीडिया लगभग एक फ़ुट और बीकेटीसी लगभग एक मीटर बताती है — पर सभी इसे अत्यन्त प्राचीन और स्वयम्भू मानते हैं।
मन्दिर परिसर में लगभग पन्द्रह प्रतिमाएँ हैं, जिनमें माता लक्ष्मी, गणेश, आदि केदारेश्वर, घण्टाकर्ण और आदि शंकराचार्य के मन्दिर शामिल हैं। मन्दिर के ठीक नीचे, अलकनन्दा की ओर, तप्त कुण्ड है — गर्म पानी का प्राकृतिक स्रोत, जिसमें श्रद्धालु दर्शन से पहले स्नान करते हैं; बीकेटीसी इसका तापमान लगभग 45°C बताती है। पास में ही नारद कुण्ड है, जहाँ से प्रतिमा मिली मानी जाती है, और पाँच पवित्र शिलाएँ (पंच शिला) — नारद, मार्कण्डेय, वाराही, गरुड़ और नृसिंह। थोड़ा आगे ब्रह्म कपाल है, जहाँ श्रद्धालु पितरों के लिए पिण्डदान करते हैं।
दैनिक पूजा-अर्चना
अभिषेक पूजा
लगभग सुबह 4:00/4:30–6:30दिन की शुरुआत भोर से पहले रावल जी द्वारा बद्री विशाल के अभिषेक से होती है। बीकेटीसी की दर-सूची में यह बुक की जाने वाली पूजा सुबह 4:30 से 6:30 बजे तक (नियमों में 4 बजे से) दी गई है, और श्रद्धालुओं से 15–30 मिनट पहले पहुँचने को कहा गया है। सुबह श्रद्धालुओं को पिछली रात के श्रृंगार का चन्दन निर्माल्य प्रसाद के रूप में भी मिलता है।
वेद पाठ और गीता पाठ
सुबह और दोपहरसुबह के अभिषेक के बाद दोपहर के भोग तक, और फिर लगभग 3 बजे से सायं आरती तक वेद और भगवद्गीता का पाठ होता है। बीकेटीसी की दर-सूची में गीता पाठ सुबह 7:30 से 12 बजे और दोपहर 3 से 5 बजे तक दिया गया है।
सायंकालीन आरतियाँ और पाठ
लगभग शाम 5:00–8:30शाम को कई छोटी आरतियाँ — अष्टोत्तरी, चण्डी, कर्पूर और स्वर्ण आरती — तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ होता है। बीकेटीसी के अनुसार गर्मियों में सायं आरती का क्रम मोटे तौर पर शाम 6 से 8:30 बजे तक चलता है।
गीत गोविन्द पाठ और शयन आरती
रात्रि, अन्तिम दर्शन के बाददिन का समापन जयदेव के गीत गोविन्द के गायन और शयन आरती से होता है। इसका कोई निश्चित समय नहीं — बीकेटीसी के अनुसार यह तभी शुरू होती है जब कतार में खड़े सभी यात्री दर्शन कर लें। इसके बाद आभूषण उतारकर भगवान को चन्दन का लेप लगाया जाता है।
तप्त कुण्ड स्नान और ब्रह्म कपाल पर पिण्डदान
अधिकांश यात्री मन्दिर में प्रवेश से पहले तप्त कुण्ड के गर्म जल में स्नान करते हैं। बहुत से श्रद्धालु अलकनन्दा तट पर ब्रह्म कपाल में पितरों का श्राद्ध और पिण्डदान भी करते हैं; मान्यता है कि इससे पितरों को स्थायी शान्ति मिलती है।
पाण्डुकेश्वर और ज्योतिर्मठ में शीतकालीन पूजा
नवम्बर में कपाट बन्द होने से अगले वर्ष कपाट खुलने तककपाट बन्द होने पर उद्धव जी और कुबेर जी की उत्सव मूर्तियाँ पाण्डुकेश्वर के योगध्यान बद्री मन्दिर में ले जाई जाती हैं, और आदि शंकराचार्य की गद्दी ज्योतिर्मठ के नृसिंह मन्दिर में पहुँचती है। शीतकाल में इन्हीं स्थानों पर नित्य पूजा होती है और श्रद्धालु यहाँ दर्शन कर सकते हैं।
समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।
पर्व-उत्सव
बसन्त पंचमी (जनवरी–फ़रवरी)
कपाट खुलने की तिथि की घोषणा
बसन्त पंचमी के दिन नरेन्द्रनगर स्थित टिहरी राजपरिवार के राजमहल में पंचांग देखकर बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि और मुहूर्त तय किया जाता है। इसी अवसर पर गाडू घड़ा (तेल कलश) यात्रा की तिथि भी निश्चित होती है।
अप्रैल–मई
गाडू घड़ा यात्रा और कपाटोद्घाटन
परम्परा से नरेन्द्रनगर राजमहल में पेरा गया तिल का तेल एक पवित्र कलश (गाडू घड़ा) में भरकर शोभायात्रा के साथ बद्रीनाथ लाया जाता है, जिससे पूरे यात्राकाल में भगवान का अभिषेक होता है। उद्धव जी, कुबेर जी और शंकराचार्य की गद्दी शीतकालीन स्थलों से लौटती है और घोषित मुहूर्त पर, प्रायः अक्षय तृतीया के आसपास, कपाट खुलते हैं। सर्दियों भर जलती रही अखण्ड ज्योति के दर्शन के लिए उस दिन भारी भीड़ उमड़ती है।
वामन द्वादशी (भाद्रपद, अगस्त–सितम्बर)
माता मूर्ति का मेला
यह धाम का सबसे विशिष्ट मेला है, जो नर-नारायण की माता, माता मूर्ति के सम्मान में माणा के पास उनके मन्दिर में लगता है। इस दिन उद्धव जी की उत्सव मूर्ति शोभायात्रा के साथ बद्रीनाथ से वहाँ ले जाई जाती है।
भाद्रपद (अगस्त–सितम्बर)
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
देश भर के विष्णु मन्दिरों की तरह यहाँ भी श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव विशेष पूजा और भजन-कीर्तन के साथ मनाया जाता है।
अक्टूबर–नवम्बर (तिथि विजयादशमी पर तय)
पंच पूजा और कपाट बन्द
विजयादशमी के दिन रावल और धर्माधिकारी कपाट बन्द होने की तिथि घोषित करते हैं। उससे पहले के पाँच दिनों की पंच पूजा में गणेश, आदि केदारेश्वर और शंकराचार्य गद्दी स्थल के कपाट बन्द होते हैं, वेद पाठ का समापन होता है और माता लक्ष्मी को आमन्त्रित किया जाता है। अन्तिम दिन परम्परा के अनुसार स्त्री वेश धारण कर रावल जी माता लक्ष्मी को गर्भगृह में भगवान के पास विराजमान करते हैं; उद्धव और कुबेर बाहर लाए जाते हैं, बद्री विशाल को माणा की महिलाओं द्वारा बुना घी से लिपा ऊनी 'घृत कम्बल' ओढ़ाया जाता है, अखण्ड ज्योति प्रज्वलित होती है और कपाट बन्द कर दिए जाते हैं।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग
- निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है, जो सड़क मार्ग से बद्रीनाथ से लगभग 314 किलोमीटर (करीब 10–12 घण्टे) दूर है। यात्राकाल में बद्रीनाथ हेलीपैड के लिए हेलिकॉप्टर चार्टर सेवाएँ भी चलती हैं।
- रेल मार्ग
- निकटतम रेलवे स्टेशन योगनगरी ऋषिकेश / ऋषिकेश है, जो लगभग 295 किलोमीटर दूर है; हरिद्वार (लगभग 324 किलोमीटर) और देहरादून भी विकल्प हैं। यात्राकाल में ऋषिकेश और हरिद्वार से सुबह-सुबह बद्रीनाथ के लिए बसें और साझा टैक्सियाँ मिलती हैं।
- सड़क मार्ग
- बद्रीनाथ ऋषिकेश–बद्रीनाथ राजमार्ग से देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली, ज्योतिर्मठ और पाण्डुकेश्वर होते हुए पहुँचा जाता है (ऋषिकेश से लगभग 298 किलोमीटर)। केदारनाथ से मार्ग के अनुसार दूरी लगभग 230–247 किलोमीटर है। बद्रीनाथ से लगभग 45 किलोमीटर पहले जोशीमठ (ज्योतिर्मठ) रात्रि विश्राम का लोकप्रिय पड़ाव है। उत्तराखण्ड सरकार के पोर्टल पर चार धाम यात्रा का पंजीकरण अनिवार्य है।
- दर्शन का सबसे अच्छा समय
- मन्दिर साल में लगभग छह महीने, अप्रैल के अन्त या मई से नवम्बर तक खुला रहता है; यात्रा से पहले बीकेटीसी द्वारा घोषित तिथियाँ ज़रूर देखें। मई–जून और सितम्बर–अक्टूबर सबसे सुहावने महीने हैं। जुलाई–अगस्त के मानसून में ऋषिकेश–बद्रीनाथ मार्ग पर अक्सर भूस्खलन से रास्ते बन्द होते हैं। नवम्बर के अन्त से अप्रैल तक धाम बर्फ़ से ढका और बन्द रहता है, पर तब पाण्डुकेश्वर और ज्योतिर्मठ में दर्शन किए जा सकते हैं।
तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
- यात्रा से पहले उत्तराखण्ड सरकार के पोर्टल (registrationandtouristcare.uk.gov.in) पर चार धाम यात्रा का पंजीकरण कराएँ; बीकेटीसी से पूजा बुक करने के लिए भी यह पंजीकरण और भारतीय मोबाइल नम्बर ज़रूरी है।
- दर्शन से पहले तप्त कुण्ड में स्नान करें, पर स्रोत के पास पानी बहुत गर्म होता है, इसलिए सावधानी से उतरें।
- बद्रीनाथ 3,100 मीटर से अधिक ऊँचाई पर है — एक रात जोशीमठ या नीचे रुकें, गर्मियों में भी गर्म कपड़े रखें और ऊँचाई की बीमारी से बचने के लिए खूब पानी पिएँ।
- सड़क यात्रा सुबह जल्दी शुरू करें और एक दिन अतिरिक्त रखें; विशेषकर मानसून में भूस्खलन से राजमार्ग घण्टों बन्द रह सकता है।
- माणा गाँव (लगभग 4 किलोमीटर), व्यास गुफा, गणेश गुफा, भीम पुल और माता मूर्ति मन्दिर के दर्शन भी साथ में करें।
- बीकेटीसी की बद्रीनाथ यात्री हेल्पलाइन +91-8979001008 है; राज्य आपातकालीन परिचालन केन्द्र का टोल-फ़्री नम्बर 1070 है।
इस यात्रा के लिए साथ रखें
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
बद्रीनाथ मन्दिर की कथा क्या है?
मान्यता है कि भगवान विष्णु ने यहाँ नर-नारायण के रूप में तप किया। जब वे बर्फ़ और ठण्ड से बेख़बर ध्यान में बैठे थे, तब माता लक्ष्मी बद्री (बेर) का वृक्ष बनकर उन्हें छाया देती रहीं; इसलिए भगवान ने इस स्थान को बद्रिकाश्रम और स्वयं को बद्रीनाथ कहा। कहा जाता है कि आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने नारद कुण्ड से प्रतिमा निकालकर उसकी पूजा फिर से शुरू कराई।
बद्रीनाथ के कपाट कब खुलते और बन्द होते हैं?
कपाट खुलने की तिथि हर साल बसन्त पंचमी पर नरेन्द्रनगर राजमहल में तय होती है, और कपाट प्रायः अप्रैल के अन्त या मई में अक्षय तृतीया के आसपास खुलते हैं। बन्द होने की तिथि विजयादशमी पर घोषित होती है, और पाँच दिन की पंच पूजा के बाद नवम्बर में कपाट बन्द होते हैं। तिथियाँ हर साल बदलती हैं, इसलिए बीकेटीसी की घोषणा देखें।
सर्दियों में भगवान बद्रीनाथ की पूजा कहाँ होती है?
कपाट बन्द होने पर उद्धव जी और कुबेर जी की उत्सव मूर्तियाँ पाण्डुकेश्वर के योगध्यान बद्री मन्दिर में, और आदि शंकराचार्य की गद्दी ज्योतिर्मठ के नृसिंह मन्दिर में ले जाई जाती है, जहाँ शीतकालीन पूजा होती है। मान्यता है कि बन्द मन्दिर के भीतर नारद मुनि भगवान की पूजा करते हैं और अखण्ड ज्योति जलती रहती है।
बद्रीनाथ कैसे पहुँचें?
देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे तक विमान से, या ऋषिकेश अथवा हरिद्वार तक ट्रेन से आएँ। वहाँ से अलकनन्दा घाटी में रुद्रप्रयाग और ज्योतिर्मठ होते हुए लगभग 295–325 किलोमीटर सड़क मार्ग से बद्रीनाथ पहुँचते हैं। सड़क सीधे बद्रीनाथ नगर तक जाती है और मन्दिर नदी के पार थोड़ी ही दूरी पर है।
बद्रीनाथ के पुजारी केरल से क्यों होते हैं?
बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी, रावल, पुरानी परम्परा के अनुसार केरल के नम्बूदरी ब्राह्मण होते हैं; यह प्रथा केरल में जन्मे आदि शंकराचार्य से जोड़ी जाती है। मन्दिर के अभिलेखों के अनुसार 1776 में गढ़वाल नरेश ने नम्बूदरी पुजारियों को आमन्त्रित किया था। रावल को पद पर रहते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है, और गढ़वाल के डिमरी ब्राह्मण उनकी सहायता करते हैं।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Badrinath_Temple
- https://badrinath-kedarnath.gov.in/
- https://badrinath-kedarnath.gov.in/AboutUs/shri-badrinath.aspx
- https://www.etvbharat.com/en/state/portals-of-badrinath-dham-closed-for-winter-season-enn25112504194
- https://etvbharat.com/english/bharat/badrinath-closed-for-winter-char-dham-yatra-concludes/na20221119193250521521513
- https://www.newsonair.gov.in/portals-of-badrinath-dham-closed-for-winter
- https://www.etvbharat.com/en/!state/badrinath-dham-doors-to-open-for-devotees-on-4-may-enn25020201994
- https://www.tirthayatra.org/?p=44767
- https://swarajyamag.com/amp/story/news-brief/gangotri-temple-committee-bans-non-hindu-entry-similar-restrictions-considered-for-badrinath-and-kedarnath
- https://curlytales.com/india/trending/ahead-of-char-dham-yatra-entry-of-non-hindus-banned-in-temples-including-kedarnath/