द्वारकाधीश मन्दिर (जगत मन्दिर)
गोमती और अरब सागर के संगम पर श्रीकृष्ण का राजमन्दिर, चार धाम का पश्चिमी धाम
द्वारकाधीश मन्दिर, जिसे जगत मन्दिर भी कहते हैं, गुजरात के द्वारका में उस स्थान पर स्थित है जहाँ गोमती नदी अरब सागर से मिलती है। यहाँ श्रीकृष्ण की पूजा द्वारकाधीश — द्वारका के राजा — के रूप में होती है; परम्परा के अनुसार यह वही नगरी है जिसे उन्होंने मथुरा छोड़ने के बाद बसाया। यह चार धाम का पश्चिमी धाम, सप्त पुरियों में से एक और दिव्य देश है, और इसके ऊँचे नक़्क़ाशीदार शिखर पर फहराती विशाल ध्वजा दिन में कई बार बदली जाती है।

इतिहास
महाभारत, हरिवंश और पुराणों में द्वारका को श्रीकृष्ण की राजधानी के रूप में याद किया गया है, और यह मोक्ष देने वाली सात पवित्र नगरियों (सप्त पुरी) में गिनी जाती है। तमिल आलवार सन्तों ने इसका गुणगान किया है और यह मन्दिर 108 दिव्य देशों में शामिल है। समुद्री पुरातत्वविदों ने द्वारका के तट के पास समुद्र में डूबे ढाँचों का अध्ययन किया है; विकिपीडिया के सारांश के अनुसार पत्थर के लंगर और तराशे गए खण्ड ऐतिहासिक काल के एक प्राचीन बन्दरगाह की ओर इशारा करते हैं, जो तटीय कटाव में नष्ट हो गया।
मन्दिर समिति के इतिहास के अनुसार इस धाम की शुरुआत श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ से मानी जाती है, जिन्होंने यहाँ एक स्मारक मन्दिर बनवाया। समिति मन्दिर की पहली मंज़िल पर एक ब्राह्मी शिलालेख का उल्लेख करती है और एक जीर्णोद्धार को लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व का बताती है; विकिपीडिया पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर मूल मन्दिर को अधिक से अधिक 200 ईसा पूर्व का मानता है। समिति के अनुसार आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य यहाँ आए, मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया और चौथी मंज़िल पर आद्यशक्ति का मन्दिर स्थापित किया। मन्दिर में उनकी यात्रा का स्मारक है और पास ही उनके द्वारा स्थापित माने जाने वाले चार मठों में से एक, द्वारका शारदा पीठ है।
इस मन्दिर का इतिहास बार-बार टूटने और फिर बनने का इतिहास है। समिति बारहवीं शताब्दी में चौलुक्य वंश की रानी मीनलदेवी द्वारा जीर्णोद्धार और 1241 के एक आक्रमण का उल्लेख करती है, जिसमें मन्दिर की रक्षा करते हुए पाँच ब्राह्मणों ने प्राण दिए। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 1473 में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने द्वारका के तट पर एक जहाज़ लूटे जाने के बाद यहाँ चढ़ाई की; स्थानीय राजा भीम बेट के द्वीप-दुर्ग में चले गए और नगर तथा मन्दिर को लूटकर प्रतिमा नष्ट कर दी गई। परम्परा के अनुसार उस अशान्त समय में प्रतिमा को सावित्री वाव (बावड़ी) और बेट द्वारका में छिपाकर रखा गया।
वर्तमान मन्दिर सामान्यतः पन्द्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी का माना जाता है। विकिपीडिया और समिति दोनों के अनुसार द्वारकाधीश की वर्तमान प्रतिमा 1559 में द्वारका पीठ के शंकराचार्य अनिरुद्धाश्रम ने प्रतिष्ठित की और मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया। कहा जाता है कि 1557 में पुष्टिमार्ग के आचार्य श्री विट्ठलनाथजी ने ताम्रपत्र द्वारा मन्दिर की आय का बँटवारा करके अबोटी और गुग्गली ब्राह्मणों के विवाद सुलझाए। यह व्यवस्था आज भी दिखती है — पूजा-विधि अबोटी ब्राह्मण करते हैं और ध्वजा चढ़ाने की व्यवस्था गुग्गली समाज देखता है।
अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में स्थानीय शासकों और बड़ौदा के गायकवाड़ों ने, जिनके अधीन ओखामण्डल आया, मन्दिर को संरक्षण दिया। समिति के अनुसार वाघेरों से संघर्ष में क्षतिग्रस्त शिखर की अंग्रेज़ों द्वारा मरम्मत के बाद 1861 में महाराजा खण्डेराव गायकवाड़ ने मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया, और 1903 में गायकवाड़ ने शिखर पर सोने का कलश चढ़वाया। 1958 में शंकराचार्य द्वारा जीर्णोद्धार दर्ज है, और 1960 से सरकार ने मन्दिर की देखरेख शुरू की। आज इसका प्रबन्ध गुजरात सरकार के अधीन श्री द्वारकाधीश देवस्थान समिति करती है।
हाल के वर्षों में कृष्ण-तीर्थों के मानचित्र पर द्वारका का महत्व और बढ़ा है। फ़रवरी 2024 में मुख्य भूमि को बेट द्वारका से जोड़ने वाला केबल पुल 'सुदर्शन सेतु' खुला, जिससे श्रीकृष्ण के निवास से जुड़े इस द्वीप-तीर्थ तक पहुँचना बहुत आसान हो गया है। जन्माष्टमी और होली पर मन्दिर में अपार भीड़ उमड़ती है।
पौराणिक कथा
महाभारत और हरिवंश के अनुसार जरासन्ध के बार-बार आक्रमणों के बाद श्रीकृष्ण यादवों के साथ मथुरा छोड़कर आए और देवशिल्पी विश्वकर्मा से समुद्र से प्राप्त भूमि पर द्वारका नगरी बसवाई। यह द्वारों की स्वर्णनगरी थी — 'द्वारका' नाम का अर्थ ही 'द्वार' है — और श्रीकृष्ण ने यहाँ द्वारकाधीश के रूप में राज किया। महाभारत के अनुसार श्रीकृष्ण के देह-त्याग के बाद समुद्र ने इस नगरी को अपने में समा लिया।
द्वारका की परम्परा में दुर्वासा ऋषि की एक प्रसिद्ध कथा है। वे श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के यहाँ आए और उनसे अपना रथ खींचने को कहा। रास्ते में रुक्मिणी जी को प्यास लगी, तो श्रीकृष्ण ने उनके लिए जल (परम्परा के अनुसार गंगा) प्रकट किया — पर उन्होंने ऋषि को पहले जल दिए बिना पी लिया। क्रोधित दुर्वासा ने उन्हें श्रीकृष्ण से अलग रहने का शाप दिया। श्रद्धालु मानते हैं कि इसीलिए रुक्मिणी देवी का मन्दिर नगर से लगभग 2 किलोमीटर बाहर है, द्वारकाधीश के पास नहीं, और दर्शन पूरे करने के लिए यात्री वहाँ भी जाते हैं।
एक और परम्परा द्वारका को मध्य गुजरात के डाकोर से जोड़ती है। कथा है कि भक्त बोडाणा बरसों तक हर छह महीने पैदल द्वारका आते रहे, और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण उनके साथ डाकोर चले गए, जहाँ वे रणछोड़राय के रूप में पूजे जाते हैं। मन्दिर समिति के इतिहास में 1156 की इस घटना का उल्लेख सावधानी के साथ किया गया है। श्रद्धालु यह भी मानते हैं कि सन्त-कवयित्री मीराबाई द्वारका में श्रीकृष्ण की प्रतिमा में लीन हो गईं।
मन्दिर की ध्वजा का अपना प्रतीकात्मक अर्थ है। समिति के अनुसार इसके 52 गज़ कपड़े श्रीकृष्ण की द्वारका के 52 द्वारों और 52 अधिकारियों के निवासों की याद दिलाते हैं; इस पर बने सूर्य और चन्द्रमा का अर्थ माना जाता है कि जब तक सूर्य-चन्द्र रहेंगे, श्रीकृष्ण यहाँ विराजमान रहेंगे। गोमती से मन्दिर तक की 56 सीढ़ियाँ प्राचीन नगरी के 56 प्रशासनिक विभागों (कोटि) की प्रतीक कही जाती हैं।
स्थापत्य कला
द्वारकाधीश मन्दिर चूना-पत्थर और बलुआ पत्थर से बना एक ऊँचा, बहुमंज़िला मन्दिर है, जो पश्चिम भारत की नागर (मारु-गुर्जर/चौलुक्य परम्परा से विकसित) शैली में है। विकिपीडिया और भारत सरकार के पर्यटन मन्त्रालय के अनुसार मुख्य मन्दिर पाँच मंज़िला है और 72 नक़्क़ाशीदार स्तम्भों पर टिका है। गर्भगृह, जिसे 'निज मन्दिर' कहते हैं, के आगे अन्तराल और एक विशाल स्तम्भयुक्त मण्डप है, और मन्दिर का मुख पश्चिम में समुद्र की ओर है। इसकी पूर्व-पश्चिम लम्बाई लगभग 29 मीटर और उत्तर-दक्षिण चौड़ाई लगभग 23 मीटर है।
गर्भगृह के ऊपर स्तरों में उठता, भरपूर नक़्क़ाशी वाला शिखर गुजरात के सबसे ऊँचे मन्दिर-शिखरों में है; पर्यटन मन्त्रालय इसकी ऊँचाई लगभग 78 मीटर बताता है। दीवारों, स्तम्भों और कार्निसों पर देवताओं, नर्तकियों और बेल-बूटों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं। शिखर के शीर्ष पर कलश है, जिसे समिति के अनुसार 1903 में गायकवाड़ शासकों ने स्वर्णमण्डित कराया, और उसके ऊपर विशाल त्रिकोणाकार ध्वजा फहराती है, जो हर दिन कई बार बदली जाती है।
मन्दिर के दो मुख्य द्वार हैं — उत्तर में मोक्ष द्वार, जो बाज़ार की ओर खुलता है, और दक्षिण में स्वर्ग द्वार, जहाँ से 56 सीढ़ियाँ गोमती घाट तक उतरती हैं। गर्भगृह में श्रीकृष्ण काले पत्थर की चतुर्भुज द्वारकाधीश प्रतिमा के रूप में भव्य श्रृंगार के साथ विराजमान हैं। मुख्य मन्दिर के चारों ओर देवकी, बलराम, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध, कुशेश्वर महादेव और आद्यशक्ति के छोटे मन्दिर हैं, साथ ही आदि शंकराचार्य का स्मारक भी है।
दैनिक पूजा-अर्चना
मंगला आरती और मंगला दर्शन
सुबह 6:30; दर्शन 7:00–8:00दिन की शुरुआत मंगला आरती से होती है, जिसमें श्रीकृष्ण को जगाया जाता है; इसके बाद एक घण्टे दर्शन होते हैं। सुबह 8 से 9 बजे तक अभिषेक (स्नान विधि) के लिए दर्शन बन्द रहते हैं।
श्रृंगार दर्शन और श्रृंगार आरती
सुबह 9:00–10:45भगवान का दिन भर के लिए श्रृंगार होता है। आधिकारिक समय-सारणी में श्रृंगार दर्शन 9:00 और 9:45 बजे से, बीच में स्नान भोग और श्रृंगार भोग के लिए छोटे विराम, और श्रृंगार आरती 10:30–10:45 बजे दी गई है।
ग्वाल भोग और राजभोग
सुबह 11:05–दोपहर 12:30दोपहर के भोग — ग्वाल भोग (11:05–11:20) और राजभोग (12:00–12:20), बीच में दर्शन। दोपहर 1 बजे 'अनोसर' के साथ मन्दिर भगवान के विश्राम के लिए बन्द हो जाता है।
उत्थापन और सायं दर्शन
शाम 5:00–7:15शाम 5 बजे उत्थापन के साथ — भगवान को दोपहर के विश्राम से जगाकर — मन्दिर फिर खुलता है; उत्थापन भोग (5:30–5:45) के बाद 7:15 बजे तक दर्शन होते हैं।
सन्ध्या आरती
शाम 7:30–7:45सन्ध्या भोग के बाद सायंकालीन आरती होती है। यह दिन के सबसे भीड़ भरे समयों में से एक है।
शयन आरती और मन्दिर बन्द
रात 8:30–9:30शयन भोग (8:00–8:10) और शयन आरती (8:30–8:35) के साथ भगवान को शयन कराया जाता है; बंटा भोग और अन्तिम छोटे दर्शन के बाद रात 9:30 बजे मन्दिर बन्द होता है। समिति के अनुसार त्योहारों पर समय बदल जाता है।
समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।
पर्व-उत्सव
श्रावण/भाद्रपद (अगस्त–सितम्बर)
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
मन्दिर का सबसे बड़ा उत्सव। समिति के अनुसार सुबह पंचामृत अभिषेक होता है, रात लगभग 11:30 बजे से मन्दिर में भजन-कीर्तन, आधी रात को श्रीकृष्ण जन्म का उल्लास और रात लगभग 2 बजे महाभोग। अगली सुबह 'पारणा' में बाल कृष्ण को पालने में झुलाया जाता है और श्रद्धालु बारी-बारी से पालना झुलाते हैं।
प्रतिदिन, पूरे वर्ष
ध्वजा आरोहण
श्रद्धालु मनौती के रूप में शिखर पर नई ध्वजा चढ़वाते हैं; 52 गज़ की यह ध्वजा दिन में कई बार बदली जाती है और इसकी बुकिंग द्वारका में गुग्गली ब्राह्मण ज्ञाति समिति के कार्यालय से होती है। ध्वजा चढ़ते देखना यहाँ की यात्रा का ख़ास अनुभव है।
फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)
होली और फूलडोल (धुलेटी)
होली और धुलेटी रंगों और उल्लास के साथ मनाई जाती हैं, और गुजरात भर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु — बहुत से पैदल चलकर — द्वारकाधीश के दर्शन को पहुँचते हैं।
कार्तिक (अक्टूबर–नवम्बर)
अन्नकूट और गुजराती नववर्ष
कार्तिक के पहले दिन, गुजराती नववर्ष पर, भगवान का विशेष श्रृंगार होता है और सैकड़ों व्यंजनों का अन्नकूट अर्पित किया जाता है। इसके बाद भाई बीज और लाभ पंचमी मनाई जाती हैं।
कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा (अक्टूबर–नवम्बर)
तुलसी विवाह
प्रबोधिनी एकादशी से चार दिन तक भगवान और तुलसी का विवाहोत्सव मनाया जाता है, जो कार्तिक पूर्णिमा को पूरा होता है।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग
- निकटतम हवाई अड्डे जामनगर (सड़क से लगभग 130 किलोमीटर) और पोरबन्दर (लगभग 100 किलोमीटर) हैं। लगभग 220 किलोमीटर दूर राजकोट (हीरासर) अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से अधिक उड़ानें मिलती हैं। तीनों से टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं।
- रेल मार्ग
- अहमदाबाद–ओखा रेल लाइन पर द्वारका रेलवे स्टेशन मन्दिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर है। अहमदाबाद, राजकोट, जामनगर, मुम्बई और अन्य शहरों से सीधी ट्रेनें आती हैं। स्टेशन से मन्दिर तक ऑटो-रिक्शा मिल जाते हैं।
- सड़क मार्ग
- द्वारका राष्ट्रीय राजमार्ग से जामनगर और पोरबन्दर से जुड़ा है, और जामनगर, राजकोट, पोरबन्दर, सोमनाथ तथा अहमदाबाद से राज्य परिवहन की बसें आती हैं। वाहन पुराने नगर से पहले रुक जाते हैं; आख़िरी हिस्सा बाज़ार से होते हुए मोक्ष द्वार तक पैदल चलें, या गोमती घाट से 56 सीढ़ियाँ चढ़कर आएँ।
- दर्शन का सबसे अच्छा समय
- अक्टूबर से मार्च सबसे सुहावना समय है — ठण्डी समुद्री हवा और साफ़ मौसम। जन्माष्टमी (अगस्त–सितम्बर) और होली पर सबसे ज़्यादा भीड़ और सबसे रंगीन उत्सव होते हैं, इसलिए ठहरने की बुकिंग पहले से कर लें। अप्रैल–जून में गर्मी और उमस रहती है, और जुलाई–सितम्बर के मानसून में समुद्र उफ़ान पर रहता है, जिससे नाव और द्वीप-यात्रा प्रभावित हो सकती है।
तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
- मोबाइल फ़ोन, कैमरा, बैग और जूते-चप्पल बाहर के काउंटर पर जमा करें; मन्दिर के अन्दर ये ले जाने की अनुमति नहीं है।
- बहुत से यात्रियों की तरह गोमती घाट पर स्नान या आचमन करके 56 सीढ़ियाँ चढ़ें और स्वर्ग द्वार से प्रवेश करें।
- dwarkadhish.org पर आधिकारिक समय-सारणी देख लें — हर भोग के समय दर्शन कुछ देर बन्द रहते हैं, और दोपहर 1 से शाम 5 बजे तक मन्दिर बन्द रहता है।
- शिखर पर नई ध्वजा चढ़ने का दृश्य ज़रूर देखें; ध्वजा चढ़वाना चाहें तो गुग्गली ब्राह्मण ज्ञाति समिति के कार्यालय से सम्पर्क करें।
- द्वारका यात्रा को रुक्मिणी देवी मन्दिर, बेट द्वारका (अब सुदर्शन सेतु से) और लगभग 17 किलोमीटर दूर नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से पूरा करें।
- शालीन, पारम्परिक वस्त्र पहनें, ताकि दर्शन में कोई असुविधा न हो।
इस यात्रा के लिए साथ रखें
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
द्वारकाधीश मन्दिर की कथा क्या है?
परम्परा के अनुसार श्रीकृष्ण ने समुद्र से प्राप्त भूमि पर द्वारका नगरी बसाई और द्वारकाधीश के रूप में राज किया। माना जाता है कि उनके प्रपौत्र वज्रनाभ ने यहाँ पहला मन्दिर बनवाया। वर्तमान मन्दिर मुख्यतः पन्द्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी का है, और 1473 में पुराने मन्दिर के लूटे जाने के बाद वर्तमान प्रतिमा 1559 में प्रतिष्ठित हुई।
द्वारकाधीश मन्दिर के दर्शन का समय क्या है?
मन्दिर समिति के अनुसार मन्दिर सुबह 6:30 बजे मंगला आरती से खुलता है और दोपहर 1 बजे बन्द होता है, फिर शाम 5 बजे खुलकर रात 9:30 बजे बन्द होता है। हर भोग के समय दर्शन थोड़ी देर रुकते हैं, और त्योहारों पर समय बदल जाता है।
द्वारकाधीश मन्दिर की ध्वजा दिन में कई बार क्यों बदली जाती है?
शिखर की ध्वजा श्रद्धालु मनौती के रूप में चढ़ाते हैं, इसलिए हर दिन कई नई ध्वजाएँ फहराई जाती हैं। यह 52 गज़ कपड़े से बनती है, और इस पर बने सूर्य-चन्द्र का अर्थ माना जाता है कि जब तक सूर्य और चन्द्रमा हैं, श्रीकृष्ण द्वारका में रहेंगे।
द्वारकाधीश मन्दिर कैसे पहुँचें?
द्वारका रेलवे स्टेशन मन्दिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर है। निकटतम हवाई अड्डे जामनगर (लगभग 130 किलोमीटर) और पोरबन्दर (लगभग 100 किलोमीटर) हैं। जामनगर, राजकोट, पोरबन्दर और सोमनाथ से बसें और टैक्सियाँ द्वारका आती हैं।
क्या द्वारकाधीश मन्दिर चार धाम में शामिल है?
हाँ। द्वारका चार धाम का पश्चिमी धाम है; उत्तर में बद्रीनाथ, पूर्व में पुरी और दक्षिण में रामेश्वरम अन्य तीन धाम हैं। चारों धाम परम्परा से आदि शंकराचार्य से जुड़े हैं, जिनकी द्वारका शारदा पीठ पास ही है।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Dwarkadhish_Temple
- https://www.dwarkadhish.org/
- https://www.dwarkadhish.org/jagad-mandir/time-table/
- https://www.dwarkadhish.org/home/little-history/
- https://www.dwarkadhish.org/jagad-mandir/dwaja-arohan/
- https://www.dwarkadhish.org/jagad-mandir/krishna-janmotsav/
- https://www.dwarkadhish.org/jagad-mandir/other-important-celebrations/
- https://incredibleindia.gov.in/en/gujarat/dwarka/dwarkadhish-temple