पंचांग क्या है
हिंदू पंचांग के पाँच अंग: तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण
पंचांग का अर्थ है 'पाँच अंग'। यह हिंदू परंपरा का दैनिक कालदर्शक है, जिसमें हर दिन के लिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण दिए जाते हैं। ये पाँचों सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से निकाले जाते हैं, और इन्हीं के आधार पर त्योहार, व्रत और शुभ मुहूर्त तय होते हैं।
पंचांग क्या होता है
घर में टँगे किसी भी हिंदू कैलेंडर को देखिए, तो हर तारीख के साथ कुछ छोटे-छोटे शब्द लिखे मिलते हैं: तिथि, नक्षत्र, योग, करण। वार यानी दिन के साथ मिलकर यही पाँच अंग पंचांग कहलाते हैं। हर अंग उस दिन सूर्य और चंद्रमा की स्थिति को अलग ढंग से बताता है।
यह परंपरा पुरानी है, पर इसकी गणना खगोलीय है, रहस्यमय नहीं। चंद्रमा तारों के बीच रोज़ लगभग बारह-तेरह अंश आगे बढ़ता है, सूर्य से कहीं तेज़। पंचांग के लगभग सारे अंग इसी गति के अलग-अलग पहलू नापते हैं। सूर्योदय और चंद्रमा की स्थिति स्थान के साथ बदलती है, इसलिए पंचांग हर शहर के लिए अलग बनता है। यही कारण है कि कोई पर्व दिल्ली और चेन्नई में, या भारत और अमेरिका में, अलग-अलग दिन पड़ सकता है।
पारंपरिक पंचांग में सूर्योदय-सूर्यास्त, चंद्र राशि, ग्रहण, पर्व-त्योहार, व्रत और शुभ-अशुभ समय भी दिए रहते हैं। इसका असली काम हमेशा व्यावहारिक रहा है: परिवार को बताना कि व्रत कब रखें, श्राद्ध कब करें और किसी महत्वपूर्ण काम की शुरुआत कब करें।
तिथि: चांद्र दिवस
चंद्रमा जितने समय में सूर्य से बारह अंश आगे निकलता है, उसे एक तिथि कहते हैं। अमावस्या को सूर्य और चंद्रमा साथ होते हैं। फिर चंद्रमा आगे बढ़ता है और हर बारह अंश के अंतर पर एक तिथि पूरी होती है। 180 अंश पर पूर्णिमा आती है और 360 अंश पर फिर अमावस्या। इस तरह एक चांद्र मास में तीस तिथियाँ होती हैं: पंद्रह शुक्ल पक्ष में और पंद्रह कृष्ण पक्ष में।
चंद्रमा की गति एक-सी नहीं रहती, इसलिए तिथि की लंबाई भी तय नहीं होती। यह लगभग 19 से 26 घंटे तक की हो सकती है। इसी कारण तिथियाँ अंग्रेज़ी तारीखों से मेल नहीं खातीं। परंपरा में सूर्योदय के समय जो तिथि हो (उदया तिथि), वही पूरे दिन की तिथि मानी जाती है। कभी कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है; उसे क्षय तिथि कहते हैं। कभी एक ही तिथि दो सूर्योदयों तक रहती है; उसे अधिक या वृद्धि तिथि कहते हैं।
पंद्रह तिथियों के नाम दोनों पक्षों में दोहराए जाते हैं, और परंपरा इन्हें पाँच वर्गों में बाँटती है: नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा। रिक्ता यानी 'खाली' तिथियाँ, चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी, नए काम की शुरुआत के लिए परंपरा से टाली जाती हैं, हालाँकि गणेश चतुर्थी और राम नवमी जैसे बड़े पर्व भी इन्हीं पर आते हैं। बहुत-से व्रत तिथियों से बँधे हैं, जिनमें एकादशी सबसे प्रमुख है।
तीस तिथियाँ
नीचे एक चांद्र मास की सभी तीस तिथियाँ क्रम से दी गई हैं, साथ में हर तिथि का पारंपरिक वर्ग और उस पर पड़ने वाले कुछ प्रमुख व्रत-पर्व। कृष्ण पक्ष के पर्वों में महीने का नाम इस पर निर्भर करता है कि क्षेत्र अमांत गणना मानता है या पूर्णिमांत; जहाँ फ़र्क पड़ता है, वहाँ उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत महीना लिखा गया है।
- शुक्ल प्रतिपदा (1)
- नन्दा वर्ग। बढ़ते चंद्रमा का पहला दिन। कई क्षेत्रों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से चांद्र नववर्ष शुरू होता है (गुड़ी पड़वा, उगादि)। चैत्र और आश्विन की प्रतिपदा पर नवरात्रि का कलश-स्थापन होता है।
- शुक्ल द्वितीया (2)
- भद्रा वर्ग। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भाई दूज (यम द्वितीया) मनाई जाती है।
- शुक्ल तृतीया (3)
- जया वर्ग। वैशाख शुक्ल तृतीया अक्षय तृतीया है और श्रावण शुक्ल तृतीया हरियाली तीज।
- शुक्ल चतुर्थी (4)
- रिक्ता वर्ग। हर महीने विनायक चतुर्थी; भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी।
- शुक्ल पंचमी (5)
- पूर्णा वर्ग। माघ शुक्ल पंचमी बसंत पंचमी है और श्रावण शुक्ल पंचमी नाग पंचमी।
- शुक्ल षष्ठी (6)
- नन्दा वर्ग। स्कंद (कार्तिकेय) को समर्पित; कार्तिक शुक्ल षष्ठी छठ पूजा का मुख्य दिन है।
- शुक्ल सप्तमी (7)
- भद्रा वर्ग। सूर्य से जुड़ी तिथि; माघ शुक्ल सप्तमी रथ सप्तमी कहलाती है।
- शुक्ल अष्टमी (8)
- जया वर्ग। चैत्र और आश्विन नवरात्रि की दुर्गा अष्टमी इसी तिथि पर होती है।
- शुक्ल नवमी (9)
- रिक्ता वर्ग। चैत्र शुक्ल नवमी राम नवमी है और आश्विन शुक्ल नवमी महानवमी।
- शुक्ल दशमी (10)
- पूर्णा वर्ग। आश्विन शुक्ल दशमी विजयादशमी (दशहरा) है।
- शुक्ल एकादशी (11)
- नन्दा वर्ग। भगवान विष्णु का व्रत-दिवस; आषाढ़ की देवशयनी और कार्तिक की प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी विशेष प्रसिद्ध हैं।
- शुक्ल द्वादशी (12)
- भद्रा वर्ग। परंपरा से एकादशी व्रत का पारण इसी दिन होता है।
- शुक्ल त्रयोदशी (13)
- जया वर्ग। दोनों पक्षों की त्रयोदशी को संध्या समय शिवजी का प्रदोष व्रत रखा जाता है।
- शुक्ल चतुर्दशी (14)
- रिक्ता वर्ग। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अनंत चतुर्दशी है और वैशाख शुक्ल चतुर्दशी नृसिंह जयंती।
- पूर्णिमा (15)
- पूर्णा वर्ग। शुक्ल पक्ष का अंतिम दिन। गुरु पूर्णिमा (आषाढ़), रक्षा बंधन (श्रावण), शरद पूर्णिमा (आश्विन) और कार्तिक पूर्णिमा, सब पूर्णिमा पर ही आते हैं।
- कृष्ण प्रतिपदा (1)
- नन्दा वर्ग। घटते चंद्रमा का पहला दिन; पूर्णिमांत पद्धति में इसी दिन से नया महीना शुरू होता है।
- कृष्ण द्वितीया (2)
- भद्रा वर्ग।
- कृष्ण तृतीया (3)
- जया वर्ग।
- कृष्ण चतुर्थी (4)
- रिक्ता वर्ग। गणेशजी की संकष्टी चतुर्थी; करवा चौथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (पूर्णिमांत गणना) को होता है।
- कृष्ण पंचमी (5)
- पूर्णा वर्ग।
- कृष्ण षष्ठी (6)
- नन्दा वर्ग।
- कृष्ण सप्तमी (7)
- भद्रा वर्ग।
- कृष्ण अष्टमी (8)
- जया वर्ग। हर महीने कालाष्टमी; भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (पूर्णिमांत) को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी।
- कृष्ण नवमी (9)
- रिक्ता वर्ग।
- कृष्ण दशमी (10)
- पूर्णा वर्ग।
- कृष्ण एकादशी (11)
- नन्दा वर्ग। महीने की दूसरी एकादशी का व्रत।
- कृष्ण द्वादशी (12)
- भद्रा वर्ग। कृष्ण एकादशी के व्रत का पारण।
- कृष्ण त्रयोदशी (13)
- जया वर्ग। प्रदोष व्रत; दीपावली से पहले की त्रयोदशी धनतेरस होती है।
- कृष्ण चतुर्दशी (14)
- रिक्ता वर्ग। हर महीने मासिक शिवरात्रि; महाशिवरात्रि और नरक चतुर्दशी दोनों कृष्ण चतुर्दशी हैं।
- अमावस्या (15)
- पूर्णा वर्ग। कृष्ण पक्ष का अंत (अमांत पद्धति में महीने का भी अंत)। पितरों के तर्पण का दिन; दीपावली की लक्ष्मी पूजा कार्तिक अमावस्या को होती है।
वार: सप्ताह का दिन
वार (वासर) यानी सप्ताह का दिन, पंचांग का एकमात्र अंग है जिसके लिए कोई गणना नहीं करनी पड़ती। सातों दिनों के नाम सात दिखाई देने वाले आकाशीय पिंडों पर हैं: रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्र), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार या बृहस्पतिवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र) और शनिवार (शनि)। पंचांग में दिन परंपरा से आधी रात से नहीं, सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक गिना जाता है।
लोक-भक्ति में हर वार किसी देवता से जुड़ा है। सोमवार का व्रत शिवजी के लिए, मंगलवार हनुमानजी के लिए, गुरुवार विष्णु और बृहस्पति के लिए, और शनिवार शनिदेव तथा हनुमानजी के लिए रखा जाता है। ये भक्ति की परंपराएँ हैं; परिवार और क्षेत्र के अनुसार इनमें अंतर मिलता है।
नक्षत्र: चंद्रमा का तारा
आकाश में चंद्रमा के मार्ग को 13°20′ के 27 बराबर भागों में बाँटा गया है, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं: अश्विनी से रेवती तक। चंद्रमा लगभग 27.3 दिन में आकाश का एक चक्कर पूरा करता है, इसलिए हर नक्षत्र में लगभग एक दिन रहता है। उस दिन का नक्षत्र वही भाग है जिससे चंद्रमा गुज़र रहा होता है। हर नक्षत्र के 3°20′ के चार चरण (पद) होते हैं, यानी कुल 108 चरण।
जन्म के नक्षत्र से परंपरागत रूप से नाम का पहला अक्षर सुझाया जाता है। कई पर्व तिथि और नक्षत्र दोनों से तय होते हैं; जैसे ओणम श्रवण (तिरुवोणम्) नक्षत्र से गिना जाता है। सभी 27 नक्षत्रों की सूची, उनके देवता और प्रतीक हमारे अलग पृष्ठ पर दिए गए हैं।
योग और करण
यहाँ 'योग' का अर्थ आसन या ध्यान वाला योग नहीं है। सूर्य और चंद्रमा के भोगांश (देशांतर) को जोड़कर कुल को 13°20′ के 27 भागों में बाँटने से जो क्रमांक निकलता है, वही योग है। 27 योग विष्कम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य से शुरू होकर सिद्धि, शिव, सिद्ध, शुभ होते हुए ब्रह्म, ऐन्द्र (माहेन्द्र) और वैधृति तक जाते हैं। पंचांग परंपरा में व्यतीपात और वैधृति जैसे कुछ योग शुभ कार्य आरंभ करने के लिए उचित नहीं माने जाते।
करण तिथि का आधा भाग है, यानी सूर्य से चंद्रमा का छह अंश आगे बढ़ना। इसलिए एक चांद्र मास में साठ करण होते हैं। करणों के ग्यारह नाम हैं। सात 'चर' करण हैं: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि (जिसे भद्रा भी कहते हैं)। ये आठ बार दोहराए जाकर 56 अर्ध-तिथियाँ भरते हैं। बाकी चार 'स्थिर' करण हमेशा एक ही जगह आते हैं: शकुनि कृष्ण चतुर्दशी के उत्तरार्ध में, चतुष्पद और नाग अमावस्या के दोनों भागों में, और किंस्तुघ्न शुक्ल प्रतिपदा के पूर्वार्ध में। विष्टि यानी भद्रा करण में शुभ काम की शुरुआत परंपरा से टाली जाती है; इसी कारण रक्षा बंधन और होलिका दहन के समय पंचांग में 'भद्रा' का समय विशेष रूप से बताया जाता है।
राहु काल
राहु काल रोज़ का लगभग डेढ़ घंटे का वह समय है जिसे परंपरा, विशेषकर दक्षिण भारत में, नया काम शुरू करने के लिए उचित नहीं मानती। इसे निकालने के लिए स्थानीय सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ बराबर भागों में बाँटा जाता है। पहला भाग कभी राहु काल नहीं होता; बाकी सात में से कौन-सा भाग होगा, यह वार पर निर्भर करता है।
सूर्योदय-सूर्यास्त साल भर और जगह-जगह बदलते हैं, इसलिए नीचे दिया गया समय सिर्फ़ सुबह 6 से शाम 6 वाले दिन का उदाहरण है। सटीक समय स्थानीय पंचांग में देखें। परंपरा यह भी कहती है कि जो काम पहले से चल रहा है वह सामान्य रूप से जारी रह सकता है; नियम केवल नई शुरुआत के बारे में है।
- रविवार
- दिन का आठवाँ भाग (सुबह 6 से शाम 6 के दिन में लगभग 4:30–6:00 बजे)
- सोमवार
- दूसरा भाग (लगभग सुबह 7:30–9:00)
- मंगलवार
- सातवाँ भाग (लगभग दोपहर 3:00–4:30)
- बुधवार
- पाँचवाँ भाग (लगभग दोपहर 12:00–1:30)
- गुरुवार
- छठा भाग (लगभग दोपहर 1:30–3:00)
- शुक्रवार
- चौथा भाग (लगभग सुबह 10:30–दोपहर 12:00)
- शनिवार
- तीसरा भाग (लगभग सुबह 9:00–10:30)
मुहूर्त: शुभ समय का चयन
मुहूर्त समय की एक इकाई भी है और शुभ क्षण भी। इकाई के रूप में यह दिन-रात का तीसवाँ भाग है, लगभग 48 मिनट। मनुस्मृति पुराना माप बताती है: अठारह निमेष की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला का एक मुहूर्त और तीस मुहूर्त का एक दिन-रात। सूर्योदय से पहले का ब्रह्म मुहूर्त परंपरा में प्रार्थना, अध्ययन और ध्यान के लिए सबसे उत्तम माना गया है।
बोलचाल में 'मुहूर्त' का अर्थ है किसी विशेष काम के लिए अनुकूल माना गया समय: विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, व्यापार की शुरुआत या वाहन ख़रीदना। पुरोहित और ज्योतिषी पाँचों अंगों को मिलाकर यह समय चुनते हैं: उपयुक्त तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण, और साथ ही राहु काल व भद्रा जैसे समय से बचते हुए। अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रीय पंचांगों के नियम अलग हैं, इसलिए दो स्रोतों में थोड़ा अलग मुहूर्त मिलना स्वाभाविक है। यह परंपरा और आस्था का विषय है, और बहुत-से परिवार अपने कुल-पुरोहित से ही पूछते हैं।
निमेषा दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ताः कला । त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यादहोरात्रं तु तावतः ॥ १.६४ ॥
nimeṣā daśa cāṣṭau ca kāṣṭhā triṃśat tu tāḥ kalā | triṃśat kalā muhūrtaḥ syād ahorātraṃ tu tāvataḥ || 1.64 ||
अर्थ: अठारह निमेष की एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला का एक मुहूर्त, और उतने ही (तीस) मुहूर्तों का एक दिन-रात। (मनुस्मृति 1.64)
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
पंचांग के पाँच अंग कौन-से हैं?
तिथि (चांद्र दिवस), वार (सप्ताह का दिन), नक्षत्र (चंद्रमा जिस तारा-समूह में हो), योग (सूर्य और चंद्रमा के भोगांश के जोड़ से निकला मान) और करण (आधी तिथि)।
तिथि की गणना कैसे होती है?
चंद्रमा जब-जब सूर्य से 12 अंश आगे बढ़ता है, एक तिथि पूरी होती है। ऐसे तीस चरणों में एक अमावस्या से अगली अमावस्या आती है, यानी 15 शुक्ल और 15 कृष्ण तिथियाँ।
तिथि कभी दो दिन क्यों पड़ती है और कभी छूट क्यों जाती है?
तिथि 19 से 26 घंटे तक की हो सकती है और सूर्योदय की तिथि ही दिन की तिथि मानी जाती है। इसलिए लंबी तिथि दो सूर्योदय छू लेती है (अधिक तिथि) और छोटी तिथि एक भी नहीं (क्षय तिथि)।
राहु काल कैसे निकालते हैं?
स्थानीय सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को आठ बराबर भागों में बाँटें। सोमवार को दूसरा, मंगलवार को सातवाँ, बुधवार को पाँचवाँ, गुरुवार को छठा, शुक्रवार को चौथा, शनिवार को तीसरा और रविवार को आठवाँ भाग राहु काल होता है।
एक मुहूर्त कितने समय का होता है?
समय की इकाई के रूप में मुहूर्त दिन-रात का 30वाँ भाग, यानी लगभग 48 मिनट है। आम बोलचाल में 'शुभ मुहूर्त' का अर्थ पंचांग से चुना गया अनुकूल समय है।
अलग शहरों के पंचांग में समय अलग क्यों होता है?
तिथि बदलने का क्षण हर जगह एक ही होता है, पर सूर्योदय नहीं। दिन की तिथि सूर्योदय से तय होती है और राहु काल स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त पर निर्भर है, इसलिए पंचांग हर स्थान के लिए अलग बनाया जाता है।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Panchangam
- https://en.wikipedia.org/wiki/Tithi
- https://en.wikipedia.org/wiki/Karana_(pancanga)
- https://en.wikipedia.org/wiki/Rahukaalam
- https://en.wikipedia.org/wiki/Muhurta
- https://en.wikipedia.org/wiki/Hindu_calendar
- https://en.wikipedia.org/wiki/Nakshatra
- https://sa.wikisource.org/wiki/मनुस्मृतिः/प्रथमोध्यायः
अंतिम शोध: 2026-10-29