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जय गणेश देवा आरती

हर शुभ कार्य के आरम्भ में गाई जाने वाली विघ्नहर्ता की प्रिय आरती

'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा' भगवान गणेश की सबसे लोकप्रिय हिन्दी आरती है। गणेशजी विघ्नहर्ता हैं और हर पूजा में सबसे पहले पूजे जाते हैं। पाँच छोटे छन्दों में इसमें उनके माता-पिता, एकदन्त रूप, मूषक-वाहन, प्रिय भोग और दयालुता का वर्णन है। अन्तिम छन्द में 'सूर श्याम' की छाप है, जिसके आधार पर इसे लोक में सूरदास से जोड़ा जाता है।

जय गणेश देवा आरती
Ashish Suryavanshi858, Ganesh Chaturthi puja, Wikimedia Commons, CC0 Wikimedia Commons

आरती

नीचे दिया गया पाठ sanskritdocuments.org के आरती-संग्रह के अनुसार है और हर पंक्ति को द्रिक पंचांग से मिलाया गया है। नीचे दिए छोटे अन्तरों को छोड़कर दोनों में पाँचों छन्द एक जैसे हैं। गाते समय प्रायः हर पंक्ति दोहराई जाती है और हर छन्द के बाद 'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा, माता जाकी पारवती पिता महादेवा' की टेक आती है।

  1. जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा । माता जाकी पारवती पिता महादेवा ॥

    jay gaṇeś jay gaṇeś jay gaṇeś devā | mātā jākī pāravatī pitā mahādevā ||

    अर्थ: हे गणेश देव, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं।

  2. एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी । माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी ॥

    ekadant dayāvant cārabhujādhārī | māthe par tilak sohe mūse kī savārī ||

    अर्थ: आप एक दाँत वाले, दयालु और चार भुजाओं वाले हैं; आपके माथे पर तिलक शोभित है और चूहा आपकी सवारी है।

  3. पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा । लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा ॥

    pān caṛhe phal caṛhe aur caṛhe mevā | laḍḍuan kā bhog lage sant kareṃ sevā ||

    अर्थ: आपको पान, फल और मेवे चढ़ते हैं; लड्डुओं का भोग लगता है और संत आपकी सेवा करते हैं।

  4. अंधे को आँख देत कोढ़िन को काया । बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया ॥

    aṃdhe ko āṃkh det koṛhin ko kāyā | bāṃjhan ko putr det nirdhan ko māyā ||

    अर्थ: आप अन्धों को आँखें और कोढ़ से पीड़ितों को स्वस्थ काया देते हैं; निःसन्तान को सन्तान और निर्धन को धन देते हैं।

  5. 'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा । जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥

    'sūr' śyām śaraṇ āe saphal kīje sevā | jay gaṇeś jay gaṇeś jay gaṇeś devā ||

    अर्थ: 'सूर' और श्याम आपकी शरण में आए हैं, उनकी सेवा सफल कीजिए। हे गणेश देव, आपकी जय हो!

एक अतिरिक्त छन्द

द्रिक पंचांग कोष्ठक में एक और छन्द देता है, जो कुछ क्षेत्रों और परिवारों में गाया जाता है। sanskritdocuments.org के पाठ में यह नहीं है।

  1. दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी । कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥

    dīnan kī lāj rākho, śambhu sutavārī | kāmanā ko pūrṇ karo, jag balihārī ||

    अर्थ: कुछ पाठों में जुड़ा अतिरिक्त छन्द: 'हे शम्भु-पुत्र, दीनों की लाज रखिए; हमारी कामनाएँ पूरी कीजिए, सारा जगत आप पर बलिहारी है।'

पाठभेद

आरती मुख्यतः मौखिक परम्परा में जीवित है, इसलिए छोटे अन्तर आम हैं:

छन्द 2: 'माथे पर तिलक सोहे'
बहुत से लोग 'माथे पर सिन्दूर सोहे' गाते हैं; द्रिक पंचांग दोनों पाठ देता है।
छन्द 3: 'पान चढ़े फल चढ़े'
द्रिक पंचांग में 'पान चढ़े फूल चढ़े' है, और 'हार चढ़े, फूल चढ़े' भी दिया है।
छन्द 1: 'पारवती'
कुछ पाठों में मानक हिन्दी 'पार्वती' छपा है; 'पारवती' पुराना, गाया जाने वाला रूप है।
छन्द 5 की दूसरी पंक्ति
द्रिक पंचांग में इस छन्द का अन्त 'जय गणेश…' की जगह 'माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा' से होता है।

रचयिता कौन?

आरती में रचयिता का नाम सीधे नहीं आता। अन्तिम छन्द में 'सूर श्याम' की छाप है, जिसके कारण बहुत सी भक्ति-पुस्तकें इसे सोलहवीं शताब्दी के ब्रज के प्रज्ञाचक्षु कृष्णभक्त कवि सूरदास की रचना बताती हैं। यह मान्यता केवल इसी छाप पर टिकी है। इस पद को 'सूर और श्याम', दो नामों के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, इसलिए रचयिता को 'परम्परा से' कहना ही उचित है।

उत्पत्ति जो भी हो, आज यह आरती उत्तर भारत और विदेशों के करोड़ों घरों की नित्य पूजा का अंग है, और गणेश चतुर्थी के सार्वजनिक पण्डालों में गूँजती है। महाराष्ट्र में समर्थ रामदास से जोड़ी जाने वाली मराठी आरती 'सुखकर्ता दुःखहर्ता' का भी ऐसा ही स्थान है, और दोनों प्रायः साथ गाई जाती हैं।

भाव और बिम्ब

यह आरती कुछ ही रेखाओं में गणेशजी का चित्र खींचती है। वे पार्वती और महादेव के पुत्र हैं; एकदन्त हैं, क्योंकि पुराण-कथाओं के अनुसार उनका एक दाँत टूट गया था; दयावन्त और चतुर्भुज हैं; माथे पर तिलक या सिन्दूर है; और मूषक पर सवार हैं, वह छोटा जीव जो कहीं भी पहुँच जाता है, चंचल मन पर विजय का प्रतीक। तीसरा छन्द उनके प्रिय सरल चढ़ावों की सूची है: पान, फल, मेवा और सबसे बढ़कर लड्डू (कई क्षेत्रों में मोदक), और संत उनकी सेवा में लगे हैं।

चौथा छन्द उनकी कृपा बताता है: अन्धे को आँखें, रोगी को स्वस्थ काया, निःसन्तान को सन्तान और निर्धन को धन। अन्तिम छन्द में कवि शरण लेकर अपनी सेवा सफल करने की विनती करता है, और यही आरती का पूरा भाव है।

गणेशजी की आरती सबसे पहले क्यों

हिन्दू पूजा में गणेशजी प्रथम पूज्य हैं, क्योंकि वे विघ्नहर्ता और हर शुभारम्भ के स्वामी हैं। विवाह, गृहप्रवेश, नए व्यापार या विद्यालय के पहले दिन से पहले परिवार उनका आवाहन करते हैं। इसी कारण आरतियों के क्रम में प्रायः पहले गणेशजी की आरती होती है, फिर लक्ष्मी, विष्णु, शिव या देवी की। गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) और उसके बाद के दस दिनों में सुबह-शाम उनकी प्रतिमा के सामने यह आरती गाई जाती है।

आरती की विधि

1. थाली में दीपक (घी या कपूर), फूल, दूर्वा, धूप और लड्डू या मोदक का भोग सजाएँ। 2. गणेशजी की प्रतिमा के सामने खड़े होकर घण्टी बजाएँ। 3. पाँचों छन्द गाते हुए दीपक को दक्षिणावर्त घुमाएँ और हर छन्द के बाद टेक दोहराएँ। 4. सब उपस्थित लोगों को आरती दें; वे लौ पर हथेलियाँ घुमाकर आँखों से लगाएँ। 5. लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद बाँटें।

आरती एक बार पूरी गाई जाती है। बुधवार और चतुर्थी तिथियाँ, विशेषकर संकष्टी चतुर्थी, गणेशजी को विशेष प्रिय मानी जाती हैं।

परम्परा में वर्णित फल

चौथा छन्द स्वयं परम्परागत आशीर्वाद गिनाता है: आरोग्य, सन्तान, समृद्धि। भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से गणेशजी की आरती गाने से नए कार्यों के विघ्न दूर होते हैं, घर में बुद्धि और सौभाग्य आता है, और आगे होने वाली सारी पूजा सफल होती है। सभी आरतियों की तरह ये श्रद्धा की बातें हैं; बहुत से परिवारों के लिए इसका सबसे बड़ा उपहार साथ मिलकर गाने का आनन्द है।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

जय गणेश देवा आरती किसने लिखी?

आरती में रचयिता का नाम नहीं है, पर अन्तिम छन्द में 'सूर श्याम' की छाप है, इसलिए इसे लोक में सूरदास की रचना माना जाता है। यह मान्यता परम्परागत है।

'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा' का अर्थ क्या है?

'हे गणेश देव, आपकी जय हो, जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं।' आगे आरती उनके रूप, प्रिय भोग और दयालुता का वर्णन करती है।

गणेश जी की आरती कब करनी चाहिए?

किसी भी पूजा के आरम्भ या अन्त में, रोज़ सुबह-शाम, बुधवार को, संकष्टी और विनायक चतुर्थी पर, और पूरे गणेश उत्सव में।

'माथे पर तिलक सोहे' या 'माथे पर सिन्दूर सोहे', कौन सा सही है?

दोनों गाए जाते हैं। sanskritdocuments.org के पाठ में 'तिलक' है; बहुत से परिवार 'सिन्दूर' गाते हैं, और द्रिक पंचांग दोनों देता है।

गणेशजी की पूजा सबसे पहले क्यों होती है?

विघ्नहर्ता और शुभारम्भ के स्वामी होने के कारण गणेशजी प्रथम पूज्य हैं, ताकि हर कार्य बिना बाधा के पूरा हो।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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