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महामृत्युंजय मन्त्र

त्रिनेत्रधारी शिव से अमृत की प्रार्थना करने वाला ऋग्वेद का महामन्त्र

महामृत्युंजय मन्त्र, जिसे त्र्यम्बक मन्त्र या रुद्र मन्त्र भी कहते हैं, ऋग्वेद के सातवें मण्डल (7.59.12) का मन्त्र है। इसके ऋषि वसिष्ठ और देवता त्र्यम्बक रुद्र (शिव) हैं। इसमें प्रार्थना है कि जैसे पकी ककड़ी बेल से सहज छूट जाती है, वैसे ही हम मृत्यु से छूटें, पर अमृत से नहीं। आरोग्य, रक्षा और शान्ति के लिए इसका प्रायः 108 बार जप होता है।

महामृत्युंजय मन्त्र
Savitr1915, Trimbakeshwar temple, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 Wikimedia Commons

मन्त्र: पंक्ति-दर-पंक्ति

नीचे दिया गया पाठ संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध ऋग्वेद 7.59 के अनुसार है (स्वर-चिह्न हटाकर)। जप करते समय बहुत से लोग आरम्भ में 'ॐ' जोड़ते हैं। कुछ अनुष्ठानों में बीजाक्षरों से सम्पुटित लम्बे रूप भी प्रचलित हैं, किन्तु वे बाद के तन्त्र-ग्रन्थों से आए हैं और आचार्यों के अनुसार बदलते हैं, इसलिए उन्हें यहाँ नहीं दिया गया है।

  1. त्र्यम्बकं यजामहे

    tryambakaṃ yajāmahe

    अर्थ: हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले भगवान शिव) की उपासना करते हैं।

  2. सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।

    sugandhiṃ puṣṭivardhanam |

    अर्थ: जो सुगन्धि-युक्त हैं (जिनकी पुण्य-कीर्ति चारों ओर फैली है) और जो पुष्टि, अर्थात् पोषण और समृद्धि, बढ़ाने वाले हैं।

  3. उर्वारुकमिव बन्धनान्

    urvārukamiva bandhanān

    अर्थ: जैसे पका हुआ ककड़ी (उर्वारुक) का फल अपनी बेल के बन्धन से …

  4. मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

    mṛtyormukṣīya māmṛtāt ||

    अर्थ: … सहज ही छूट जाता है, वैसे ही मैं मृत्यु से मुक्त हो जाऊँ, किन्तु अमृत (अमरत्व, मोक्ष) से कभी अलग न होऊँ।

पूर्ण मन्त्र

एक साथ पूरा मन्त्र इस प्रकार है:

  1. त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

    tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭivardhanam | urvārukamiva bandhanānmṛtyormukṣīya māmṛtāt ||

    अर्थ: ऋग्वेद (7.59.12) में प्रकाशित पूर्ण मन्त्र। भावार्थ: हम सुगन्धित और पुष्टि बढ़ाने वाले त्र्यम्बक का यजन करते हैं। जैसे ककड़ी बेल से छूट जाती है, वैसे ही हम मृत्यु के बन्धन से छूटें, अमृत से नहीं।

मन्त्र का स्रोत

यह मन्त्र ऋग्वेद के सातवें मण्डल के 59वें सूक्त का बारहवाँ और अन्तिम मन्त्र है। सातवाँ मण्डल परम्परा से महर्षि वसिष्ठ मैत्रावरुणि और उनके कुल से जुड़ा है। इस सूक्त के अधिकांश मन्त्र मरुद्गणों की स्तुति में हैं, पर विकिस्रोत पर उद्धृत अनुक्रमणी इस अन्तिम मन्त्र को 'अन्त्यानुष्टुब्रौद्री मृत्युविमोचनी' कहती है: अनुष्टुप् छन्द का रुद्र-देवताक मन्त्र, जो मृत्यु से छुड़ाने वाला है।

विद्वानों के अनुसार सूक्त के अन्तिम मन्त्र बाद में जोड़े गए, और इनका सम्बन्ध साकमेध से है, जो चातुर्मास्य यज्ञों में अन्तिम है और त्र्यम्बक रुद्र को आहुति के साथ पूरा होता है। यही मन्त्र यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता (3.60) और तैत्तिरीय संहिता (1.8.6.2) में भी त्र्यम्बक-आहुतियों के साथ आता है, और शतपथ ब्राह्मण (2.6.2) में त्र्यम्बकेष्टि का वर्णन है।

पुराणों और लोक-भक्ति में यह मन्त्र उन कथाओं से जुड़ा है जिनमें शिव अपने भक्तों को मृत्यु से बचाते हैं; सबसे प्रसिद्ध कथा बालक मार्कण्डेय की है, जिन्हें शिव ने यमराज से बचाया। ये कथाएँ भक्ति-परम्परा की हैं, वैदिक मन्त्र-पाठ का अंश नहीं।

शब्दों का अर्थ

'त्र्यम्बक' का प्रचलित अर्थ है 'तीन नेत्रों वाले', अर्थात् भगवान शिव, जिनका तीसरा नेत्र अग्नि है। सायणाचार्य एक और अर्थ भी देते हैं: ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, तीनों के 'अम्बक' अर्थात् पिता। 'यजामहे' का अर्थ है हम पूजते हैं, यजन करते हैं। 'सुगन्धिम्' को सायण ऐसे समझाते हैं: जिसकी पुण्य-कीर्ति दूर-दूर तक फैली हो, जैसे फूलों से लदे वृक्ष की सुगन्ध दूर तक जाती है। 'पुष्टिवर्धनम्' का अर्थ है शरीर, धन और आत्मबल की पुष्टि बढ़ाने वाले।

मन्त्र का केन्द्रीय बिम्ब 'उर्वारुक' है, यानी ककड़ी या खरबूजे जैसा फल। पक जाने पर वह बिना टूटे-खिंचे अपने-आप बेल से अलग हो जाता है। प्रार्थना ऐसी ही मुक्ति की है: समय आने पर शिव की कृपा से मृत्यु और जन्म-मरण के बन्धन से सहज छुटकारा। अन्तिम शब्द 'मा अमृतात्' का अर्थ है 'अमृत से नहीं': हम मृत्यु से छूटें, पर अमरत्व से कभी अलग न हों। सायण इसे सायुज्य मोक्ष तक की प्रार्थना मानते हैं।

जप-विधि और समय

स्वच्छ शरीर और शान्त मन से इस मन्त्र का जप कभी भी किया जा सकता है, पर परम्परा में सोमवार, प्रदोष (त्रयोदशी की सन्ध्या), श्रावण मास और महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। शिवलिंग के अभिषेक, भस्म धारण, हवन और रोगी के पास बैठकर प्रार्थना में इसका पाठ आम है।

1. पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठें। सम्भव हो तो सामने शिवलिंग या शिव का चित्र रखें और जल, बिल्वपत्र या दीपक अर्पित करें। 2. दाहिने हाथ में 108 मनकों की रुद्राक्ष माला लें। 3. मन्त्र का धीरे-धीरे, स्पष्ट उच्चारण करें; हर जप पर एक मनका आगे बढ़ाएँ और सुमेरु को न लाँघें। 4. अर्थ का ध्यान रखें: पका फल बेल से सहज छूट रहा है। 5. अन्त में जिसके लिए जप किया, उसके कल्याण की प्रार्थना करें और कुछ क्षण मौन रहें।

रोज़ एक माला (108) सामान्य अभ्यास है। समय कम हो तो 11 या 21 बार भी जप किया जाता है। गम्भीर रोग या संकट में परिवार प्रायः सवा लाख (1,25,000) जप का अनुष्ठान कराते हैं, जो कई दिनों में कई पंडितों द्वारा पूरा होकर हवन के साथ सम्पन्न होता है। प्राचीन वैदिक ग्रन्थ भी इसके प्रयोग बताते हैं: विकिस्रोत की टीका में उद्धृत ऋग्विधान के अनुसार तीन रात्रि उपवास करके, खीर (पायस) की सौ आहुतियाँ इस मन्त्र से महादेव को देने वाला 'सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जीता है'।

परम्परा में वर्णित फल

परम्परा में इसे मोक्ष-मन्त्र कहा गया है, और साथ ही रक्षा और आरोग्य का मन्त्र भी। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि श्रद्धापूर्वक जप से:

- अकाल मृत्यु, दुर्घटना और गम्भीर रोग से रक्षा होती है; - शरीर और मन को बल मिलता है और स्वास्थ्य-लाभ में सहायता होती है, इसीलिए रोगी के लिए इसका जप किया जाता है; - भय, विशेषकर मृत्यु का भय, दूर होता है और मन शान्त होता है; - चित्त शुद्ध होता है और अन्ततः मोक्ष मिलता है, जैसा 'मामृतात्' शब्द माँगते हैं।

ये श्रद्धा की बातें हैं। यह मन्त्र प्रार्थना है, चिकित्सा का विकल्प नहीं; रोगी के लिए जप करने वाले परिवार उपचार के साथ-साथ ही इसका पाठ करते हैं।

कुछ सावधानियाँ और परम्पराएँ

वैदिक मन्त्र होने के कारण आचार्य शुद्ध उच्चारण पर बल देते हैं, विशेषकर 'त्र्यम्बकं', 'उर्वारुकमिव' और 'मृत्योर्मुक्षीय' में। कुछ परम्पराएँ मानती हैं कि बीजाक्षरों वाले लम्बे अनुष्ठानिक रूप गुरु से ही ग्रहण करने चाहिए, जबकि मूल वैदिक मन्त्र का जप कोई भी श्रद्धालु कर सकता है। जहाँ मत भिन्न हों, वहाँ अपने कुल और गुरु की परम्परा का पालन करें।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

महामृत्युंजय मन्त्र का अर्थ क्या है?

'हम सुगन्धित और सबका पोषण करने वाले त्रिनेत्रधारी शिव की उपासना करते हैं। जैसे पकी ककड़ी बेल से छूट जाती है, वैसे ही वे हमें मृत्यु से मुक्त करें, अमृत से नहीं।'

महामृत्युंजय मन्त्र किसने लिखा?

यह ऋग्वेद 7.59.12 का मन्त्र है, जो महर्षि वसिष्ठ से जुड़े सातवें मण्डल में आता है। यजुर्वेद में भी यह मन्त्र मिलता है।

महामृत्युंजय मन्त्र का जाप कितनी बार करें?

रोज़ एक माला यानी 108 बार सामान्य है। 11 या 21 बार भी जप किया जाता है, और गम्भीर रोग या संकट में सवा लाख जप का अनुष्ठान कराया जाता है।

महामृत्युंजय मन्त्र का जाप कब करना चाहिए?

कोई भी शान्त समय उपयुक्त है, विशेषकर प्रातःकाल। सोमवार, प्रदोष, श्रावण मास और महाशिवरात्रि विशेष शुभ माने जाते हैं।

क्या रोगी के लिए महामृत्युंजय जाप किया जा सकता है?

हाँ। रोगी के नाम का संकल्प लेकर परिवारजन इसका जप करते हैं। परम्परा इसे रक्षा और आरोग्य की प्रार्थना मानती है, जो उपचार के साथ की जाती है।

इसे महामृत्युंजय क्यों कहते हैं?

महा अर्थात् महान, मृत्यु और जय अर्थात् विजय: मृत्यु पर विजय दिलाने वाला महान मन्त्र, जो मृत्युंजय शिव को समर्पित है।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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