ॐ जय जगदीश हरे
पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी रचित भगवान विष्णु की सर्वाधिक लोकप्रिय आरती
'ॐ जय जगदीश हरे' भगवान विष्णु (जगदीश, अर्थात् जगत के स्वामी) की हिन्दी आरती है, जिसे पंजाब के पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लगभग 1870 में लिखा। पूजा के अन्त में दीप घुमाते समय गाई जाने वाली यह आरती लगभग हर देवता और अवसर पर इतनी गाई जाती है कि विद्वान इसे 'सार्वभौमिक आरती' कहते हैं। प्रायः इसे एक बार, हर छन्द के बाद टेक के साथ गाया जाता है।

आरती
नीचे हर छन्द उसके मूल दो-पंक्ति रूप में दिया गया है। पाठ sanskritdocuments.org के आरती-संग्रह के अनुसार है और द्रिक पंचांग, भक्ति भारत तथा हिन्दी व अंग्रेज़ी विकिपीडिया (जो ओम लता बहादुर की पुस्तक 'द बुक ऑफ़ हिन्दू फ़ेस्टिवल्स एंड सेरेमनीज़', 1997 का हवाला देता है) से मिलाया गया है। गाते समय पहली पंक्ति का उत्तरार्ध प्रायः 'स्वामी' जोड़कर दोहराया जाता है (जैसे 'स्वामी दुख बिनसे मन का'), दूसरी पंक्ति अक्सर दो बार गाई जाती है, और हर छन्द के बाद 'ॐ जय जगदीश हरे' की टेक आती है। अन्त में पहला छन्द फिर से गाया जाता है।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥
oṃ jay jagadīś hare, svāmī jay jagadīś hare | bhakt janoṃ ke saṃkaṭ, kṣaṇ meṃ dūr kare ||
अर्थ: हे जगत के स्वामी श्री हरि, आपकी जय हो! आप अपने भक्तों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं।
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का । सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥
jo dhyāve phal pāve, dukh binase man kā | sukh sampati ghar āve, kaṣṭ miṭe tan kā ||
अर्थ: जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है और मन का दुःख नष्ट हो जाता है। घर में सुख-सम्पत्ति आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी । तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ॥
māt pitā tum mere, śaraṇ gahūṃ maiṃ kisakī | tum bin aur na dūjā, ās karūṃ maiṃ jisakī ||
अर्थ: आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं और किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा रखूँ।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी । पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ॥
tum pūraṇ paramātmā, tum antaryāmī | pārabrahm parameśvar, tum sab ke svāmī ||
अर्थ: आप पूर्ण परमात्मा हैं, सबके हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता । मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता ॥
tum karuṇā ke sāgar, tum pālanakartā | maiṃ mūrakh khal kāmī, kṛpā karo bhartā ||
अर्थ: आप करुणा के सागर और सबका पालन करने वाले हैं। मैं मूर्ख, दोषी और कामनाओं से भरा हूँ; हे भरण-पोषण करने वाले, मुझ पर कृपा करें।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति । किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ॥
tum ho ek agocar, sabake prāṇapati | kis vidhi milūṃ dayāmay, tumako maiṃ kumati ||
अर्थ: आप एक हैं, इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं, सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं अल्पबुद्धि किस प्रकार आपसे मिलूँ?
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे । अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे ॥
dīnabandhu dukhahartā, ṭhākur tum mere | apane hāth uṭhāo, dvār paṛā tere ||
अर्थ: आप दीनों के बन्धु और दुःख हरने वाले हैं, आप ही मेरे ठाकुर हैं। अपना हाथ उठाकर आशीर्वाद दीजिए; मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा । श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ॥
viṣay vikār miṭāo, pāp haro devā | śraddhā bhakti baṛhāo, santan kī sevā ||
अर्थ: विषयों की आसक्ति और मन के विकार मिटाइए, हे देव, पापों को हर लीजिए। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए, और संतों की सेवा का भाव दीजिए।
कुछ संग्रहों में मिलने वाला समापन छन्द
द्रिक पंचांग सहित कुछ आरती-पुस्तकों और वेबसाइटों में अन्त में एक और छन्द मिलता है, जिसमें 'शिवानन्द स्वामी' का नाम है। यही छाप शिवजी की आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा' के अन्त में आती है, इसलिए लगता है कि यह पंक्ति वहीं से आई है। sanskritdocuments.org, भक्ति भारत और विकिपीडिया के पाठ में यह छन्द नहीं है, और इसमें वास्तविक रचयिता फिल्लौरी का नाम भी नहीं है।
श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे । कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे ॥
śrī jagadīśajī kī āratī, jo koī nar gāve | kahat śivānand svāmī, sukh saṃpatti pāve ||
अर्थ: कुछ संग्रहों में छपा समापन छन्द: 'जो कोई श्री जगदीशजी की यह आरती गाता है, स्वामी शिवानन्द कहते हैं, वह सुख-सम्पत्ति पाता है।'
रचयिता: पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी
पं. श्रद्धाराम शर्मा का जन्म सितम्बर 1837 में लुधियाना के पास फिल्लौर में एक पंजाबी ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता जयदयालु ज्योतिषी थे। बचपन में ही उन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फ़ारसी, ज्योतिष और संगीत सीखा, और उन्नीस वर्ष की आयु तक वे महाभारत, रामायण और भागवत पुराण की सार्वजनिक कथा करने लगे थे। उन्होंने पंजाब भर में सनातन धर्म का प्रचार किया, लुधियाना में एक हिन्दू पाठशाला और अपने छापेखाने वाली हिन्दू सभा की स्थापना में भाग लिया, और हिन्दी, पंजाबी तथा उर्दू में लिखा। उनकी पंजाबी गद्य-कृति 'सिक्खाँ दे राज दी विथिआ' (1865) और उपन्यास 'भाग्यवती', जिसे हिन्दी के पहले उपन्यासों में गिना जाता है, ने उन्हें साहित्य में विशेष स्थान दिलाया। 24 जून 1881 को लाहौर में उनका निधन हुआ।
लगभग 1870 में रची गई 'ॐ जय जगदीश हरे' उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है। फिल्लौर में आज भी उनकी जयंती मनाई जाती है और बस अड्डे के पास उनकी प्रतिमा लगी है।
'सार्वभौमिक आरती' कैसे बनी
यह आरती उत्तर भारत की भजन-मण्डलियों और मन्दिरों में फैली, पर मनोज कुमार की फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' (1970) में आने के बाद इसकी लोकप्रियता बहुत बढ़ गई। संगीत-विद्वान पीटर मैनुअल ने इसे ऐसी 'फ़िल्मी आरती' कहा जो मन्दिरों की पूजा में पहुँच गई, और जॉयस फ़्लूकिगर तथा पॉल ब्रायन्स जैसे लेखक इसे 'सार्वभौमिक आरती' कहते हैं, जो विष्णु के साथ-साथ कृष्ण, गणेश और मुरुगन के लिए भी गाई जाती है, दिल्ली से लेकर लेस्टर और अमेरिका के टोलेडो तक। विदेशों में बसे बहुत से परिवारों के लिए यही वह आरती है जो सबको याद है।
भाव और संदेश
आरती स्तुति से शरणागति की ओर बढ़ती है। आरम्भ में श्री हरि की जय है, जो भक्तों के संकट पल भर में हरते हैं। फिर वे माता-पिता, अन्तर्यामी परमात्मा और करुणा के सागर कहे गए हैं। गाने वाला अपनी कमियाँ स्वीकार करता है ('मैं मूरख खल कामी') और पूछता है कि ऐसा व्यक्ति इन्द्रियों से परे उस एक प्रभु तक कैसे पहुँचे। उत्तर है कृपा: 'अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे'। अन्तिम छन्द धन नहीं माँगता; वह विषय-विकारों से मुक्ति, श्रद्धा-भक्ति और संतों की सेवा माँगता है। भाषा की सरलता ही इसकी शक्ति है: वैष्णव भक्ति का सार ऐसे शब्दों में, जिन्हें बच्चा भी गा सके।
आरती करने की विधि
आरती पूजा के अन्त में, सुबह और शाम, तथा सत्यनारायण कथा, एकादशी-पूजन और अधिकांश त्योहारों के समापन पर की जाती है।
1. थाली में घी का दीपक या कपूर, फूल, धूप और छोटी घण्टी रखें। 2. देवता के सामने खड़े होकर आरती आरम्भ होते ही घण्टी बजाएँ। 3. गाते हुए दीपक को प्रतिमा के सामने दक्षिणावर्त (घड़ी की दिशा में) घुमाएँ। एक प्रचलित रीति है: चार बार चरणों पर, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर और फिर सात बार पूरे विग्रह पर; पर हर परिवार अपनी परम्परा मानता है। 4. अन्तिम छन्द के बाद सब उपस्थित लोगों को आरती दें; हर व्यक्ति लौ पर हथेलियाँ घुमाकर आँखों और सिर से लगाता है। 5. इसके बाद क्षमा-प्रार्थना करें और प्रसाद बाँटें।
सामान्यतः आरती एक बार पूरी गाई जाती है। कुछ घरों में अन्त में पहला छन्द कई बार दोहराया जाता है।
परम्परा में वर्णित फल
दूसरा छन्द स्वयं फल बताता है: जो प्रभु का ध्यान करता है उसे फल मिलता है, मन का दुःख मिटता है, घर में सुख-सम्पत्ति आती है और शरीर के कष्ट दूर होते हैं। भक्तों की यह भी मान्यता है कि यह आरती एक ही परमेश्वर को सम्बोधित है, इसलिए श्रद्धा से इसे गाने पर सभी देवताओं की आराधना का पुण्य मिलता है। ये भक्ति-भाव की बातें हैं; अधिकांश परिवारों के लिए यह आरती सबसे बढ़कर पूजा के अन्त में साथ खड़े होने का क्षण है।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
ॐ जय जगदीश हरे आरती किसने लिखी?
पंजाब के फिल्लौर निवासी लेखक, कथावाचक और समाज-सुधारक पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी (1837-1881) ने लगभग 1870 में।
ॐ जय जगदीश हरे किस भगवान की आरती है?
भगवान विष्णु की, जिन्हें जगदीश यानी जगत के स्वामी (हरि) कहा गया है। एक परमेश्वर की स्तुति होने के कारण इसे अनेक देवताओं के लिए गाया जाता है।
ॐ जय जगदीश हरे का अर्थ क्या है?
'हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो, आप भक्तों के संकट पल में दूर करते हैं।' आगे आरती प्रभु को माता-पिता, अन्तर्यामी और करुणा-सागर कहकर श्रद्धा-भक्ति की प्रार्थना करती है।
ॐ जय जगदीश हरे आरती कब गाई जाती है?
रोज़ की पूजा के अन्त में सुबह-शाम, सत्यनारायण कथा, एकादशी और अधिकांश पर्वों तथा पारिवारिक अनुष्ठानों में।
कुछ पाठों में 'शिवानन्द स्वामी' का नाम क्यों आता है?
कुछ संग्रहों में अन्त में एक छन्द जुड़ा है जिसमें यह नाम है; यही छाप 'ॐ जय शिव ओंकारा' आरती की है। अधिकांश स्रोतों के पाठ में यह छन्द नहीं है, और इसमें वास्तविक रचयिता फिल्लौरी का नाम नहीं है।
स्रोत
- https://sanskritdocuments.org/hindi/arati.html
- https://www.drikpanchang.com/lyrics/aarti/lord-narayan/jai-jagdish-aarti.html
- https://www.bhaktibharat.com/aarti/om-jai-jagdish-hare
- https://en.wikipedia.org/wiki/Om_Jai_Jagdish_Hare
- https://hi.wikipedia.org/wiki/ओम_जय_जगदीश_हरे
- https://en.wikipedia.org/wiki/Shardha_Ram_Phillauri
- https://www.tribuneindia.com/news/archive/jalandhar/hometown-recalls-creator-of-timeless-bhajan-om-jai-jagdish-hare-304230/
- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Aarti_Arati_Lamp_for_Puja,_Prayers_Hinduism.jpg
अंतिम शोध: 2026-10-29