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दशहरा (विजयादशमी)

विजय की दशमी: रावण पर श्रीराम की और महिषासुर पर माँ दुर्गा की

दशहरा या विजयादशमी आश्विन शुक्ल दशमी को, शारदीय नवरात्रि की नौ रातों के अगले दिन, प्रायः सितंबर या अक्टूबर में मनाया जाता है। उत्तर भारत में यह रावण पर श्रीराम की विजय का पर्व है, जिसमें रामलीला और रावण-दहन होता है; पूर्व और दक्षिण में यह महिषासुर पर देवी की विजय का उत्सव है, जिसमें दुर्गा-विसर्जन, शमी पूजा, आयुध पूजा और विद्यारंभ होते हैं।

दशहरा (विजयादशमी)
Ministry of Culture, Government of India, via Wikimedia Commons, GODL-India Wikimedia Commons

दशहरा कब आता है

विजयादशमी आश्विन शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि है, जो महानवमी के ठीक बाद आती है। शुक्ल पक्ष दोनों पंचांग-पद्धतियों में आश्विन का ही होता है, इसलिए पूरे देश में तिथि एक है। 'दशहरा' शब्द 'दश-हरा' से बना है, जिसे प्रायः 'दस सिर वाले का पराजय' समझाया जाता है, और 'विजयादशमी' का अर्थ है 'विजय की दशमी'।

पंचांग वह दिन चुनते हैं जिसमें अपराह्न, यानी दोपहर बाद के भाग, में दशमी तिथि हो। परंपरा मानती है कि दोपहर का 'विजय मुहूर्त' इतना शुभ है कि उसमें शुरू किया गया हर कार्य सफल होता है, और उस दिन श्रवण नक्षत्र होना विशेष शुभ माना जाता है। रावण का पुतला परंपरा से सूर्यास्त के बाद जलाया जाता है।

विजय की कथाएँ

श्रीराम और रावण। रामायण में श्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान और वानर सेना के साथ सीता को छुड़ाने लंका जाते हैं और युद्ध में दशानन रावण का वध करते हैं। वाल्मीकि युद्ध को किसी पंचांग-तिथि से नहीं जोड़ते, पर उत्तर भारत की परंपरा रावण-वध विजयादशमी को मनाती है, और पिछली रातों में होने वाली रामलीला इसी तक पहुँचती है। लोक-परंपरा यह भी कहती है कि अभियान पर निकलने से पहले श्रीराम ने देवी और शमी वृक्ष की पूजा की थी।

माँ दुर्गा और महिषासुर। देवी माहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण) बताता है कि देवताओं के सम्मिलित तेज से प्रकट देवी ने महिषासुर से युद्ध कर उसका वध किया। परंपरा नौ रातों के युद्ध के बाद दसवें दिन को देवी की विजय मानती है; बंगाल में विजयादशमी वह दिन भी है जब माँ दुर्गा मायके की वार्षिक यात्रा के बाद कैलाश लौटती हैं।

पांडव और शमी वृक्ष। महाभारत के विराट पर्व में पांडवों ने अज्ञातवास से पहले अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे; अज्ञातवास पूरा होने पर अर्जुन ने विराट राज्य की रक्षा के लिए उन्हें निकाला। परंपरा इसे विजयादशमी से जोड़ती है, और यह इस दिन शमी पूजन का एक कारण है।

कौत्स और सोने की वर्षा। महाराष्ट्र में कथा है कि युवा विद्वान कौत्स गुरु-दक्षिणा के लिए राजा रघु से स्वर्ण माँगने आए; कुबेर ने आपटा और शमी के पेड़ों पर सोना बरसाया, और जो बचा वह प्रजा में बाँट दिया गया। इसीलिए दशहरे पर आपटा के पत्ते 'सोना' कहकर बाँटे जाते हैं।

इस दिन की पूजा-विधि

अनुष्ठान प्रदेश के अनुसार बहुत बदलते हैं; ये सबसे प्रचलित हैं।

1. नवरात्रि का समापन
नवरात्रि कलश का पूजन करें, जवारे बाँटें या विसर्जित करें, और जहाँ दुर्गा प्रतिमा स्थापित हो, वहाँ विसर्जन से पहले अंतिम पूजा करें।
2. अपराजिता पूजा
दोपहर बाद साफ़ भूमि पर कमल या अष्टदल बनाकर फूल और अक्षत से देवी अपराजिता (जो कभी पराजित न हों) की पूजा करें और सफलता की प्रार्थना करें।
3. शमी पूजा
शमी वृक्ष के पास, प्रायः गाँव की सीमा पर, जाएँ, जल, अक्षत, हल्दी और फूल चढ़ाएँ, परिक्रमा करें और शमी-प्रार्थना पढ़ें। आशीर्वाद रूप में कुछ पत्तियाँ घर लाएँ।
4. सीमोल्लंघन
गाँव या नगर की सीमा प्रतीकात्मक रूप से लाँघना, जैसे राजा दशहरे के बाद अभियान पर निकलते थे; आज मोहल्ले से थोड़ा बाहर तक जाना।
5. शस्त्र और औज़ार पूजा
अस्त्र-शस्त्र, औज़ार, वाहन, बही-खाते और अपने काम के उपकरण साफ़ कर पूजे जाते हैं (दक्षिण में प्रायः नवमी को आयुध पूजा के रूप में)।
6. विद्यारंभ
विजयादशमी पढ़ाई, संगीत या नृत्य शुरू करने के लिए शुभ मानी जाती है। केरल में छोटे बच्चे 'विद्यारंभम' संस्कार में चावल पर पहले अक्षर लिखते हैं।
7. आदान-प्रदान और आशीर्वाद
आपटा या शमी के पत्ते 'सोना' कहकर बाँटें, मित्रों से मिलें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

विजयादशमी के श्लोक

शमी वृक्ष के पूजन में शमी-प्रार्थना पढ़ी जाती है; यह पाठ शब्दकल्पद्रुम में विजयोत्सव-विधि के अंतर्गत उद्धृत है। देवी माहात्म्य का वह श्लोक, जो देवी को सभी मंगलों का मंगल कहता है, दुर्गा-विदाई के समय गाया जाता है।

  1. शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका । धरित्र्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ॥ करिष्यमाणा या यात्रा यथाकालं सुखं मया । तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिता ॥

    śamī śamayate pāpaṃ śamī lohitakaṇṭakā | dharitry arjunabāṇānāṃ rāmasya priyavādinī || kariṣyamāṇā yā yātrā yathākālaṃ sukhaṃ mayā | tatra nirvighnakartrī tvaṃ bhava śrīrāmapūjitā ||

    अर्थ: शमी पाप का शमन करती है; शमी लाल काँटों वाली है। तुमने अर्जुन के बाण धारण किए और श्रीराम से प्रिय वचन कहे। मैं यथासमय जो यात्रा करने जा रहा हूँ, श्रीराम द्वारा पूजित हे शमी, तुम उसे सुखद और निर्विघ्न बनाओ। (शमी-प्रार्थना, शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत)

  2. सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

    sarvamaṅgalamāṅgalye śive sarvārthasādhike | śaraṇye tryambake gauri nārāyaṇi namo'stu te ||

    अर्थ: हे सभी मंगलों का मंगल करने वाली, कल्याणमयी शिवे, सब मनोरथ सिद्ध करने वाली, शरणागतों की रक्षक, त्रिनेत्रा गौरी नारायणी, तुम्हें नमस्कार है। (देवी माहात्म्य; विकिस्रोत संस्करण में मार्कण्डेय पुराण 91.9)

देश भर में दशहरा

पूरे उत्तर भारत में रामलीला, यानी रामायण का नाट्य-मंचन, दस या अधिक दिनों तक होती है; यूनेस्को ने 2008 में इसे अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में स्थान दिया और अयोध्या, रामनगर, वाराणसी, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी की रामलीलाओं को सबसे प्रतिनिधि बताया। वाराणसी के पास रामनगर की रामलीला लगभग एक महीने चलती है। दशहरे की शाम खुले मैदानों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं।

पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत में बिजया दशमी दुर्गा पूजा का समापन है: विवाहित स्त्रियाँ देवी को और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर 'सिंदूर खेला' करती हैं, प्रतिमाएँ विसर्जित होती हैं, और लोग 'शुभो बिजया' कहकर मिलते हैं। आधिकारिक दसरा वेबसाइट के अनुसार 1610 से मनाया जा रहा मैसूरु दसरा शमी पूजा और जंबू सवारी पर पूरा होता है, जिसमें देवी चामुंडेश्वरी को स्वर्ण हौदे में हाथी पर बन्नीमंटप ले जाया जाता है। हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का सप्ताह भर चलने वाला दशहरा उसी समय आरंभ होता है जब शेष भारत दशहरा मनाता है, जिसमें भगवान रघुनाथ का रथ और सैकड़ों ग्राम-देवता ढालपुर मैदान में जुटते हैं। छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा लगभग 75 दिनों का पर्व है, जो देवी दंतेश्वरी को समर्पित है और जिसमें रावण का पुतला जलता ही नहीं। गुजरात में नवरात्रि की अंतिम रात के बाद दशहरे की सुबह फाफड़ा-जलेबी खाई जाती है।

पकवान और रीति-रिवाज

दशहरे के व्यंजन उसके रूपों जितने ही विविध हैं: गुजरात में जलेबी-फाफड़ा, महाराष्ट्र में श्रीखंड-पूरी, दक्षिण में पायसम और पर्व का भोज, और बंगाल में बिजया की मिठाइयाँ जैसे नारकेल नाड़ू और निमकी, जो मिलने आने वालों को दी जाती हैं। कुछ प्रदेशों में बच्चे पतंग उड़ाते हैं, और रावण-दहन के मैदानों के आसपास मेले लग जाते हैं। बहुत-से परिवार इस दिन नया वाहन, सोना या औज़ार ख़रीदते हैं, और व्यापारी नए काम शुरू करते हैं। कई जगह लोग छोटे, पर्यावरण-अनुकूल पुतले बनाने और आतिशबाज़ी कम करने का ध्यान रखते हैं।

आज दशहरे का अर्थ

विजयादशमी अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव है, पर इसका गहरा अर्थ भीतरी है: रावण के दस सिरों को अक्सर काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर जैसे दस दोषों के रूप में समझाया जाता है, जिन्हें हर व्यक्ति को जीतना है, और महिषासुर को उस पाशविक अज्ञान के रूप में जिसका देवी नाश करती हैं। नौ रातों के संयम और भक्ति के बाद आने वाला दसवाँ दिन नई शुरुआत का दिन है: यात्रा पर निकलना, सीखना शुरू करना, और अपने औज़ारों व काम के प्रति सम्मान को नया करना। रामलीला की तरह यह भारत के बड़े सामुदायिक अवसरों में से भी एक है, जब पूरा मोहल्ला पुरानी कथाएँ फिर से कहने-सुनने के लिए एक साथ आता है।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

दशहरा कब है? विजयादशमी की तिथि कैसे तय होती है?

यह आश्विन शुक्ल दशमी है, जिसे इस तरह चुना जाता है कि अपराह्न में दशमी तिथि हो। यह सितंबर या अक्टूबर में आती है। द्रिक पंचांग के अनुसार 2027 में नई दिल्ली के लिए शनिवार, 9 अक्टूबर।

दशहरे पर रावण का पुतला क्यों जलाते हैं?

रामलीला के समापन पर रावण पर श्रीराम की विजय के उत्सव के रूप में; यह बुराई और अपने भीतर के दोषों के नाश का प्रतीक है।

दशहरा और विजयादशमी में क्या अंतर है?

दोनों एक ही दिन हैं। उत्तर भारत में 'दशहरा' नाम मुख्यतः श्रीराम की विजय के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि 'विजयादशमी' में देवी की विजय और दक्षिण व पूर्व की प्रादेशिक परंपराएँ भी शामिल हैं।

दशहरे पर शमी वृक्ष की पूजा क्यों होती है?

परंपरा के अनुसार पांडवों ने अपने अस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे और इसी दिन वापस लिए, और श्रीराम ने अभियान से पहले शमी की पूजा की थी। शमी के पत्ते आशीर्वाद रूप में बाँटे जाते हैं।

आयुध पूजा क्या है?

अस्त्र-शस्त्र, औज़ार, वाहन और उपकरणों की पूजा, जो विशेषकर दक्षिण भारत में नवमी या दशमी को होती है, उन साधनों के सम्मान में जिनसे आजीविका चलती है।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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