नवरात्रि (शारदीय और चैत्र)
ऋतुओं के संधिकाल में, वर्ष में दो बार, देवी की नौ रातें
नवरात्रि यानी 'नौ रातें' माँ दुर्गा का पर्व है, जो वर्ष में दो बार आता है: शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक (सितंबर–अक्टूबर), जिसके बाद विजयादशमी आती है, और चैत्र नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से रामनवमी तक (मार्च–अप्रैल)। भक्त कलश स्थापित करते हैं, व्रत रखते हैं, दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और हर दिन देवी के नौ रूपों में से एक की पूजा करते हैं।

नवरात्रि कब आती है
दोनों बड़ी नवरात्रियाँ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी तक चलती हैं। शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होती है, यानी महालया अमावस्या पर पितृ पक्ष समाप्त होने के अगले दिन, और उसके बाद विजयादशमी आती है। चैत्र या वासंतिक नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होती है, जो देश के बड़े भाग में हिंदू नववर्ष भी है (महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादि), और रामनवमी पर पूरी होती है।
गणना तिथियों से होती है, सौर दिनों से नहीं, इसलिए किसी तिथि के क्षय या वृद्धि से कभी-कभी नवरात्रि आठ या दस दिन की भी हो जाती है। घटस्थापना प्रतिपदा की सुबह की जाती है; पंचांग प्रायः दिन के पहले तिहाई भाग को श्रेष्ठ बताते हैं और विकल्प के रूप में दोपहर का अभिजित मुहूर्त। माघ और आषाढ़ की दो 'गुप्त' नवरात्रियाँ मुख्यतः तांत्रिक उपासक और गंभीर साधक मनाते हैं।
देवी की कथा
नवरात्रि का शास्त्रीय आधार देवी माहात्म्य है, जिसे दुर्गा सप्तशती या चंडी पाठ भी कहते हैं: 13 अध्यायों के 700 श्लोक, जो मार्कण्डेय पुराण का अंग हैं। विद्वान सामान्यतः इसे पहली सहस्राब्दी ईस्वी के मध्य के आसपास का मानते हैं। इसमें तीन चरित्र हैं। प्रथम चरित्र में योगनिद्रा रूपी देवी भगवान विष्णु को जगाती हैं ताकि वे मधु-कैटभ का वध करें। मध्यम चरित्र में सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य देवी प्रकट होती हैं और महिषासुर का संहार करती हैं। उत्तम चरित्र में वे शुंभ-निशुंभ और उनके सेनापति चंड, मुंड और रक्तबीज का नाश करती हैं और चामुंडा कहलाती हैं।
परंपरा नौ रातों को महिषासुर से युद्ध और दसवें दिन को देवी की विजय से जोड़ती है। बंगाल में कृत्तिवासी रामायण की वह कथा, जिसमें रावण से युद्ध से पहले श्रीराम ने असमय देवी का आवाहन किया ('अकाल बोधन'), शारदीय दुर्गा पूजा को विशेष अर्थ देती है। बहुत-से परिवार नवरात्रि को देवी का अपने बच्चों के साथ मायके आना भी मानते हैं।
नवदुर्गा: देवी के नौ रूप
दुर्गा सप्तशती से पहले पढ़े जाने वाले देवी कवच में नवदुर्गा के नाम आते हैं, और नवरात्रि का हर दिन इनमें से एक को समर्पित है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
prathamaṃ śailaputrī ca dvitīyaṃ brahmacāriṇī | tṛtīyaṃ candraghaṇṭeti kūṣmāṇḍeti caturthakam || pañcamaṃ skandamāteti ṣaṣṭhaṃ kātyāyanīti ca | saptamaṃ kālarātrīti mahāgaurīti cāṣṭamam || navamaṃ siddhidātrī ca navadurgāḥ prakīrtitāḥ |
अर्थ: पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा; पाँचवीं स्कंदमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी; और नौवीं सिद्धिदात्री: ये नवदुर्गा कही गई हैं। (देवी कवच 3–5)
- पहला दिन: शैलपुत्री
- पर्वतराज हिमवान की पुत्री; वृषभ पर सवार, हाथ में त्रिशूल और कमल।
- दूसरा दिन: ब्रह्मचारिणी
- तपस्विनी देवी, हाथ में जपमाला और कमंडल।
- तीसरा दिन: चंद्रघंटा
- मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र; रक्षा में उग्र, भक्तों के प्रति कोमल।
- चौथा दिन: कूष्मांडा
- मान्यता है कि अपनी मंद मुस्कान से इन्होंने ब्रह्मांड-रूपी अंड की रचना की।
- पाँचवाँ दिन: स्कंदमाता
- भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता, जिन्हें वे गोद में लिए हैं।
- छठा दिन: कात्यायनी
- महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट योद्धा रूप, जो महिषासुर का वध करती हैं।
- सातवाँ दिन: कालरात्रि
- अज्ञान और भय का नाश करने वाला श्याम, भयंकर रूप।
- आठवाँ दिन: महागौरी
- गौर-वर्ण, शांत और तेजस्वी रूप; दुर्गाष्टमी, कन्या पूजन का प्रमुख दिन।
- नौवाँ दिन: सिद्धिदात्री
- सिद्धियाँ देने वाली देवी; महानवमी, प्रायः हवन और कन्या पूजन का दिन।
पूजा-विधि: घटस्थापना से कन्या पूजन तक
परिवारों और प्रदेशों में रीति बहुत भिन्न है; घरों में प्रचलित एक सामान्य क्रम यह है।
- 1. घटस्थापना
- प्रतिपदा की सुबह मिट्टी के चौड़े पात्र में साफ़ मिट्टी बिछाकर जौ बोएँ। उस पर जल-भरा कलश रखें, जिसमें आम के पत्ते, लाल कपड़े में लिपटा नारियल, सिक्का, सुपारी और अक्षत हों, और उसमें देवी का आवाहन करें।
- 2. अखंड ज्योति
- बहुत-से घरों में घी का दीपक जलाया जाता है जो नौ दिन तक बुझने नहीं दिया जाता।
- 3. दैनिक पूजन
- रोज़ सुबह-शाम देवी को जल, रोली, अक्षत, लाल फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें और उस दिन के रूप की आराधना करें।
- 4. पाठ
- कवच, अर्गला और कीलक के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, पूरा एक साथ या नौ दिनों में बाँटकर; या दुर्गा चालीसा और आरती पढ़ें।
- 5. संधि पूजा और हवन
- बंगाल और अन्य स्थानों पर अष्टमी और नवमी के संधिकाल में विशेष पूजा होती है। अष्टमी या नवमी को हवन किया जाता है।
- 6. कन्या पूजन
- अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं (प्रायः भैरव रूप में एक छोटे बालक के साथ) का स्वागत करें, उनके पैर धोएँ, पूरी, चना और हलवा खिलाएँ और उपहार दें, क्योंकि उन्हें देवी का साक्षात रूप माना जाता है।
- 7. समापन
- दशमी को कलश का पूजन कर उसे हटाया जाता है, जौ के अंकुर (जवारे) प्रसाद रूप में बाँटे या विसर्जित किए जाते हैं और व्रत खोला जाता है।
व्रत के नियम
व्रत व्यक्तिगत श्रद्धा और सामर्थ्य का विषय है। कुछ भक्त पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, कुछ केवल पहले और अंतिम दिन, कुछ दिन में एक बार भोजन करते हैं। सामान्य नियम हैं: अन्न, दालें, प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा का त्याग; साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक; और फल, दूध, दही, आलू, शकरकंद, मखाना, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा व राजगिरा का आटा तथा समा के चावल जैसे फलाहार। बहुत-से लोग ब्रह्मचर्य रखते हैं, भूमि पर सोते हैं, बाल और नाख़ून नहीं काटते और मन देवी में लगाए रखते हैं। बुज़ुर्ग, रोगी, गर्भवती स्त्रियाँ और बच्चे परंपरा से छूट पाते हैं या हल्का व्रत रखते हैं।
देवी की स्तुति
देवी माहात्म्य के पाँचवें अध्याय में वह स्तुति है जिसमें देवता उस देवी को प्रणाम करते हैं जो हर प्राणी में चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, दया, माता और अनेक रूपों में स्थित हैं। इसकी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति पूरी नवरात्रि गूँजती है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
yā devī sarvabhūteṣu śaktirūpeṇa saṃsthitā | namas tasyai namas tasyai namas tasyai namo namaḥ ||
अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार, उन्हें नमस्कार, उन्हें बारंबार नमस्कार। (देवी माहात्म्य; विकिस्रोत संस्करण में मार्कण्डेय पुराण 85.18)
देश भर में नवरात्रि
गुजरात में रातें गरबा और डांडिया रास की होती हैं, जो अंबा माँ के दीपक या प्रतिमा के चारों ओर घेरे में नाचे जाते हैं। पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा और त्रिपुरा में षष्ठी से दशमी तक भव्य पंडालों में दुर्गा पूजा होती है; कोलकाता की दुर्गा पूजा को 2021 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में स्थान मिला। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में परिवार 'गोलु' या 'बोम्मई कोलु' सजाते हैं, यानी सीढ़ीनुमा मंच पर गुड़ियों की झाँकी, और पड़ोसियों को बुलाते हैं; अंतिम दिनों में सरस्वती और औज़ारों की पूजा (आयुध पूजा) होती है। राज्य की आधिकारिक दसरा वेबसाइट के अनुसार मैसूरु दसरा 1610 से मनाया जा रहा है, जिसका समापन देवी चामुंडेश्वरी की जंबू सवारी से होता है। तेलंगाना में स्त्रियाँ फूलों के ढेर सजाकर बतुकम्मा मनाती हैं। उत्तर भारत में रोज़ रात रामलीला होती है जो दशहरे तक पहुँचती है; जम्मू और हिमाचल में वैष्णो देवी समेत शक्तिपीठों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। चैत्र नवरात्रि अपेक्षाकृत शांत होती है, जिसमें घर की पूजा, मंदिरों के मेले और रामनवमी प्रमुख हैं।
पकवान, रिवाज और आज का अर्थ
व्रत की रसोई में साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू की पूरी, सिंघाड़े का हलवा, मखाने की खीर और सेंधा नमक वाले आलू बनते हैं। कन्या पूजन की पूरी, काले चने और सूजी का हलवा बहुतों के बचपन का स्वाद है। महाराष्ट्र में हर दिन एक तय रंग पहनना आजकल लोकप्रिय रिवाज बन गया है।
नवरात्रि सृष्टि के पीछे की शक्ति, यानी दिव्य नारी-तत्त्व का सम्मान है, और भक्तों से कहती है कि जैसे देवी ने महिषासुर को जीता, वैसे ही वे अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार को जीतें। विशेष रूप से कन्या पूजन हर बालिका में देवी को देखने का आमंत्रण है, और आज बहुत-से लोग इसी भावना को बेटियों की शिक्षा और सम्मान के प्रयासों तक ले जाते हैं।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
नवरात्रि कब है? शारदीय और चैत्र नवरात्रि कब शुरू होती है?
शारदीय नवरात्रि आश्विन शुक्ल प्रतिपदा (सितंबर–अक्टूबर) से और चैत्र नवरात्रि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (मार्च–अप्रैल) से शुरू होती है। द्रिक पंचांग के अनुसार 2027 में नई दिल्ली के लिए ये 7 अप्रैल और 30 सितंबर हैं।
नवरात्रि में किस दिन किस देवी की पूजा होती है?
पहले से नौवें दिन तक क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
नवरात्रि व्रत में क्या खा सकते हैं?
फल, दूध-दही, आलू, साबूदाना, मखाना, और कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा, सेंधा नमक के साथ। अन्न, दालें, प्याज़, लहसुन और साधारण नमक प्रायः नहीं लिए जाते। पारिवारिक रीति अलग हो सकती है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि में क्या अंतर है?
शरद ऋतु की शारदीय नवरात्रि अधिक धूमधाम से मनती है और दुर्गा पूजा व दशहरे पर पूरी होती है। वसंत की चैत्र नवरात्रि कई प्रदेशों में नववर्ष से शुरू होती है और रामनवमी पर समाप्त होती है।
कन्या पूजन कब करना चाहिए?
पारिवारिक परंपरा के अनुसार अष्टमी या नवमी को, प्रायः सुबह की पूजा के बाद और व्रत खोलने से पहले।
घटस्थापना क्या है?
नवरात्रि के पहले दिन पवित्र कलश की स्थापना, जिसके नीचे प्रायः मिट्टी में जौ बोए जाते हैं, और नौ दिनों के लिए उसमें देवी का आवाहन किया जाता है।
स्रोत
- https://sa.wikisource.org/wiki/देव्याः_कवचम्
- https://sa.wikisource.org/wiki/मार्कण्डेयपुराणम्/अध्यायः_०८१-०८५
- https://ich.unesco.org/en/RL/00703
- https://mysoredasara.gov.in/
- https://www.drikpanchang.com/calendars/hindu/hinducalendar.html?year=2027
- https://en.wikipedia.org/wiki/Navaratri
अंतिम शोध: 2026-10-29