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श्रीरामचरितमानस

गोस्वामी तुलसीदास का 'राम-चरित का मानसरोवर', उत्तर भारत के घर-घर की रामकथा

श्रीरामचरितमानस सोलहवीं शताब्दी के सन्त-कवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी में रचा गया श्रीराम का महाकाव्य है, जिसका आरम्भ अयोध्या में संवत् 1631 (1574 ईस्वी) की रामनवमी को हुआ। चौपाई-दोहों में सात काण्डों में रचा यह ग्रन्थ हिन्दी-भाषी जगत में सबसे अधिक पढ़ी और गाई जाने वाली रामकथा है और रामलीला परम्परा का आधार है। यह संस्कृत शास्त्र नहीं, भक्ति-काव्य है, पर करोड़ों लोगों के लिए यही वह धर्मग्रन्थ है जिसके सहारे वे जीते हैं।

श्रीरामचरितमानस
Rāmacaritamānasa manuscript by the scribe Jānak De, 1824–25 (University of Pennsylvania Libraries), via Wikimedia Commons, public domain Wikimedia Commons

रामचरितमानस क्या है

नाम का अर्थ है 'राम के चरित का मानसरोवर'। तुलसीदास अपने काव्य को एक पवित्र सरोवर बताते हैं: इसे पहले शिव जी ने रचा और अपने मन (मानस) में रखा, और सात काण्ड उस निर्मल जल तक उतरने वाली सात सीढ़ियाँ (सोपान) हैं। आरम्भ में वे कहते हैं कि वे 'स्वान्तः सुखाय', यानी अपने अन्तःकरण के सुख के लिए, पुराण, वेद, आगम और रामायण के आधार पर यह कथा कह रहे हैं।

तुलसीदास संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे, पर उन्होंने अपने क्षेत्र की बोलचाल की भाषा अवधी चुनी, ताकि साधारण लोग भी रामकथा गा और समझ सकें। परम्परा कहती है कि काशी के पण्डितों ने पहले लोकभाषा में धर्मग्रन्थ लिखे जाने का विरोध किया। इसी चुनाव ने मानस को उत्तर भारत की राम-भक्ति का धड़कता हृदय बना दिया: यह घरों और मन्दिरों में गाया जाता है, रोज़ की बोलचाल में उद्धृत होता है, और हर वर्ष रामलीला में मंचित होता है।

संरचना: सात काण्ड

मानस में सात काण्ड हैं, जो वाल्मीकि रामायण की रूपरेखा का अनुसरण करते हैं, पर उनमें तुलसीदास का अपना भाव-बल है। हर काण्ड संस्कृत मंगलाचरण के श्लोकों से आरम्भ होता है। कथा चौपाइयों के समूहों में बहती है, जिनके बीच-बीच में दोहा या सोरठा आता है, और भाव के चरम क्षणों में लम्बे छन्द। पहले दो काण्ड पूरे काव्य के आधे से अधिक हैं।

कथा चार संवादों के भीतर कही गई है: शिव जी पार्वती जी को, काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी को, याज्ञवल्क्य मुनि प्रयाग में भरद्वाज मुनि को, और तुलसीदास अपने पाठकों को। इन संवादों से कवि बीच-बीच में रुककर उपदेश और भक्ति की बात कह पाते हैं।

1. बालकाण्ड
सबसे विस्तृत आरम्भ: वन्दनाएँ, सन्त-महिमा और राम-नाम महिमा, चारों संवाद, सती और पार्वती की कथा तथा शिव-विवाह, राम-अवतार के कारण, राम-जन्म, विश्वामित्र का यज्ञ, अहल्या-उद्धार, जनकपुर की पुष्पवाटिका, धनुष-भंग और विवाह।
2. अयोध्याकाण्ड
कैकेयी के वर, वनवास, निषादराज गुह और केवट से भेंट, दशरथ का देहान्त, और भरत की चित्रकूट यात्रा; काव्य के सबसे मार्मिक अंशों में से।
3. अरण्यकाण्ड
वन-जीवन, शूर्पणखा, स्वर्ण-मृग, सीता-हरण, जटायु, और शबरी, जिन्हें राम नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं।
4. किष्किन्धाकाण्ड
सबसे छोटा काण्ड: हनुमान जी से भेंट, सुग्रीव से मित्रता, वालि-वध और सीता की खोज।
5. सुन्दरकाण्ड
हनुमान जी समुद्र पार करते हैं, अशोक वाटिका में सीता जी से मिलते हैं, लंका जलाकर लौटते हैं; विभीषण शरण में आते हैं। इसका अलग से पाठ बहुत प्रचलित है।
6. लंकाकाण्ड
लंका तक सेतु, अंगद का दूत-कार्य, युद्ध, लक्ष्मण और संजीवनी, रावण-वध और पुष्पक विमान से वापसी।
7. उत्तरकाण्ड
राम का राज्याभिषेक और रामराज्य, काकभुशुण्डि की कथा, भक्ति और ज्ञान पर गरुड़ से उनका संवाद, और कलियुग का वर्णन। इसमें सीता का दूसरा वनवास नहीं है।

रचयिता और काल: परम्परा और इतिहास

तुलसीदास स्वयं बालकाण्ड में तिथि बताते हैं: उन्होंने संवत् 1631 में चैत्र शुक्ल नवमी, यानी राम-जन्म के दिन, अयोध्या में इसकी रचना आरम्भ की। भक्ति-परम्परा मानती है कि इस काव्य पर शिव जी और हनुमान जी की कृपा थी, और हनुमान जी की कृपा से तुलसीदास को चित्रकूट में श्रीराम के दर्शन हुए। लोक में यह कथा भी प्रचलित है कि काशी के पण्डितों ने रात भर विश्वनाथ मन्दिर में मानस को वेदों और अन्य ग्रन्थों के नीचे रखा, और सुबह उसे सबसे ऊपर पाया; ऐसी कथाएँ लिखित इतिहास नहीं, बल्कि इस काव्य के प्रति लोगों की श्रद्धा को व्यक्त करती हैं।

इतिहासकार सहमत हैं कि यह काव्य सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अयोध्या, वाराणसी और सम्भवतः चित्रकूट में रचा गया। तुलसीदास का देहावसान 1623 में वाराणसी में हुआ; उनका जन्म-वर्ष अनिश्चित है, और सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ से मध्य तक की तिथियाँ प्रस्तावित हैं। 1648 ईस्वी की एक पाण्डुलिपि वाराणसी के तुलसी घाट स्थित एक हनुमान मन्दिर में सुरक्षित है। साहित्यिक दृष्टि से विद्वान मानते हैं कि मानस केवल वाल्मीकि पर ही नहीं, अध्यात्म रामायण, भागवत पुराण और संस्कृत नाटकों पर भी आधारित है, और रामानन्दी परम्परा की सगुण भक्ति से अनुप्राणित है।

मूल शिक्षाएँ और प्रमुख प्रसंग

राम-नाम की महिमा। तुलसीदास घोषणा करते हैं कि राम का नाम स्वयं राम से भी बड़ा है, क्योंकि नाम उन अनगिनत लोगों को तारता है जो कभी राम से प्रत्यक्ष नहीं मिले।

सबके लिए खुली भक्ति। शबरी, केवट, निषादराज गुह, वानर और विभीषण, सबको श्रीराम अपनाते हैं। अरण्यकाण्ड में राम शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं, जिसकी पहली भक्ति सन्तों का संग है।

सत्संग। आरम्भिक प्रसंग सज्जनों की संगति को सब कल्याणों का मूल बताते हैं, जैसा नीचे उद्धृत चौपाई में है।

मर्यादा और रामराज्य। राम आदर्श पुत्र, भाई, पति और राजा हैं; उत्तरकाण्ड रामराज्य का वर्णन ऐसे राज्य के रूप में करता है जहाँ न भय है, न रोग, न दरिद्रता, और जहाँ लोग प्रसन्नता से धर्म का पालन करते हैं।

मानस भक्ति-भाव के कारण कुछ प्रसंगों को बदलता भी है: रावण जिस सीता का हरण करता है, वह माया-सीता है, जबकि वास्तविक सीता अग्नि में प्रतीक्षा करती हैं; और काव्य सीता के दूसरे वनवास से पहले समाप्त हो जाता है।

प्रसिद्ध चौपाइयाँ

नीचे दिया अवधी पाठ हिन्दी विकिस्रोत पर लिप्यन्तरित 1925 के इण्डियन प्रेस संस्करण के अनुसार है, जो समस्त पदों को योजक-चिह्न से जोड़ता है; गीता प्रेस के संस्करणों की वर्तनी थोड़ी भिन्न है (जैसे 'मंगल भवन अमंगल हारी')।

  1. आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल-थल-नभ-वासी॥ सीय-राम-मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥

    ākara cāri lākha caurāsī, jāti jīva jala-thala-nabha-vāsī || sīya-rāma-maya saba jaga jānī, karauṁ pranāma jori juga pānī ||

    अर्थ: बालकाण्ड, दोहा 7 के बाद की चौपाई: 'चार प्रकार की चौरासी लाख योनियों में जल, थल और आकाश में रहने वाले सब जीव हैं; इस सारे जगत् को सीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।'

  2. मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई।। सो जानब सतसङ्ग प्रभाऊ। लोकहु बेद न आन उपाऊ॥

    mati kīrati gati bhūti bhalāī, jaba jehi jatana jahāṁ jehi pāī || so jānaba satasaṅga prabhāū, lokahu beda na āna upāū ||

    अर्थ: बालकाण्ड, आरम्भ में सत्संग-महिमा से: 'जिसने भी, जब भी, जहाँ भी, जिस भी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, ऐश्वर्य और भलाई पाई है, उसे सत्संग का ही प्रभाव जानो; लोक और वेद में इसका कोई दूसरा उपाय नहीं है।'

  3. मङ्गल-भवन अमङ्गल-हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर-बिहारी॥

    maṅgala-bhavana amaṅgala-hārī, dravau so dasaratha ajira-bihārī ||

    अर्थ: बालकाण्ड, दोहा 111 के बाद की चौपाई, पार्वती जी को कथा सुनाने से पहले शिव जी की वन्दना से: 'जो मंगल के धाम और अमंगल को हरने वाले हैं, जो दशरथ जी के आँगन में खेलते हैं, वे (बालरूप श्रीराम) मुझ पर कृपा करें।' यह पंक्ति उत्तर भारत में सबसे अधिक गाई जाने वाली पंक्तियों में से है।

आज मानस का पाठ

पूरे काव्य के पाठ की तीन विधियाँ व्यापक रूप से प्रचलित हैं: नवाह्न पारायण, यानी नौ दिन में (दोनों नवरात्रों में लोकप्रिय), मासपारायण, यानी तीस दिन में, और अखण्ड पाठ, यानी लगभग चौबीस घण्टों में बिना रुके पूरे ग्रन्थ का पाठ, जो प्रायः किसी पारिवारिक शुभ अवसर पर होता है। अधिकांश मुद्रित संस्करणों में नौ और तीस दिन के विश्राम-स्थल अंकित रहते हैं।

सुन्दरकाण्ड का पाठ प्रायः अलग से होता है, विशेषकर मंगलवार और शनिवार को, जो हनुमान जी से जुड़े दिन हैं। पारम्परिक कथावाचकों की मानस-कथा में विशाल श्रोता-समूह जुटते हैं, और दशहरे से पहले के सप्ताहों में पूरे उत्तर भारत में मानस पर आधारित रामलीलाएँ होती हैं, जिनमें वाराणसी के पास रामनगर की महीने भर चलने वाली रामलीला सबसे प्रसिद्ध है। रामानन्द सागर के टीवी धारावाहिक 'रामायण' (1987) का भी यही मुख्य आधार था।

पढ़ना कहाँ से शुरू करें

घरों में सबसे प्रचलित संस्करण गीता प्रेस, गोरखपुर का है, जिसमें अवधी मूल पाठ के साथ हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका है; यह कई आकारों में मिलता है, और गीता प्रेस अंग्रेज़ी अनुवाद सहित संस्करण भी प्रकाशित करता है। सुन्दरकाण्ड भी गीता प्रेस से अलग पुस्तिका के रूप में मिलता है। अंग्रेज़ी पाठकों के लिए डब्ल्यू. डगलस पी. हिल का अनुवाद 'The Holy Lake of the Acts of Rama' (1952) और मूर्ति क्लासिकल लाइब्रेरी का रोहिणी चौधरी द्वारा चल रहा अनुवाद विश्वसनीय हैं, और फ़िलिप लटगेनडॉर्फ़ की 'The Life of a Text' मानस के गायन-मंचन पर उत्कृष्ट अध्ययन है।

मानस के भक्ति-रस को अनुभव करने के लिए सुन्दरकाण्ड से शुरू करें, फिर बालकाण्ड के आरम्भ से क्रम से पढ़ें। धीरे-धीरे ही सही, पर ऊँचे स्वर में पढ़ना इसके अनुभव का अंग है: मानस गाने के लिए ही रचा गया था।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

रामचरितमानस किसने और कब लिखा?

गोस्वामी तुलसीदास ने इसे अवधी में लिखा। उनके अपने कथन के अनुसार उन्होंने इसका आरम्भ विक्रम संवत् 1631 (1574 ईस्वी) की रामनवमी को अयोध्या में किया।

रामचरितमानस में कितने काण्ड हैं?

सात: बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड। तुलसीदास इन्हें सोपान कहते हैं, रामकथा के सरोवर में उतरने की सात सीढ़ियाँ।

रामायण और रामचरितमानस में क्या अन्तर है?

रामायण वाल्मीकि का प्राचीन संस्कृत महाकाव्य है। रामचरितमानस तुलसीदास की सोलहवीं शताब्दी की अवधी पुनर्कथा है, जो भक्ति-भाव से लिखी गई है; इसमें माया-सीता जैसे अन्तर हैं और सीता के दूसरे वनवास का वर्णन नहीं है।

नवाह्न पारायण क्या है?

नौ दिनों में पूरे रामचरितमानस का पाठ, जो प्रायः नवरात्र में किया जाता है। मुद्रित संस्करणों में नौ विश्राम-स्थल अंकित रहते हैं।

'मंगल भवन अमंगल हारी' रामचरितमानस में कहाँ है?

यह बालकाण्ड में दोहा 111 के बाद की चौपाई में है, जहाँ शिव जी पार्वती जी को रामकथा सुनाना आरम्भ करते हैं।

क्या हनुमान चालीसा रामचरितमानस का भाग है?

नहीं। हनुमान चालीसा एक अलग स्तुति है, जो परम्परा से तुलसीदास की रचना मानी जाती है; यह रामचरितमानस का भाग नहीं है।

स्रोत

अंतिम शोध: 2026-10-29

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