मेरी श्रद्धा

काशी विश्वनाथ मन्दिर

मोक्षदायिनी काशी में बाबा विश्वनाथ — सारे जगत के नाथ।

वाराणसी का काशी विश्वनाथ मन्दिर भगवान शिव के 'विश्वनाथ' या 'विश्वेश्वर' — सारे जगत के स्वामी — रूप को समर्पित है। यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र तीर्थों में है। वर्तमान मन्दिर 1780 में इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया; महाराजा रणजीत सिंह के दिए सोने के कारण यह 'स्वर्ण मन्दिर' भी कहलाता है। 2021 से श्री काशी विश्वनाथ धाम ने इसे सीधे गंगा से जोड़ दिया है, और मान्यता है कि यहाँ दर्शन और गंगा-स्नान मोक्ष का मार्ग खोलते हैं।

काशी विश्वनाथ मन्दिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

काशी की महिमा पूरे पौराणिक साहित्य में गाई गई है। स्कन्द पुराण का 'काशी खण्ड' इसी नगरी को समर्पित है और उस समय के विश्वनाथ मन्दिर का वर्णन करता है, जिसे 'मोक्ष लक्ष्मी विलास' कहा जाता था — गर्भगृह में शिवलिंग और चारों ओर ज्ञान, रंग, ऐश्वर्य और मुक्ति मण्डप। तमिल नायनार सन्त सम्बन्दर ने भी इस धाम का गुणगान किया। मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार आदि शंकराचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, गुरु नानक, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे अनेक सन्त-महापुरुष यहाँ दर्शन के लिए आए। परम्परा के अनुसार सन्त एकनाथ ने 'एकनाथी भागवत' यहीं पूर्ण की थी।

इतिहासकार इस मन्दिर की कथा को बार-बार टूटने और फिर बनने की कथा बताते हैं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 'आदि विश्वेश्वर' के नाम से याद किया जाने वाला पुराना मन्दिर 1194 में मुहम्मद गोरी की सेना द्वारा कन्नौज के जयचन्द को हराने के समय नष्ट हुआ; बाद में उस स्थान पर रज़िया मस्जिद बनी। तेरहवीं सदी में मन्दिर फिर बना, पन्द्रहवीं सदी में जौनपुर के शर्की सुल्तानों के समय इसे क्षति पहुँची, और लगभग 1490 में सिकन्दर लोदी के शासनकाल में इसे गिरा दिया गया। अकबर के समय राजा मानसिंह और राजा टोडरमल ने इसका पुनर्निर्माण कराया — टोडरमल का काम लगभग 1585 का माना जाता है, और वाराणसी के विद्वान नारायण भट्ट इस प्रयास से जुड़े थे।

मुग़ल दरबारी अभिलेखों और बाद के इतिहासकारों के अनुसार 1669 में बादशाह औरंगज़ेब ने मन्दिर तोड़ने का आदेश दिया, और इसके एक भाग पर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई; पुराने मन्दिर के अवशेष मस्जिद के चबूतरे और पिछली दीवार में दिखाई देते हैं। कुछ इतिहासकार इस आदेश को केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि उस समय की राजनीति और मुग़ल सत्ता के स्थानीय विरोध से भी जोड़ते हैं। श्रद्धालु फिर भी इस परिसर में आते रहे। अठारहवीं सदी में मल्हारराव होल्कर और जयपुर के महाराजा ने मूल स्थान पर मन्दिर बनाने का प्रयास किया, पर सफल नहीं हुए। ज्ञानवापी परिसर से जुड़े विवाद न्यायालय में विचाराधीन हैं, और यह पृष्ठ उन पर कोई टिप्पणी नहीं करता।

1780 में मल्हारराव की पुत्रवधू, इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पास के स्थान पर वर्तमान मन्दिर बनवाया। स्थानीय विवरणों के अनुसार तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह ने इसमें सहयोग दिया। 1785 में गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के कहने पर कलेक्टर मोहम्मद इब्राहिम ख़ान ने मन्दिर के सामने नौबतख़ाना बनवाया। 1828 में ग्वालियर की बैजाबाई ने ज्ञानवापी परिसर में चालीस से अधिक स्तम्भों वाला मण्डप बनवाया। 1830 के दशक में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मन्दिर के तीन में से दो गुम्बदों को मढ़ने के लिए सोना दिया — अधिकांश इतिहासों में यह वर्ष 1835 है, जबकि मन्दिर ट्रस्ट 1839 बताता है। 1841 में नागपुर के रघुजी भोंसले तृतीय ने चाँदी भेंट की।

लगभग दो सौ वर्षों तक मन्दिर की देखरेख वंशानुगत महन्त परिवार करता रहा। 28 जनवरी 1983 को श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर अधिनियम के तहत उत्तर प्रदेश सरकार ने इसका अधिग्रहण किया। प्रबन्ध श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यास को सौंपा गया, जिसके अध्यक्ष पूर्व काशी नरेश डॉ. विभूति नारायण सिंह बने और कार्यकारिणी समिति की अध्यक्षता वाराणसी के मण्डलायुक्त को मिली।

हाल के वर्ष बड़े पैमाने पर नवनिर्माण के रहे हैं। जुलाई 2018 में मन्दिर का कुम्भाभिषेक हुआ, जिसे तमिलनाडु के नाट्टुकोट्टई नगरत्तार समुदाय ने सम्पन्न कराया, जिनका इस धाम से पीढ़ियों पुराना नाता है। 2019 में शुरू हुई श्री काशी विश्वनाथ धाम परियोजना ने मन्दिर और गंगा के बीच का क्षेत्र नए सिरे से बनाया; काम के दौरान मिले चालीस से अधिक पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार हुआ। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने 13 दिसम्बर 2021 को इसका लोकार्पण किया।

धाम ने मन्दिर चौक से गंगा के ललिता घाट तक पत्थर से बना चौड़ा मार्ग खोल दिया, जहाँ यात्री सुविधाएँ, संग्रहालय, वैदिक पुस्तकालय और न्यास के अतिथि-गृह हैं। 2022 में एक गुमनाम भक्त के दिए सोने से गर्भगृह की दीवारें स्वर्णमण्डित की गईं। तब से श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ी है, और न्यास अब आरती, रुद्राभिषेक और सुगम दर्शन की ऑनलाइन बुकिंग करता है।

पौराणिक कथा

भक्त काशी को वह स्थान मानते हैं जहाँ पहला ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। शिव पुराण के अनुसार एक बार ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तभी दोनों के बीच शिव अनन्त प्रकाश-स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए। विष्णु वराह बनकर उसका आधार खोजने नीचे गए और ब्रह्मा हंस बनकर उसका शिखर खोजने ऊपर उड़े, पर कोई भी उसका अन्त न पा सका। विष्णु ने सच्चाई से हार मान ली, जबकि ब्रह्मा ने झूठ कहा कि उन्होंने शिखर देख लिया। तब शिव ने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया और कहा कि उनकी पूजा नहीं होगी, जबकि सत्यवादी विष्णु सदा शिव के साथ पूजे जाएँगे।

काशी खण्ड विश्वेश्वर को काशी का राजा बताता है, जो पंचक्रोशी — नगरी की पवित्र परिक्रमा — के भीतर सभी देवताओं और जनों पर शासन करते हैं, और काल भैरव उनके कोतवाल हैं। मान्यता है कि शिव काशी को कभी नहीं छोड़ते, इसीलिए इसे 'अविमुक्त' — कभी न छोड़ा गया — कहते हैं। परम्परा कहती है कि प्रलय के समय शिव इस नगरी को अपने त्रिशूल पर उठा लेते हैं, जिससे काशी सदा बनी रहती है।

एक और प्रिय कथा के अनुसार हिमालय में पिता के घर रहते हुए माता पार्वती ने शिव से अपना अलग घर माँगा। शिव उन्हें काशी ले आए और यहीं विश्वनाथ रूप में बस गए। रंगभरी एकादशी इसी गृह-प्रवेश का उत्सव है, जब बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की प्रतिमाएँ गुलाल और डमरुओं के बीच शोभायात्रा में निकलती हैं।

यह भी विश्वास है कि काशी में देह-त्याग करने वाले को मुक्ति मिलती है। काशी खण्ड के अनुसार स्वयं शिव मरणासन्न व्यक्ति के कान में तारक मन्त्र देते हैं — इसीलिए मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट नगर के सबसे पवित्र स्थलों में गिने जाते हैं। भक्त यह भी मानते हैं कि काशी आने वाले को कम से कम एक इच्छा त्याग देनी चाहिए, और बहुत-से लोग काशी यात्रा को रामेश्वरम से जोड़ते हुए गंगाजल ले जाकर वहाँ चढ़ाते हैं।

स्थापत्य कला

1780 में बना वर्तमान मन्दिर उत्तर भारतीय नागर शैली का पत्थर का मन्दिर है, जो चारदीवारी से घिरे आँगन में स्थित है। इसकी रचना सुगठित है — सभागृह से होकर गर्भगृह में पहुँचते हैं, जहाँ विश्वेश्वर का चिकना काला ज्योतिर्लिंग फ़र्श में बनी चाँदी-मढ़ी वेदी में विराजमान है। आँगन में अविमुक्तेश्वर, काल भैरव, कार्तिकेय, विष्णु, गणेश, शनि, दण्डपाणि आदि के छोटे मन्दिर हैं।

मन्दिर के तीन शिखर या गुम्बद हैं। इनमें से दो — गर्भगृह का शिखर और उसके पास का गुम्बद — महाराजा रणजीत सिंह के दिए सोने से मढ़े हैं; ट्रस्ट के अनुसार तीसरा अभी बिना मढ़ा है। मुख्य शिखर पर स्वर्ण कलश, ध्वज और त्रिशूल हैं। मन्दिर के सामने 1785 का नौबतख़ाना है, जहाँ मंगल-वाद्य बजते थे। 2022 में गर्भगृह की भीतरी दीवारें भी स्वर्णमण्डित की गईं।

मन्दिर के उत्तर में ज्ञानवापी — 'ज्ञान का कूप' — है। परम्परा के अनुसार एक आक्रमण के समय ज्योतिर्लिंग की रक्षा के लिए उसे इसी कूप में छिपाया गया और मुख्य पुजारी उसके साथ कूद गए थे; एक विशाल नन्दी इसी दिशा की ओर मुख किए बैठे हैं। पास ही बैजाबाई का 1828 का स्तम्भ-मण्डप है।

2021 में पूरा हुआ श्री काशी विश्वनाथ धाम मन्दिर का पूरा परिवेश बदल चुका है। संकरी गलियों के झुरमुट की जगह अब मन्दिर बलुआ पत्थर के मण्डपों और दालानों वाले विशाल प्रांगण के बीच है, जो मन्दिर चौक से होकर सीधे ललिता घाट से जुड़ता है। सदियों बाद पहली बार गंगा से मन्दिर का स्वर्ण शिखर दिखाई देता है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • मंगला आरती

    भोर 3:00–4:00

    बाबा विश्वनाथ को जगाने वाली भोर की आरती, दिन का सबसे अधिक माँगा जाने वाला अनुष्ठान। टिकट ट्रस्ट से बुक होते हैं; गेट नम्बर 1 पर रिपोर्टिंग समय रात 2:30 बजे है।

  • मध्याह्न भोग आरती

    सुबह 11:15–दोपहर 12:20

    दोपहर में भगवान को भोग अर्पित किया जाता है; इस आरती के दौरान सामान्य दर्शन रुकते हैं।

  • सप्तर्षि आरती

    शाम 7:00–8:15

    शाम की विशिष्ट आरती, जिसे सप्तर्षियों के प्रतीक सात पुजारी करते हैं। परम्परा है कि सप्तर्षि हर संध्या बाबा विश्वनाथ की पूजा करते हैं।

  • श्रृंगार (रात्रि) आरती

    रात 9:00–10:15

    ज्योतिर्लिंग का फूलों, चन्दन और आभूषणों से श्रृंगार कर रात्रि आरती होती है। रात 11 बजे मन्दिर बन्द होता है।

  • रुद्राभिषेक

    सुबह 4:00–शाम 6:00

    एक, पाँच या ग्यारह शास्त्रियों से रुद्राभिषेक, लघु रुद्र और महारुद्र ऑनलाइन या ट्रस्ट के काउंटर से बुक होते हैं; दूध और कुछ पूजन-सामग्री अलग से लेनी होती है।

  • सामान्य दर्शन

    सुबह 4–11, दोपहर 12:20–शाम 7, रात 8:30–9

    दर्शन निःशुल्क हैं। सशुल्क 'सुगम दर्शन' में शास्त्री के साथ बिना कतार के गर्भगृह तक जाने की सुविधा, प्रसाद और लॉकर शामिल हैं।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)

महाशिवरात्रि

काशी विश्वनाथ की सबसे पवित्र रात। मन्दिर पूरी रात खुला रहता है और बदले हुए समय पर विशेष आरतियाँ होती हैं; पूरे नगर से शिव-विवाह की बारातें निकलती हैं।

फाल्गुन शुक्ल एकादशी (फ़रवरी–मार्च)

रंगभरी एकादशी

महाशिवरात्रि के लगभग बारह दिन बाद आने वाला यह पर्व विवाह के बाद शिव के पार्वती को काशी लाने का उत्सव है। बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की प्रतिमाएँ गुलाल और डमरुओं के बीच शोभायात्रा में निकलती हैं, और काशी की होली शुरू होती है।

श्रावण (जुलाई–अगस्त)

श्रावण मास

शिव के प्रिय इस महीने में, विशेषकर सोमवार को, भारी संख्या में भक्त और काँवड़िये ज्योतिर्लिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं।

कार्तिक (अक्टूबर–नवम्बर)

कार्तिक मास और देव दीपावली

ट्रस्ट कार्तिक मास को प्रमुख आयोजनों में गिनता है; इसका समापन कार्तिक पूर्णिमा पर देव दीपावली से होता है, जब काशी के घाट दीपों से जगमगा उठते हैं।

कार्तिक (अक्टूबर–नवम्बर)

दीपावली और अन्नकूट

दीपावली मन्दिर के प्रमुख पर्वों में है, जिसके बाद अन्नकूट में भगवान को अनेक प्रकार के व्यंजन अर्पित किए जाते हैं।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मन्दिर से लगभग 25 किलोमीटर (सड़क से लगभग एक घंटा) दूर है और देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा है।
रेल मार्ग
मुख्य स्टेशन वाराणसी जंक्शन (वाराणसी कैंट) मन्दिर से लगभग 5 किलोमीटर दूर है। बनारस (मण्डुआडीह) और पं. दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (मुग़लसराय, लगभग 17 किलोमीटर) भी विकल्प हैं। स्टेशन से गोदौलिया या मैदागिन के लिए ऑटो या ई-रिक्शा लें।
सड़क मार्ग
वाराणसी सड़क मार्ग से प्रयागराज, लखनऊ, गोरखपुर और पटना से जुड़ा है; बसें चौधरी चरण सिंह बस अड्डे पर आती हैं। वाहन मन्दिर तक नहीं जाते — गोदौलिया या मैदागिन से धाम के द्वार तक पैदल चलें। नाव से ललिता घाट आकर गेट नम्बर 1 से गंगा की ओर से भी प्रवेश कर सकते हैं, जो सुबह 6 से रात 9 बजे तक खुला रहता है।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
वाराणसी में अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे सुहाना रहता है; देव दीपावली वाला कार्तिक मास विशेष रूप से सुन्दर होता है। महाशिवरात्रि, रंगभरी एकादशी, श्रावण सोमवार और रविवार को सबसे अधिक भीड़ होती है। अप्रैल–जून में भीषण गर्मी पड़ती है, और मानसून में निचले घाट डूब सकते हैं। मन्दिर रोज़ सुबह 3 से रात 11 बजे तक खुला रहता है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • मोबाइल फ़ोन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और यहाँ तक कि पेन भी अन्दर ले जाना मना है — मन्दिर चौक, यात्री सुविधा केन्द्रों या गेट नम्बर 4 के पास हेल्पडेस्क पर निःशुल्क लॉकर का उपयोग करें।
  • मंगला आरती, अन्य आरतियाँ, रुद्राभिषेक और सुगम दर्शन केवल shrikashivishwanath.org या ट्रस्ट के आधिकारिक ऐप से बुक करें; बुकिंग रद्द या वापस नहीं होती।
  • कोई सख़्त ड्रेस कोड नहीं है, पर ट्रस्ट शालीन कपड़े पहनने का आग्रह करता है।
  • लम्बी कतारों से बचने के लिए सुबह जल्दी या देर शाम जाएँ — ख़ासकर सोमवार, रविवार और त्योहारों पर।
  • नाव से ललिता घाट पहुँचकर गंगा की ओर से धाम में प्रवेश करें। दर्शन के साथ काशी के कोतवाल काल भैरव और दशाश्वमेध घाट की सन्ध्या गंगा आरती भी देखें।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?

शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के विवाद के समय शिव अनन्त प्रकाश-स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए, और भक्त काशी को उसी प्रथम ज्योतिर्लिंग का स्थान मानते हैं। परम्परा यह भी कहती है कि शिव पार्वती को काशी लाए और यहीं विश्वनाथ रूप में सदा के लिए बस गए।

वर्तमान काशी विश्वनाथ मन्दिर किसने बनवाया?

वर्तमान मन्दिर 1780 में इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पुराने मन्दिर के स्थान के पास बनवाया। 1830 के दशक में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके दो गुम्बदों को मढ़ने के लिए सोना दिया, इसीलिए इसे स्वर्ण मन्दिर भी कहते हैं।

काशी विश्वनाथ में आरती का समय क्या है?

मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार मंगला आरती भोर 3 से 4 बजे, भोग आरती सुबह 11:15 से दोपहर 12:20, सप्तर्षि आरती शाम 7 से 8:15 और श्रृंगार आरती रात 9 से 10:15 बजे होती है। मन्दिर सुबह 3 से रात 11 बजे तक खुला रहता है; त्योहारों पर समय बदलता है।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर क्या है?

13 दिसम्बर 2021 को लोकार्पित यह मन्दिर का नया विकसित परिसर है, जो मन्दिर चौक से होकर मन्दिर को गंगा के ललिता घाट से जोड़ता है। इसमें चौड़े रास्ते और यात्री सुविधाएँ हैं, और निर्माण के दौरान मिले चालीस से अधिक पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार हुआ।

क्या काशी विश्वनाथ मन्दिर में मोबाइल ले जा सकते हैं?

नहीं। ट्रस्ट मोबाइल फ़ोन, अन्य उपकरण और पेन तक अन्दर ले जाने की अनुमति नहीं देता। मन्दिर चौक, यात्री सुविधा केन्द्रों और हेल्पडेस्क पर निःशुल्क लॉकर उपलब्ध हैं।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग