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कालीघाट काली मंदिर

गंगा के पुराने तट पर कोलकाता की माँ का प्राचीन धाम।

दक्षिण कोलकाता का कालीघाट काली मंदिर सबसे पूजनीय शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ परंपरा के अनुसार सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। 15वीं सदी की बांग्ला काव्य-रचनाओं में यहाँ की पूजा का उल्लेख है, और बंगाल की आटचाला शैली में बना वर्तमान मंदिर 1809 में पूरा हुआ। तीन नेत्रों और लंबी स्वर्ण जिह्वा वाली यहाँ की काली प्रतिमा देश की सबसे प्रसिद्ध प्रतिमाओं में है।

कालीघाट काली मंदिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

कालीघाट आदि गंगा, यानी हुगली नदी के पुराने प्रवाह, के तट पर है और इसके नाम का अर्थ है 'काली का घाट'। 15वीं सदी के बांग्ला भक्ति-साहित्य 'मनसार भासान' और मुकुंदराम के 'कवि कंकण चंडी' में इस धाम का उल्लेख मिलता है, जिससे पता चलता है कि कोलकाता शहर बसने से पहले ही यह एक प्रसिद्ध तीर्थ था। एक प्रचलित मत तो शहर के नाम 'कलिकाता' को भी कालीघाट से जोड़ता है, हालाँकि इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं।

कहा जाता है कि आरंभिक मंदिर एक साधारण-सी संरचना थी। पर्यटन मंत्रालय के 'इनक्रेडिबल इंडिया' विवरण के अनुसार 16वीं सदी की शुरुआत में मानसिंह नाम के एक राजा ने यहाँ झोंपड़ी जैसा छोटा मंदिर बनवाया। आज पूजी जाने वाली प्रतिमा परंपरा से दो संतों – आत्माराम गिरि और ब्रह्मानंद गिरि – की बनाई मानी जाती है।

वर्तमान मंदिर बड़िशा के ज़मींदार सावर्ण रायचौधुरी परिवार के संरक्षण में बना। संतोष रायचौधुरी ने 1798 में निर्माण शुरू करवाया, जो ग्यारह वर्ष चला और 1809 में मंदिर पूरा हुआ। इस परिवार की पारंपरिक संरक्षक की भूमिका पर कुछ लोगों ने प्रश्न भी उठाए हैं, और बावली राज परिवार को भी एक बड़े संरक्षक के रूप में याद किया जाता है। हालदार परिवार लंबे समय से पूजा के वंशानुगत सेवायत (संरक्षक) रहे हैं।

19वीं सदी में मुख्य मंदिर के आसपास और भी मंदिर बने। ज़मींदार काशीनाथ राय ने 1835 में नाटमंदिर बनवाया; उदय नारायण मंडल ने 1843 में श्यामराय (राधा-कृष्ण) मंदिर स्थापित किया और मदन गोपाल कोले ने 1858 में उसके लिए दोल मंच जोड़ा; और गोबिंद दास मंडल ने 1880 में षष्ठी तला बनवाया। इसी सदी में मंदिर के आसपास के बाज़ार में 'कालीघाट पट' चित्रकला का जन्म हुआ – देवी-देवताओं और रोज़मर्रा के दृश्यों के जीवंत जलरंग चित्र, जो तीर्थयात्रियों को बेचे जाते थे और आज दुनिया भर के संग्रहालयों में सहेजे गए हैं।

2024 में मंदिर का पहला बड़ा आधुनिक जीर्णोद्धार हुआ, जिस पर लगभग ₹200 करोड़ ख़र्च हुए; यह राशि कोलकाता नगर निगम और रिलायंस फ़ाउंडेशन ने दी। संरक्षकों ने बाद की परतों के नीचे छिपी पुरानी टेराकोटा कारीगरी को खोजकर सहेजा, तीनों शिखरों पर लगभग 50 किलो सोना चढ़ाया गया, और भीड़ भरे बाज़ार को मंदिर-प्रांगण से अलग करने के लिए नई दीवार बनाई गई।

पौराणिक कथा

शक्तिपीठों की परंपरा के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री सती ने पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन न कर प्राण त्याग दिए। शोक और क्रोध में डूबे शिव उनका शरीर लेकर लोकों में घूमने लगे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस शरीर के खंड किए। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने, और हर पीठ पर शिव भैरव रूप में रक्षा करते हैं।

कालीघाट को वह स्थान माना जाता है जहाँ सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरीं। बंगाल में मान्य पीठनिर्णय की 51 पीठों वाली सूची में यहाँ की देवी 'कालिका' और भैरव 'नकुलीश' (नकुलेश्वर) बताए गए हैं, जिनका मंदिर पास ही है। अलग-अलग ग्रंथों की सूचियाँ भिन्न हैं – देवी भागवत पुराण में 108 पवित्र स्थान हैं, बंगाल की कुछ परंपराएँ 52 पीठ गिनती हैं, और कालिका पुराण व देवी भागवत चार प्रमुख आदि पीठों का भी उल्लेख करते हैं, जिनमें बहुत से भक्त कालीघाट को गिनते हैं। आदि शंकराचार्य की अठारह महापीठों की सूची में इसका नाम नहीं है।

एक स्थानीय कथा इस धाम के प्रकट होने की बात बताती है। आत्माराम नाम के एक ब्राह्मण भक्त को भागीरथी में मनुष्य के पैर की उँगली जैसी एक शिला मिली, और देवी की प्रेरणा से उन्होंने उसकी पूजा शुरू की; बाद में यहीं मंदिर की स्थापना हुई। मंदिर परिसर का पवित्र कुंडपुकुर सरोवर इसी कथा से जुड़ा है, और भक्त मानते हैं कि इसका जल संतान की कामना करने वालों को आशीर्वाद देता है।

बंगाल के भक्तों के लिए यहाँ की काली केवल उग्र देवी नहीं, करुणामयी माँ हैं। उनके हाथ का कटा सिर और खड्ग अहंकार पर दिव्य ज्ञान की विजय के प्रतीक माने जाते हैं, और उठे हुए हाथ अभय और वरदान की मुद्राएँ हैं।

स्थापत्य कला

मुख्य मंदिर बंगाल की आटचाला (आठ छतों वाली) शैली का सुंदर उदाहरण है, जिसमें गाँव की झोंपड़ियों की घुमावदार, छप्पर जैसी 'चाला' छतों को ईंट-चूने में ढाला गया है। चौकोर गर्भगृह की छत दो स्तरों में आठ ढलानों वाली है, जिसके कटे हुए शीर्ष पर तीन शिखर हैं; सबसे ऊँचे शिखर पर ध्वज लहराता है। 2024 के जीर्णोद्धार के बाद से शिखरों पर सोना चढ़ा है, जबकि छतें धातुई चाँदी रंग में रंगी हैं।

बाहरी दीवारों पर हरे और सफ़ेद हीरे के आकार की टाइलों का अनूठा पैटर्न है, और छतों के नीचे की कार्निस पर टेराकोटा की सजावट है, जिसका कुछ भाग जीर्णोद्धार के दौरान फिर से खोजा और सहेजा गया। गर्भगृह के सामने 1835 का नाटमंदिर है – एक बड़ा कक्ष, जहाँ से भक्त माँ के दर्शन करते हैं और जहाँ पूजा व कीर्तन होते हैं।

यहाँ की काली प्रतिमा अधिकांश प्रतिमाओं से अलग है। इसमें केवल मुख और हाथ गढ़े गए हैं – देवी के तीन बड़े नेत्र, सोने या चाँदी के चार हाथ और लंबी स्वर्ण जिह्वा है। दो हाथों में खड्ग और कटा सिर है, और बाकी दो अभय और वरद मुद्रा में हैं। परिसर में षष्ठी तला, दोल मंच सहित श्यामराय (राधा-कृष्ण) मंदिर और कुंडपुकुर सरोवर हैं, और नकुलेश्वर भैरव मंदिर कुछ ही क़दम की दूरी पर है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • प्रातः दर्शन

    सुबह 5:00 – दोपहर 2:00

    भोर से पहले मंगल आरती के साथ मंदिर खुलता है, और भक्त सुबह भर माँ काली के दर्शन के लिए कतार में लगते हैं।

  • भोग

    दोपहर में, 2:00 बजे कपाट बंद होने से पहले

    देवी को पका हुआ भोग अर्पित किया जाता है और दोपहर में मंदिर बंद हो जाता है; भोग बाद में भक्तों में बाँटा जाता है।

  • संध्या दर्शन

    शाम 5:00 – रात 10:30

    दोपहर बाद मंदिर फिर खुलता है; संध्या आरती और दर्शन रात तक चलते हैं। मंगलवार, शनिवार और पर्वों पर कपाट देर से बंद हो सकते हैं।

  • पुजारियों द्वारा पूजा

    भक्त आमतौर पर वंशानुगत पुजारियों (पंडों) के माध्यम से लाल जवा (गुड़हल) की माला, मिठाई और साड़ी चढ़ाते हैं। दक्षिणा पहले तय कर लें और जहाँ उपलब्ध हों, आधिकारिक काउंटरों का उपयोग करें।

  • बलि और अमावस्या पूजा

    पुरानी परंपरा के अनुसार यहाँ देवी को बकरे की बलि दी जाती है, विशेषकर मंगलवार, शनिवार और पर्वों पर। हर अमावस्या की रात विशेष पूजा के लिए भारी भीड़ होती है।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

कार्तिक अमावस्या (अक्टूबर–नवंबर)

काली पूजा

दीपावली की रात माँ काली की महारात्रि, जब पूरी रात मंदिर में भक्तों का सैलाब रहता है और विशेष पूजा होती है।

आश्विन (सितंबर–अक्टूबर)

दुर्गा पूजा

बंगाल के सबसे बड़े उत्सव में बड़ी संख्या में भक्त माँ का आशीर्वाद लेने कालीघाट आते हैं।

बैशाख (अप्रैल के मध्य)

पोइला बैशाख

बांग्ला नववर्ष पर व्यापारी और परिवार भोर में आकर नए वर्ष के लिए माँ का आशीर्वाद लेते हैं; बहुत से लोग नए बही-खाते की पूजा कराते हैं।

ज्येष्ठ पूर्णिमा (मई–जून)

स्नान यात्रा

विधिवत स्नान का पर्व, जो कालीघाट में पवित्र कुंडपुकुर सरोवर से जुड़ा है।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा कोलकाता का नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है; ट्रैफ़िक के अनुसार कालीघाट पहुँचने में आमतौर पर एक घंटा या उससे अधिक लगता है।
रेल मार्ग
हावड़ा और सियालदह मुख्य रेलवे स्टेशन हैं, जहाँ से टैक्सी से थोड़ी ही दूरी है। ब्लू लाइन का कालीघाट मेट्रो स्टेशन मंदिर से पैदल दूरी पर है।
सड़क मार्ग
कालीघाट दक्षिण कोलकाता में हाज़रा और रासबिहारी एवेन्यू के पास है, और शहर में कहीं से भी टैक्सी, बस या ऑटो से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च तक कोलकाता का मौसम सबसे आरामदायक रहता है। काली पूजा, दुर्गा पूजा, पोइला बैशाख और मंगलवार-शनिवार को विशेष भीड़ रहती है; सामान्य दिनों की सुबह अपेक्षाकृत शांत होती है। अप्रैल से जून तक गर्मी और उमस रहती है, और मानसून में भारी बारिश होती है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • मंगलवार, शनिवार, अमावस्या और पर्वों पर लंबी कतारों के लिए तैयार रहें; हो सके तो सुबह जल्दी पहुँचें।
  • कई पुजारी और एजेंट जल्दी दर्शन कराने की पेशकश करेंगे। कोई भी शुल्क पहले साफ़ तय करें और अनधिकृत बिचौलियों को पैसे न दें।
  • गर्भगृह की फ़ोटोग्राफ़ी आमतौर पर अनुमत नहीं है; मंदिर कर्मचारियों के निर्देशों का पालन करें।
  • भीड़ भरी गलियों में अपना सामान संभालकर रखें और जूते-चप्पल बाहर के स्टैंड पर छोड़ें।
  • पास के नकुलेश्वर भैरव मंदिर के दर्शन ज़रूर करें; मान्यता है कि शक्तिपीठ के दर्शन भैरव के दर्शन से पूरे होते हैं।
  • कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल और इंडियन म्यूज़ियम जैसे संग्रहालयों में कालीघाट पट चित्रकला देखें, जो इसी मंदिर के आसपास पनपी।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

कालीघाट में सती का कौन-सा अंग गिरा था?

शक्तिपीठ परंपरा के अनुसार कालीघाट में सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। पीठनिर्णय में यहाँ की देवी 'कालिका' और भैरव 'नकुलेश्वर' बताए गए हैं।

कालीघाट मंदिर के दर्शन का समय क्या है?

पर्यटन मंत्रालय के 'इनक्रेडिबल इंडिया' पेज के अनुसार मंदिर सुबह 5:00 से दोपहर 2:00 तक और शाम 5:00 से रात 10:30 तक खुला रहता है। पर्वों पर समय बदल सकता है।

कालीघाट काली मंदिर किसने बनवाया?

वर्तमान मंदिर का निर्माण 1798 में सावर्ण रायचौधुरी परिवार के संतोष रायचौधुरी ने शुरू करवाया और यह 1809 में पूरा हुआ। इससे पहले भी यहाँ एक मंदिर था, और 15वीं सदी के बांग्ला साहित्य में इसका उल्लेख है।

कालीघाट की काली की जिह्वा सोने की क्यों है?

बाहर निकली जिह्वा माँ काली के स्वरूप की पारंपरिक विशेषता है। कालीघाट में यह सोने की बनी है, और तीन बड़े नेत्रों के साथ यह प्रतिमा को अविस्मरणीय रूप देती है।

कालीघाट मंदिर कैसे पहुँचें?

ब्लू लाइन का कालीघाट मेट्रो स्टेशन मंदिर से पैदल दूरी पर है। हावड़ा, सियालदह और कोलकाता हवाई अड्डे से टैक्सी, बस और ऐप कैब मिलती हैं।

स्रोत

देवी धाम और शक्तिपीठ