मेरी श्रद्धा

मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार

बिल्व पर्वत की चोटी से हर की पौड़ी को निहारती, मन की मुराद पूरी करने वाली माँ।

मनसा देवी मंदिर हरिद्वार में हर की पौड़ी के ऊपर शिवालिक पहाड़ियों की बिल्व पर्वत चोटी पर स्थित है। भक्त मानते हैं कि माँ सच्चे मन की हर मुराद पूरी करती हैं, और यहाँ के एक पेड़ पर मन्नत का धागा बाँधते हैं। चंडी देवी और माया देवी के साथ यह हरिद्वार के तीन सिद्धपीठों में से एक है, जहाँ पैदल या रोपवे से पहुँचा जाता है।

मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

हरिद्वार देश के सबसे पवित्र नगरों में है – वह स्थान जहाँ गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदानों में उतरती है। परंपरा के अनुसार यहाँ पाँच तीर्थ हैं, जिन्हें पंचतीर्थ कहते हैं – गंगाद्वार (हर की पौड़ी), कुशावर्त, कनखल, बिल्व तीर्थ और नील पर्वत। बिल्व तीर्थ बिल्व पर्वत ही है, जिसका नाम शिव को प्रिय बेल वृक्षों से पड़ा, और इसी की चोटी पर आज मनसा देवी का मंदिर है।

इस धाम का आरंभिक इतिहास दर्ज नहीं है। विकिपीडिया पर इसके निर्माता को 'अज्ञात' बताया गया है, और स्थानीय परंपरा एक गाय की कथा सुनाती है जो हर सुबह पहाड़ी पर चढ़कर तीन पवित्र शिलाओं पर अपना दूध अर्पित करती थी; बाद में इन्हें देवी का स्थान माना गया। कुछ विवरणों में मंदिर का निर्माण 1811 से 1815 के बीच मनीमाजरा के महाराजा गोपाल सिंह द्वारा बताया जाता है, पर यह तिथि और संरक्षक हरियाणा के पंचकूला स्थित अधिक प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर से जुड़े हैं, और हरिद्वार के लिए इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है।

मनसा देवी, गंगा पार नील पर्वत पर स्थित चंडी देवी मंदिर और नगर के माया देवी मंदिर के साथ सिद्धपीठों का त्रिकोण बनाती हैं। ये वे धाम हैं जहाँ भक्तों का विश्वास है कि प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है, और हरिद्वार आने वाले यात्री, विशेषकर कुंभ, अर्धकुंभ और काँवड़ के दिनों में, परंपरा से दोनों पहाड़ी मंदिरों पर चढ़ते हैं।

भीड़ को संभालने के लिए पहाड़ी की तलहटी में अपर रोड के पास से सीधे मंदिर तक 'मनसा देवी उड़न खटोला' रोपवे बनाया गया। यह लगभग 540 मीटर लंबा है और लगभग 178 मीटर की ऊँचाई तय करता है; चंडी देवी के लिए भी ऐसा ही रोपवे है। जंगल से होकर जाने वाला पैदल रास्ता और सीढ़ियाँ भी बहुत से श्रद्धालु इस्तेमाल करते हैं।

मंदिर की लोकप्रियता के कारण पर्वों पर भारी भीड़ होती है। 27 जुलाई 2025 को श्रावण मास में बिजली का करंट फैलने की अफ़वाह के बाद मंदिर की सीढ़ियों वाले रास्ते पर भगदड़ मची, जिसमें कम से कम छह श्रद्धालुओं की मृत्यु हुई। इसकी मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश दिए गए, और तब से पहुँच मार्गों पर भीड़ प्रबंधन की समीक्षा की गई है।

पौराणिक कथा

मनसा देवी वही देवी मनसा हैं, जिनकी पूजा उत्तर और पूर्वी भारत में होती है। उनका नाम 'मनस' (मन) और 'मंशा' (इच्छा) दोनों से जुड़ा है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वे महर्षि कश्यप के मन से उत्पन्न हुईं और नागराज वासुकि की बहन हैं; महाभारत में वासुकि की बहन जरत्कारु की कथा है, जिनके पुत्र आस्तीक ने राजा जनमेजय के सर्प-यज्ञ में नागों की रक्षा की। इसीलिए सर्पदंश से रक्षा के लिए उनकी पूजा होती है। हरिद्वार और उत्तर भारत के बड़े भाग में उन्हें भगवान शिव के मन से प्रकट माना जाता है, और भक्त उन्हें शिव की पुत्री मानते हैं।

मंदिर में सुनाई जाने वाली एक लोककथा के अनुसार मनसा अपने जन्म का रहस्य नहीं जानती थीं, और शिव से मिलकर सत्य जानने के लिए उन्होंने वर्षों साधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें सत्य बताया, और वे सबका कल्याण करने वाली देवी बन गईं। इसीलिए यहाँ वे सबसे बढ़कर मन की मुराद पूरी करने वाली माँ के रूप में पूजी जाती हैं।

गर्भगृह में दो प्रतिमाएँ हैं – एक आठ भुजाओं वाली और एक तीन मुख व पाँच भुजाओं वाली – जिन्हें मनसा देवी और चंडी देवी के रूप में पूजा जाता है। भक्त मन्नत माँगते हुए मंदिर के एक पेड़ की डालियों पर मौली (पवित्र धागा) बाँधते हैं, और मनोकामना पूरी होने पर बहुत से लोग उसे खोलने लौटते हैं।

मनसा देवी को कभी-कभी शक्तिपीठ कहा जाता है, पर उन पारंपरिक सूचियों में इसका नाम नहीं है जिनमें सती के अंग गिरने के स्थान गिनाए गए हैं (पीठनिर्णय के 51, बंगाल की कुछ परंपराओं के 52, या देवी भागवत के 108)। हरिद्वार में इस परंपरा से पास का माया देवी मंदिर जुड़ा है। मनसा देवी की महिमा एक सिद्धपीठ के रूप में है, जहाँ भक्तों का विश्वास है कि माँ प्रार्थना सुनती हैं।

स्थापत्य कला

मंदिर बिल्व पर्वत की चोटी पर एक साधारण पहाड़ी धाम है, जिसमें गर्भगृह, भक्तों के लिए ढका हुआ आँगन और छोटे मंदिरों की पंक्ति है। यह विस्तृत नक्काशी के लिए नहीं जाना जाता; इसकी शोभा इसकी स्थिति में है – यहाँ से हरिद्वार, हर की पौड़ी की गंगा नहर और साफ़ दिनों में दक्षिण की ओर फैले मैदान दिखाई देते हैं।

गर्भगृह में देवी की दोनों प्रतिमाएँ – आठ भुजाओं वाली और तीन मुख व पाँच भुजाओं वाली – भव्य वस्त्रों और मालाओं से सजी रहती हैं। जिस पवित्र पेड़ पर भक्त मन्नत के धागे बाँधते हैं, वह परिसर में ही है, और उसकी डालियाँ लाल-पीली मौली से भरी रहती हैं।

परिसर तक दो रास्ते हैं – हर की पौड़ी और अपर रोड के पास से जंगल के बीच ऊपर जाता सीढ़ीदार पैदल मार्ग, और उड़न खटोला रोपवे, जिसका ऊपरी स्टेशन मंदिर के पास खुलता है। दोनों रास्तों पर प्रसाद, चुनरी और पूजा-सामग्री की दुकानें हैं।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • दर्शन

    लगभग सुबह 5:00 – रात 10:00 (गर्मी); सुबह 4:00 – रात 9:00 (सर्दी)

    पर्यटन मंत्रालय के 'इनक्रेडिबल इंडिया' पेज पर दिया गया समय। कुछ स्रोत दोपहर में विश्राम बताते हैं, इसलिए स्थानीय रूप से पुष्टि करें।

  • भोग

    लगभग सुबह 11:00–11:15

    इनक्रेडिबल इंडिया के अनुसार देवी को प्रतिदिन लगने वाला भोग।

  • प्रातः और संध्या आरती

    दिन की शुरुआत और अंत में माँ की आरती होती है; सटीक समय मौसम के साथ बदलता है।

  • मन्नत का धागा बाँधना

    भक्त मंदिर के मनोकामना वृक्ष पर पवित्र धागा बाँधते हैं और मुराद पूरी होने पर उसे खोलकर माँ का धन्यवाद करने लौटते हैं।

  • चढ़ावा

    नारियल, फल, फूल, माला, चुनरी और धूप-अगरबत्ती चढ़ाई जाती है; प्रसाद दोनों रास्तों की दुकानों पर मिलता है।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

चैत्र (मार्च–अप्रैल)

चैत्र नवरात्रि

दो नवरात्रों में से एक, जब मंदिर और पहुँच मार्गों पर बहुत भारी भीड़ होती है।

आश्विन (सितंबर–अक्टूबर)

शारदीय (आश्विन) नवरात्रि

शरद ऋतु के नवरात्र, जिनमें देवी की विशेष सजावट और पूजा होती है।

श्रावण (जुलाई–अगस्त)

श्रावण और काँवड़ यात्रा

लाखों काँवड़िये गंगाजल लेने हरिद्वार आते हैं, और बहुत से मनसा देवी भी चढ़ते हैं; इस समय सबसे अधिक भीड़ होती है।

हर 12 / 6 वर्ष (वसंत)

कुंभ और अर्धकुंभ

हरिद्वार के महान स्नान पर्वों के दौरान मनसा देवी और चंडी देवी के सिद्धपीठों पर अपार श्रद्धालु पहुँचते हैं।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा जॉली ग्रांट (देहरादून) है, जो हरिद्वार से लगभग एक घंटे की दूरी पर है। दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 200 किमी दूर है।
रेल मार्ग
निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार जंक्शन है, जहाँ से पहाड़ी की तलहटी तक ऑटो या टैक्सी से थोड़ी ही दूरी है; यहाँ दिल्ली, देहरादून और देश भर से ट्रेनें आती हैं।
सड़क मार्ग
रोपवे का निचला स्टेशन और पैदल मार्ग की शुरुआत अपर रोड और हर की पौड़ी के पास है। हरिद्वार सड़क से दिल्ली (लगभग 220 किमी), देहरादून और ऋषिकेश से अच्छी तरह जुड़ा है।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
अक्टूबर से मार्च घूमने का सबसे आरामदायक समय है। नवरात्र, श्रावण (काँवड़ के दिन) और कुंभ वर्ष आध्यात्मिक रूप से विशेष हैं, पर बहुत भीड़ रहती है; ऐसे दिनों में सुबह जल्दी जाएँ और हो सके तो रोपवे लें। गर्मियों की दोपहर पहाड़ी पर तपती है, और मानसून में पैदल रास्ता फिसलन भरा हो सकता है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • पर्वों पर भीड़ के समय सीढ़ियों वाले रास्ते से बचें; पुलिस और मंदिर के निर्देशों का पालन करें, और भीड़ में अफ़वाहों पर न भरोसा करें, न उन्हें फैलाएँ।
  • रोपवे से खड़ी चढ़ाई से बचा जा सकता है; अक्सर चंडी देवी रोपवे के साथ संयुक्त टिकट भी मिलता है। भीड़ के समय कतार के लिए तैयार रहें।
  • हरिद्वार के तीनों सिद्धपीठ पूरे करने के लिए मनसा देवी के साथ नील पर्वत पर चंडी देवी और नगर में माया देवी के दर्शन करें।
  • पैदल जाएँ तो पानी साथ रखें और आरामदायक जूते पहनें; रास्ता जंगल से होकर लगातार चढ़ता है।
  • अपने सामान और खाने का ध्यान रखें – रास्ते और मंदिर के आसपास बंदर बहुत हैं।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

मनसा देवी की पूजा क्यों की जाती है?

मान्यता है कि मनसा देवी सच्चे मन की हर मुराद पूरी करती हैं; 'मंशा' का अर्थ ही इच्छा है। भक्त प्रार्थना करते समय मंदिर के एक पेड़ पर धागा बाँधते हैं और मनोकामना पूरी होने पर उसे खोलने लौटते हैं।

क्या हरिद्वार का मनसा देवी मंदिर शक्तिपीठ है?

यह शक्तिपीठों की पारंपरिक सूचियों में नहीं है। यह चंडी देवी और माया देवी के साथ हरिद्वार के तीन सिद्धपीठों में से एक है; शक्तिपीठ परंपरा से माया देवी मंदिर जुड़ा है।

हरिद्वार में मनसा देवी मंदिर कैसे पहुँचें?

हर की पौड़ी और अपर रोड के पास से सीढ़ीदार पैदल रास्ते से चढ़ें, या लगभग 540 मीटर लंबे मनसा देवी उड़न खटोला रोपवे से जाएँ। हरिद्वार रेलवे स्टेशन पास ही है।

मनसा देवी मंदिर का समय क्या है?

इनक्रेडिबल इंडिया के अनुसार मंदिर गर्मियों में लगभग सुबह 5:00 से रात 10:00 और सर्दियों में सुबह 4:00 से रात 9:00 तक खुला रहता है। मंदिर और रोपवे का समय मौसम के साथ बदलता है।

मनसा देवी कौन हैं?

वे देवी मनसा हैं – नागराज वासुकि की बहन और सर्पदंश से रक्षा करने वाली। हरिद्वार में भक्त उन्हें भगवान शिव के मन से प्रकट मानते हैं और मनोकामना पूर्ण करने वाली माँ के रूप में पूजते हैं।

स्रोत

देवी धाम और शक्तिपीठ