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त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर

गोदावरी के उद्गम पर विराजे त्र्यम्बकेश्वर — जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक साथ पूजे जाते हैं।

नासिक से लगभग 28 किलोमीटर दूर त्र्यम्बक नगर में स्थित त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में है, जहाँ से पवित्र गोदावरी नदी निकलती है। इसका ज्योतिर्लिंग अनोखा है — गर्भगृह के एक गड्ढे में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक तीन छोटे लिंग विराजमान हैं। काले पत्थर का वर्तमान मन्दिर अठारहवीं शताब्दी के मध्य में पेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) ने बनवाया। त्र्यम्बक वैदिक कर्मकाण्ड का केन्द्र और देश के चार कुम्भ-स्थलों में से एक भी है।

त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

गोदावरी के उद्गम पर बसा त्र्यम्बक सदियों से तीर्थ और वैदिक विद्या का केन्द्र रहा है। पारम्परिक स्तोत्र में गिने गए बारह ज्योतिर्लिंगों में यह एक है, और नासिक–त्र्यम्बकेश्वर सिंहस्थ देश के चार कुम्भ मेलों में से एक है। इस नगर में लम्बे समय से ब्राह्मण परिवार, वैदिक पाठशालाएँ, आश्रम और मठ रहे हैं। यहाँ के वंशानुगत पुरोहित वंशावली-बहियाँ रखते हैं, जिनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी आने वाले यात्रियों के परिवारों का ब्योरा दर्ज होता है।

त्र्यम्बक मराठी भक्ति परम्परा के लिए भी पवित्र है। सन्त ज्ञानेश्वर के बड़े भाई और गुरु, वारकरियों के पूज्य सन्त निवृत्तिनाथ ने यहीं समाधि ली थी, और उनकी पुण्यतिथि पर हर साल बड़ी वारकरी यात्राएँ यहाँ पहुँचती हैं। मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार निवृत्तिनाथ के कहने पर ही ज्ञानेश्वर ने भगवद्गीता पर मराठी टीका 'ज्ञानेश्वरी' लिखी।

ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यहाँ पहले का मन्दिर मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के शासनकाल में क्षतिग्रस्त हुआ था। वर्तमान मन्दिर उसी स्थान पर पेशवा बालाजी बाजीराव — नानासाहेब, जो 1740 से 1761 तक पेशवा रहे — ने बनवाया। श्री त्र्यम्बकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट के अनुसार नया मन्दिर महाशिवरात्रि, शुक्रवार 16 फ़रवरी 1756 को सनई, चौघड़ा, तुतारी और रणशिंग की मंगल ध्वनि के बीच खोला गया। कुछ अन्य विवरण कहते हैं कि काम 1755 में शुरू होकर 1786 तक चला और इस पर लगभग 16 लाख रुपये — उस समय की बहुत बड़ी राशि — ख़र्च हुए।

एक प्रचलित किस्सा है कि पेशवा ने इस बात पर शर्त लगाई थी कि ज्योतिर्लिंग के चारों ओर का पत्थर खोखला है या नहीं। पत्थर खोखला निकला, और शर्त हारकर उन्होंने यह भव्य मन्दिर बनवाया। नगर का कुशावर्त तीर्थ, जिसे गोदावरी का धार्मिक उद्गम माना जाता है, इन्दौर रियासत के फडणवीस श्रीमन्त सरदार रावसाहेब पारनेरकर ने बनवाया; कुण्ड के किनारे उनकी और उनकी पत्नी की प्रतिमाएँ हैं।

कभी ज्योतिर्लिंग पर प्रसिद्ध 'नासक हीरा' सुशोभित था, जिसका नाम नासिक से ही पड़ा। तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–18) के बाद जब यह क्षेत्र और नगर के ऊपर का ब्रह्मगिरि क़िला अंग्रेज़ों के अधीन गया, तब ईस्ट इंडिया कम्पनी यह हीरा ले गई। बाद में यह विदेश में निजी संग्रहों से होकर गुज़रा।

आधुनिक काल में मन्दिर का प्रबन्ध श्री त्र्यम्बकेश्वर देवस्थान ट्रस्ट करता है, जो 1954 में सार्वजनिक न्यास के रूप में पंजीकृत हुआ। कई दशकों तक एक ही वंशानुगत न्यासी इसकी देखरेख करते रहे। 1995 से एक न्यासी मण्डल इसका संचालन करता है, जिसकी अध्यक्षता नासिक के ज़िला न्यायाधीश द्वारा नामित न्यायाधीश करते हैं।

जुलाई 2026 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) जब संरक्षण कार्य के तहत मन्दिर के पेशवाकालीन गहरे अमृत कुण्ड को ख़ाली कर साफ़ कर रहा था, तब कुण्ड की तली में पत्थर का एक शिवलिंग मिला; इसकी आयु अभी आधिकारिक रूप से तय नहीं हुई है। अमृतवर्षिणी भी कहलाने वाले इसी कुण्ड का जल ज्योतिर्लिंग के नित्य अभिषेक में प्रयोग होता है। 2026–28 के सिंहस्थ कुम्भ के लिए भी नगर की तैयारी चल रही है, और कुशावर्त तीर्थ व मन्दिर के आसपास नई सुविधाएँ बन रही हैं।

पौराणिक कथा

शिव पुराण के अनुसार त्र्यम्बक महर्षि गौतम और उनकी पत्नी अहल्या की तपोभूमि थी। गौतम की तपस्या से उनके आश्रम में अकाल में भी जल और अन्न की कमी नहीं होती थी। इससे वहाँ रहने वाले दूसरे ब्राह्मण, अपनी पत्नियों के अहल्या के प्रति द्वेष से प्रेरित होकर, ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने गणेश जी को प्रसन्न कर ऋषि को आश्रम से निकालने का वर माँगा। अनमने भाव से गणेश जी एक दुर्बल गाय बनकर गौतम के खेत में चरने लगे। ऋषि ने एक तिनके से उसे धीरे से हाँकना चाहा, तो गाय वहीं गिरकर मर गई, और ब्राह्मणों ने उन पर गो-हत्या का आरोप लगा दिया।

प्रायश्चित्त के लिए गौतम को यहाँ गंगा लाकर शिव की आराधना करने को कहा गया। ब्रह्मगिरि पर लम्बी और कठोर तपस्या के बाद शिव प्रकट हुए, उन्हें पूरी तरह निष्पाप घोषित किया और कपटी ब्राह्मणों को दण्ड देने की बात कही। पर गौतम ने उन्हें क्षमा करने की विनती की, क्योंकि उन्हीं के कारण उन्हें भगवान के दर्शन हुए थे। गौतम, ऋषियों और देवताओं की प्रार्थना पर शिव त्रिनेत्रधारी त्र्यम्बकेश्वर के रूप में सदा के लिए यहीं बस गए, और गौतम द्वारा लाई गई गंगा गोदावरी — जिसे गौतमी और 'दक्षिण की गंगा' भी कहते हैं — बनकर बहने लगी।

कुशावर्त की एक स्थानीय कथा है कि गोदावरी बार-बार ब्रह्मगिरि में लुप्त हो जाती थी, तब गौतम ने कुश घास का घेरा बाँधकर उसे रोका, और तब से यह कुण्ड सदा भरा रहता है। एक और मान्यता के अनुसार नगर को घेरे तीन पर्वत — ब्रह्मगिरि, नीलगिरि और कालगिरि — दिव्य स्वरूप हैं, और ब्रह्मगिरि स्वयं शिव का रूप है। इसकी ढलानों पर यात्री गंगाद्वार, जहाँ से गोदावरी निकलती मानी जाती है, और गौतम से जुड़ी गुफाओं के दर्शन करते हैं।

उज्जैन और ओंकारेश्वर के स्वामियों की तरह त्र्यम्बकेश्वर भी अपने नगर के राजा — 'त्र्यम्बकराजा' — माने जाते हैं, और हर सोमवार पालकी में बैठकर कुशावर्त तक प्रजा का हाल देखने निकलते हैं। गर्भगृह के तीन लिंगों के कारण यहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश की एक साथ पूजा होती है, और ट्रस्ट की तीनों दैनिक पूजाएँ क्रम से इन्हीं को समर्पित हैं।

स्थापत्य कला

मन्दिर काले बेसाल्ट पत्थर से बना है और अपनी मूर्तिकला व सुडौल अनुपात के लिए प्रसिद्ध है — यह उत्तर भारतीय नागर परम्परा में अठारहवीं सदी की मराठा मन्दिर-शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह ऊँची पत्थर की चारदीवारी से घिरे बड़े पक्के प्रांगण में खड़ा है, जिसकी चारों दिशाओं में द्वार हैं; ट्रस्ट पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर के द्वारों को क्रमशः आरम्भ, परिपक्वता, पूर्णता और साक्षात्कार का प्रतीक बताता है। गर्भगृह के ऊपर का ऊँचा, वक्राकार शिखर छोटे-छोटे शिखरों की पंक्तियों से सजा है और उस पर स्वर्ण कलश है; सामने नक़्क़ाशीदार स्तम्भों और द्वारों वाला मण्डप है।

गर्भगृह में पहले केवल फ़र्श में बना अर्घा दिखाई देता है, उठा हुआ शिवलिंग नहीं। ध्यान से देखने पर उसके भीतर एक गड्ढे में लगभग एक-एक इंच के तीन छोटे लिंग दिखते हैं, जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं — यही त्र्यम्बकेश्वर को दूसरे ज्योतिर्लिंगों से अलग करता है। कहा जाता है कि इस गड्ढे में गोदावरी का जल लगातार रिसता रहता है, और निरन्तर अभिषेक से लिंग समय के साथ घिस गए हैं। प्रातः पूजा के बाद अर्घे पर चाँदी का पंचमुखी मुखौटा रखा जाता है, और विशेष अवसरों पर रत्नजड़ित स्वर्ण मुकुट के दर्शन कराए जाते हैं, जिसे परम्परा पाण्डवों के समय का बताती है।

परिसर में और उसके आसपास मन्दिर का अमृत कुण्ड तथा बिल्वतीर्थ, विश्वनाथतीर्थ और मुकुन्दतीर्थ जैसे अन्य पवित्र जलाशय हैं। यहाँ गंगा, जलेश्वर, रामेश्वर, गौतमेश्वर, केदारनाथ, राम, कृष्ण, परशुराम और लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर भी हैं। सन्त निवृत्तिनाथ की समाधि सहित नगर के मठ और सन्तों की समाधियाँ, और पत्थर के घाटों व दालानों वाला कुशावर्त तीर्थ — सब पैदल दूरी पर हैं।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • प्रातः पूजा — ब्रह्म पूजा

    सुबह 7:00–8:30

    ट्रस्ट की तीन दैनिक पूजाओं में पहली, ब्रह्मा को समर्पित। इसके बाद तीनों लिंगों वाले अर्घे पर चाँदी का पंचमुखी मुखौटा रखा जाता है। मन्दिर दर्शन के लिए सुबह 5:30 बजे खुलता है।

  • मध्याह्न पूजा — महादेव पूजा

    सुबह 10:45–दोपहर 12:30

    दूसरी दैनिक पूजा, जो शिव (महादेव) को समर्पित है।

  • सायं पूजा — विष्णु पूजा

    संध्या

    तीसरी दैनिक पूजा, विष्णु को समर्पित। रात 9 बजे मन्दिर बन्द होने तक दर्शन चलते हैं।

  • सोमवार की पालकी और मुकुट दर्शन

    सोमवार, दोपहर बाद

    हर सोमवार त्र्यम्बकराजा का स्वर्ण मुखौटा पालकी में कुशावर्त तीर्थ ले जाकर पूजा के बाद वापस लाया जाता है, और शाम से पहले त्रिदेवों के रत्नजड़ित मुकुट के दर्शन कराए जाते हैं।

  • नारायण नागबलि

    नगर के पुरोहितों द्वारा विशिष्ट शुभ तिथियों पर तीन दिनों में होने वाला अनुष्ठान। भक्त इसे प्रायश्चित्त या परिवार के कल्याण के लिए कराते हैं — जैसे सर्प की मृत्यु या परिवार में अकाल मृत्यु के बाद।

  • कालसर्प शान्ति और त्रिपिण्डी श्राद्ध

    पितरों की शान्ति और ग्रह-दोष निवारण के लिए स्थानीय पुरोहितों द्वारा कराए जाने वाले अनुष्ठान। इन्हें ट्रस्ट की पूजा-सेवा या मान्य पुरोहितों के माध्यम से ही बुक करें।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

माघ/फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)

महाशिवरात्रि

वर्ष का सबसे व्यस्त दिन। ट्रस्ट के अनुसार त्र्यम्बकराजा की पालकी नगर में निकलती है और रात 10 से 12 बजे तक मन्दिर में कीर्तन होता है।

कार्तिक (अक्टूबर–नवम्बर)

कार्तिक (त्रिपुरी) पूर्णिमा रथयात्रा

त्र्यम्बकराजा रथ में विराजकर नगर से होते हुए कुशावर्त पूजा के लिए जाते हैं; लौटने पर तीन दिन के कीर्तन के बाद शाम को मन्दिर के सामने की दीपमाला प्रज्वलित की जाती है।

श्रावण (जुलाई–अगस्त)

श्रावण सोमवार

सावन के सोमवारों को लम्बी कतारें लगती हैं और बहुत-से भक्त ब्रह्मगिरि की परिक्रमा करते हैं; इन दिनों पहाड़ सबसे हरे-भरे होते हैं। 2026 में ट्रस्ट ने पूरे श्रावण मास वीआईपी दर्शन बन्द रखा।

पौष (दिसम्बर–जनवरी)

निवृत्तिनाथ यात्रा

सन्त निवृत्तिनाथ की पुण्यतिथि पर बड़ी संख्या में वारकरी त्र्यम्बक में उनकी समाधि पर एकत्र होते हैं।

हर 12 वर्ष (जब बृहस्पति सिंह राशि में हों)

सिंहस्थ कुम्भ मेला

नासिक–त्र्यम्बकेश्वर कुम्भ में शैव अखाड़े कुशावर्त में अमृत (शाही) स्नान करते हैं। 2026–28 के सिंहस्थ का आरम्भ 31 अक्टूबर 2026 को ध्वजारोहण से तय था, और मुख्य स्नान अगस्त–सितम्बर 2027 में हैं।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा ओझर स्थित नासिक एयरपोर्ट है, जो सड़क से लगभग 50 किलोमीटर दूर है और जहाँ उड़ानें सीमित हैं। मुम्बई का छत्रपति शिवाजी महाराज अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 180 किलोमीटर (4–5 घंटे) दूर है और बेहतर जुड़ा है।
रेल मार्ग
नासिक रोड स्टेशन त्र्यम्बक से लगभग 39 किलोमीटर दूर है और मुम्बई, पुणे व देश के अन्य भागों से अच्छी तरह जुड़ा है। स्टेशन से त्र्यम्बक के लिए टैक्सी और बसें मिलती हैं।
सड़क मार्ग
त्र्यम्बकेश्वर नासिक के केन्द्रीय बस अड्डे से लगभग 28–30 किलोमीटर दूर है; एसटी बसें, साझा और निजी टैक्सियाँ लगातार चलती हैं। ठाणे से यह लगभग 157 और मुम्बई से लगभग 180 किलोमीटर है — मुम्बई–नासिक राजमार्ग से इगतपुरी होकर, या घोटी से त्र्यम्बक मार्ग द्वारा।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
मन्दिर पूरे वर्ष खुला रहता है (दर्शन सुबह 5:30 से रात 9 बजे तक)। श्रावण सहित मानसून (जुलाई–सितम्बर) बहुत सुन्दर होता है, पर भीड़ और फिसलन रहती है। अक्टूबर से फ़रवरी ठण्डा मौसम ब्रह्मगिरि चढ़ने के लिए सबसे अच्छा है। महाशिवरात्रि, श्रावण सोमवार और सिंहस्थ कुम्भ के वर्षों (अगला 2026 के अन्त से 2028 तक) में भारी भीड़ रहती है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • नारायण नागबलि, कालसर्प शान्ति या त्रिपिण्डी श्राद्ध कराना हो तो ट्रस्ट की ऑनलाइन पूजा-सेवा या मान्य पुरोहित के माध्यम से पहले से बुक करें; बस अड्डे पर दलालों से सावधान रहें।
  • कतार छोटी करने के लिए ट्रस्ट सशुल्क दान-दर्शन पास देता है, पर श्रावण सोमवार जैसे भीड़ वाले दिनों में यह बन्द हो सकता है — जाने से पहले trimbakeshwartrust.com देखें।
  • सोमवार को जाएँ तो त्र्यम्बकराजा की पालकी को कुशावर्त जाते देख सकते हैं, पर भीड़ अधिक होगी।
  • गंगाद्वार और गोदावरी के उद्गम के दर्शन के लिए ब्रह्मगिरि की चढ़ाई सुबह जल्दी शुरू करें; पानी साथ रखें और मानसून में गीली सीढ़ियों पर सावधानी बरतें।
  • नगर में कुशावर्त तीर्थ और सन्त निवृत्तिनाथ की समाधि के दर्शन करें। सिंहस्थ कुम्भ (2026–28) में भारी भीड़ और यातायात प्रतिबन्ध रहेंगे, इसलिए मुख्य स्नान-तिथियों को ध्यान में रखकर योजना बनाएँ।
  • नासिक के मन्दिरों (पंचवटी, कालाराम, रामकुण्ड) के साथ, और महाराष्ट्र के ज्योतिर्लिंगों की यात्रा में भीमाशंकर व घृष्णेश्वर के साथ इसे जोड़ें।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता क्या है?

अन्य ज्योतिर्लिंगों से अलग, त्र्यम्बकेश्वर के गर्भगृह में एक गड्ढे के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक तीन छोटे लिंग हैं। यह ब्रह्मगिरि पर गोदावरी नदी के उद्गम के पास भी है।

त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर की कथा क्या है?

शिव पुराण के अनुसार महर्षि गौतम पर गो-हत्या का झूठा आरोप लगा। प्रायश्चित्त के लिए वे गंगा को गोदावरी के रूप में यहाँ लाए और शिव की आराधना की। शिव ने उन्हें निर्दोष ठहराया और गौतम व देवताओं की प्रार्थना पर त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में यहीं विराज गए।

त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर के दर्शन का समय क्या है?

मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार दर्शन सुबह 5:30 से रात 9 बजे तक होते हैं। सुबह 7 से 8:30 ब्रह्म पूजा, 10:45 से 12:30 महादेव पूजा और शाम को विष्णु पूजा होती है। त्योहारों पर समय बदल सकता है।

नासिक से त्र्यम्बकेश्वर कैसे पहुँचें?

त्र्यम्बकेश्वर नासिक से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 28–30 किलोमीटर दूर है। नासिक से बसें और टैक्सियाँ लगातार चलती हैं; निकटतम रेलवे स्टेशन नासिक रोड लगभग 39 किलोमीटर दूर है।

वर्तमान त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर किसने बनवाया?

काले पत्थर का वर्तमान मन्दिर पेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) ने पुराने मन्दिर के स्थान पर बनवाया। मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार यह महाशिवरात्रि, 16 फ़रवरी 1756 को खोला गया; कुछ अन्य विवरणों के अनुसार काम 1786 तक चला।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग