शिव ताण्डव स्तोत्रम्
शिव के प्रचण्ड नृत्य का स्तोत्र, जिसे परम्परा रावण की रचना मानती है
शिव ताण्डव स्तोत्र भगवान शिव के प्रचण्ड ताण्डव नृत्य की स्तुति में रचित 17 श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है। परम्परा इसे लंकापति रावण की रचना मानती है, जो शिव के परम भक्त थे। पंचचामर छन्द के कारण इसकी लय डमरू की थाप जैसी है। स्वयं स्तोत्र प्रदोष काल में शिव-पूजा के बाद इसका पाठ करने को कहता है।

स्तोत्र का परिचय
ताण्डव शिव का प्रचण्ड, ब्रह्माण्डीय नृत्य है और स्तोत्र का अर्थ है स्तुति-गान: शिव ताण्डव स्तोत्र यानी शिव के ताण्डव की स्तुति। यह स्तोत्र अपने अर्थ जितना ही अपनी ध्वनि के लिए प्रसिद्ध है। लम्बे समास, अनुप्रास और ध्वन्यात्मक शब्द ('डमड् डमड्', 'धगद् धगद्', 'धिमिद् धिमिद्') डमरू, जलते तीसरे नेत्र और मृदंग की गूँज को शब्दों में उतार देते हैं।
नीचे दिया गया पाठ संस्कृत विकिस्रोत के 'सुसंशुद्ध' संस्करण के अनुसार है, और हर श्लोक को sanskritdocuments.org के संस्करण (गिरीश बीहारी और सुशील डी. शर्मा द्वारा संशोधित) से मिलाया गया है। दोनों में वही 17 श्लोक हैं। जहाँ शब्दों में अन्तर है, वहाँ विकिस्रोत का पाठ छापा गया है और दूसरा पाठ 'पाठभेद' में दिया गया है। सभी 17 श्लोक दोनों स्रोतों से प्रमाणित हुए, इसलिए सम्पूर्ण स्तोत्र दिया गया है।
श्लोक 1-5: नृत्य और नर्तक
आरम्भ के श्लोक नृत्य में लीन शिव का चित्र खींचते हैं: जटाओं से बहती गंगा, आभूषण बने सर्प और चन्द्रमा, ललाट पर अग्नि और गूँजता डमरू।
जटाऽटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥
jaṭā'ṭavīgalajjalapravāhapāvitasthale gale'valambya lambitāṃ bhujaṅgatuṅgamālikām | ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamanninādavaḍḍamarvayaṃ cakāra caṇḍatāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam ||1 ||
अर्थ: जिनकी वन-सी घनी जटाओं से बहती गंगा की धारा से पवित्र हुए कण्ठ-प्रदेश पर सर्पों की ऊँची माला लटक रही है, और जिन्होंने डमरू के 'डमड् डमड् डमड्' नाद के साथ प्रचण्ड ताण्डव किया, वे शिव हमारा कल्याण करें।
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥
jaṭākaṭāhasambhramabhramannilimpanirjharīvilolavīcivallarīvirājamānamūrddhani | dhagaddhagaddhagajjvalallalāṭapaṭṭapāvake kiśoracandraśekhare ratiḥ pratikṣaṇaṃ mama ||2 ||
अर्थ: जिनका मस्तक जटा रूपी कड़ाह में वेग से घूमती देवनदी गंगा की चंचल लहरों से सुशोभित है, जिनके ललाट पर 'धगद् धगद्' करती अग्नि प्रज्वलित है, और जिनके शीश पर बाल-चन्द्रमा विराजमान है, उन शिव में मेरी प्रीति प्रतिक्षण बनी रहे।
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥
dharādharendranandinīvilāsabandhubandhurasphuraddigantasantatipramodamānamānase | kṛpākaṭākṣadhoraṇīniruddhadurdharāpadi kvaciddigambare mano vinodametu vastuni ||3 ||
अर्थ: जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती के विलास के सुन्दर साथी हैं, जिनका मन दसों दिशाओं के प्रकाशमान विस्तार से आनन्दित रहता है, और जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा कठिन से कठिन विपत्ति को भी रोक देती है, उन दिगम्बर शिव में मेरा मन आनन्द पाए।
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभाकदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरासुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥
jaṭābhujaṅgapiṅgalasphuratphaṇāmaṇiprabhākadambakuṅkumadravapraliptadigvadhūmukhe | madāndhasindhurāsuratvaguttarīyamedure mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūtabhartari ||4 ||
अर्थ: जिनकी जटाओं में लिपटे पीले सर्पों के फणों की मणियों की प्रभा दिशा रूपी वधुओं के मुख पर कुमकुम-सा लेप कर रही है, और जो मदमस्त गजासुर की चमड़ी को उत्तरीय की तरह ओढ़े हैं, उन भूतनाथ में मेरा मन अद्भुत आनन्द पाए।
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखरप्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥
sahasralocanaprabhṛtyaśeṣalekhaśekharaprasūnadhūlidhoraṇīvidhūsarāṅghripīṭhabhūḥ | bhujaṅgarājamālayā nibaddhajāṭajūṭakaḥ śriye cirāya jāyatāṃ cakorabandhuśekharaḥ ||5 ||
अर्थ: जिनके चरणों की चौकी इन्द्र आदि समस्त देवताओं के मस्तक पर सजे फूलों के पराग से धूसर है, जिनकी जटा नागराज की माला से बँधी है, और जिनके शीश पर चकोर का बन्धु चन्द्रमा है, वे शिव चिरकाल तक हमें श्री प्रदान करें।
श्लोक 6-10: काम और काल के विनाशक
इन श्लोकों में तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म करने और पार्वती के साथ शिव के प्रेम का स्मरण है, और अन्त में दो लम्बी नामावलियाँ हैं जो शिव को काम, त्रिपुर, संसार-बन्धन और स्वयं मृत्यु का नाश करने वाला बताती हैं।
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभानिपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः ॥६॥
lalāṭacatvarajvaladdhanañjayasphuliṅgabhānipītapañcasāyakaṃ namannilimpanāyakam | sudhāmayūkhalekhayā virājamānaśekharaṃ mahaḥ kapāli sampade sarijjaṭālamastu naḥ ||6 ||
अर्थ: जिन्होंने ललाट रूपी आँगन में जलती अग्नि की चिनगारियों से पंचबाण कामदेव को भस्म कर दिया, जिन्हें देवराज इन्द्र प्रणाम करते हैं, और जिनका शीश अमृत-किरणों वाले चन्द्रमा की कला से सुशोभित है, वे गंगा-धारी कपाली शिव का तेज हमें सम्पदा दे।
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥
karālabhālapaṭṭikādhagaddhagaddhagajjvaladdhanañjayāhutīkṛtapracaṇḍapañcasāyake | dharādharendranandinīkucāgracitrapatrakaprakalpanaikaśilpini trilocane ratirmama ||7 ||
अर्थ: जिन्होंने अपने विकराल भाल-पट्ट पर 'धगद् धगद्' जलती अग्नि में प्रचण्ड कामदेव की आहुति दे दी, और जो पर्वतराज-नन्दिनी पार्वती के वक्ष पर पत्र-रचना (शृंगार-चित्र) बनाने वाले अद्वितीय शिल्पी हैं, उन त्रिलोचन में मेरी प्रीति हो।
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥
navīnameghamaṇḍalīniruddhadurdharasphuratkuhūniśīthinītamaḥprabandhabaddhakandharaḥ | nilimpanirjharīdharastanotu kṛttisindhuraḥ kalānidhānabandhuraḥ śriyaṃ jagaddhurandharaḥ ||8 ||
अर्थ: जिनका कण्ठ नए मेघों से घिरी अमावस की आधी रात के घने अन्धकार-सा श्याम है, जो देवनदी गंगा को धारण करते हैं, गज-चर्म ओढ़ते हैं, चन्द्रमा से सुन्दर हैं और जगत का भार उठाते हैं, वे शिव हमें श्री प्रदान करें।
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभाऽवलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥
praphullanīlapaṅkajaprapañcakālimaprabhā'valambikaṇṭhakandalīruciprabaddhakandharam | smaracchidaṃ puracchidaṃ bhavacchidaṃ makhacchidaṃ gajacchidāndhakacchidaṃ tamantakacchidaṃ bhaje ||9 ||
अर्थ: जिनका कण्ठ खिले हुए नीले कमलों की श्यामल आभा जैसा शोभित है, जो कामदेव, त्रिपुर, संसार-बन्धन, दक्ष-यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर और स्वयं यमराज का भी नाश करने वाले हैं, उन शिव को मैं भजता हूँ।
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरीरसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥
akharvasarvamaṅgalākalākadambamañjarīrasapravāhamādhurīvijṛmbhaṇāmadhuvratam | smarāntakaṃ purāntakaṃ bhavāntakaṃ makhāntakaṃ gajāntakāndhakāntakaṃ tamantakāntakaṃ bhaje ||10 ||
अर्थ: जो सर्वमंगला पार्वती की कलाओं रूपी कदम्ब-मंजरी से बहते रस की मधुरता का पान करने वाले भ्रमर हैं, और कामदेव, त्रिपुर, संसार, यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर तथा यमराज का अन्त करने वाले हैं, उन शिव को मैं भजता हूँ।
श्लोक 11-15: प्रभु के लिए व्याकुलता
श्लोक 11 में नृत्य चरम पर पहुँचता है, फिर कवि भीतर की ओर मुड़ता है: पत्थर और रेशम को समान देखने वाले समभाव की कामना (12), और गंगा-तट पर 'शिव' जपते हुए भक्ति-जीवन की चाह (13)।
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गलध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥
jayatvadabhravibhramabhramadbhujaṅgamaśvasadvinirgamatkramasphuratkarālabhālahavyavāṭ | dhimiddhimiddhimiddhvananmṛdaṅgatuṅgamaṅgaladhvanikramapravartitapracaṇḍatāṇḍavaḥ śivaḥ ||11 ||
अर्थ: उन शिव की जय हो, जिनके ललाट की विकराल अग्नि वेग से घूमते सर्पों की फुफकार से और भड़क उठती है, और जिनका प्रचण्ड ताण्डव मृदंग की 'धिमिद् धिमिद् धिमिद्' की मंगल ध्वनि के क्रम से चल रहा है।
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥
dṛṣadvicitratalpayorbhujaṅgamauktikasrajorgariṣṭharatnaloṣṭhayoḥ suhṛdvipakṣapakṣayoḥ | tṛṇāravindacakṣuṣoḥ prajāmahīmahendrayoḥ samapravṛttikaḥ kadā sadāśivaṃ bhajāmyaham ||12 ||
अर्थ: पत्थर और सुन्दर शय्या, सर्प और मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी का ढेला, मित्र और शत्रु, तिनका और कमलनयनी सुन्दरी, प्रजा और सम्राट: इन सबके प्रति समभाव रखते हुए मैं कब सदाशिव का भजन करूँगा?
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥
kadā nilimpanirjharīnikuñjakoṭare vasan vimuktadurmatiḥ sadā śiraḥsthamañjaliṃ vahan | vimuktalolalocanālalāmabhālalagnakaṃ śiveti mantramuccaran kadā sukhī bhavāmyaham ||13 ||
अर्थ: देवनदी गंगा के तट पर किसी कुंज की गुफा में रहते हुए, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सदा सिर पर हाथ जोड़े, चंचल नेत्रों को सुन्दर ललाट वाले प्रभु में लगाए, 'शिव' मन्त्र का उच्चारण करते हुए मैं कब सुखी होऊँगा?
निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिकानिगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥
nilimpanāthanāgarīkadambamaulamallikānigumphanirbharakṣaranmadhūṣṇikāmanoharaḥ | tanotu no manomudaṃ vinodinīmaharniśaṃ paraśriyaḥ paraṃ padaṃ tadaṅgajatviṣāṃ cayaḥ ||14 ||
अर्थ: देवांगनाओं के केशों में गुँथी मल्लिका-मालाओं से टपकते मधु-कणों से मनोहर, परम श्री का परम धाम, शिव के अंगों की वह कान्ति-राशि दिन-रात हमारे मन को आनन्द दे।
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनीजनाऽवहूतजल्पना। विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥
pracaṇḍavāḍavānalaprabhāśubhapracāraṇī mahāṣṭasiddhikāminījanā'vahūtajalpanā | vimuktavāmalocanāvivāhakālikadhvaniḥ śiveti mantrabhūṣaṇā jagajjayāya jāyatām ||15 ||
अर्थ: प्रचण्ड बड़वानल की प्रभा जैसी शुभ फैलने वाली, आठों महासिद्धियों रूपी कन्याओं के मंगल-गान से गूँजती, 'शिव' मन्त्र से अलंकृत वह विवाह-काल की ध्वनि जगत की विजय के लिए हो।
श्लोक 16-17: फलश्रुति
अन्तिम दो श्लोक पाठ का फल बताते हैं। श्लोक 17 दूसरे छन्द में है और इसमें गायक का नाम 'दशवक्त्र' यानी दस मुखों वाला रावण आता है।
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नाऽन्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१६॥
imaṃ hi nityamevamuktamuttamottamaṃ stavaṃ paṭhansmaranbruvannaro viśuddhimetisantatam | hare gurau subhaktimāśu yāti nā'nyathā gatiṃ vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṅkarasya cintanam ||16 ||
अर्थ: जो मनुष्य इस उत्तमोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण या कथन करता है, वह सदा के लिए शुद्ध हो जाता है और शीघ्र ही गुरु रूप हर (शिव) की सच्ची भक्ति पाता है; इसके अतिरिक्त कोई गति नहीं। शंकर का चिन्तन ही देहधारियों का मोह दूर करता है।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं प्रसादसमये प्रददाति शम्भुः ॥
pūjāvasānasamaye daśavaktragītaṃ yaḥ śambhupūjanaparaṃ paṭhati pradoṣe | tasya sthirāṃ rathagajendraturaṅgayuktāṃ lakṣmīṃ prasādasamaye pradadāti śambhuḥ ||
अर्थ: जो प्रदोष काल में पूजा के अन्त में दशमुख रावण द्वारा गाए इस शम्भु-पूजा-परक स्तोत्र का पाठ करता है, उसे प्रसन्न होकर शम्भु रथ, गज और अश्वों से युक्त स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं।
रावण और कैलास की कथा
रामायण के उत्तरकाण्ड और बाद की कथाओं के अनुसार, अपने सौतेले भाई कुबेर को हराकर पुष्पक विमान से लौटते रावण का मार्ग कैलास पर्वत के पास रुक गया। क्रोध में उसने पर्वत को उठाने का प्रयास किया। शिव ने अँगूठे से पर्वत को दबा दिया और रावण की भुजाएँ उसके नीचे दब गईं। रावण ने भीषण चीत्कार की (परम्परा इसी से 'रावण' नाम की उत्पत्ति मानती है) और शिव की स्तुति करता रहा, जब तक प्रसन्न होकर शिव ने उसे मुक्त नहीं किया और चन्द्रहास खड्ग प्रदान नहीं किया। लोक-परम्परा उन्हीं स्तुतियों को शिव ताण्डव स्तोत्र मानती है। यह दृश्य, 'रावणानुग्रह', मन्दिर-शिल्प का प्रिय विषय है, विशेषकर एलोरा में।
विद्वान और कुछ परम्परागत पण्डित रचयिता के प्रश्न पर सतर्क हैं। रावण का नाम केवल अन्तिम श्लोक ('दशवक्त्रगीतं') में आता है, जो बाकी स्तोत्र से अलग छन्द में है, और श्लोक 1-16 में रावण या रामायण का कोई उल्लेख नहीं है। इसलिए इसे रावण की रचना 'परम्परा से' कहना उचित है।
छन्द और शैली
श्लोक 1 से 16 पंचचामर छन्द में हैं: हर पंक्ति में सोलह अक्षर, जिनमें लघु और गुरु बारी-बारी से आते हैं, यानी हर पंक्ति में आठ लघु-गुरु जोड़े। इसी से स्तोत्र की दौड़ती, डमरू-सी लय बनती है। अन्तिम श्लोक वसन्ततिलका छन्द में है। श्लोक 9 और 10 समानान्तर सूचियों पर बने हैं, '…च्छिदं' (काटने वाले) और '…अन्तकं' (अन्त करने वाले), जिन्हें पाठ करने वाले प्रायः बढ़ती गति से बोलते हैं।
पाठभेद
दोनों संस्करणों के प्रमुख अन्तर:
- श्लोक 3: 'क्वचिद्दिगम्बरे'
- कुछ संस्करणों में 'क्वचिच्चिदम्बरे' पाठ है, अर्थात् चिदम्बर (चेतना के आकाश) में, जो चिदम्बरम् के नटराज से जुड़ा नाम है।
- श्लोक 4: 'मदान्धसिन्धुरासुरत्वगुत्तरीयमेदुरे'
- विकिस्रोत में 'सिन्धुरासुर' (गजासुर) है; sanskritdocuments में 'सिन्धुरस्फुरत्त्वग्' (हाथी की चमकती खाल) है और दूसरा पाठ टिप्पणी में दिया है।
- श्लोक 5: 'श्रिये चिराय जायताम्'
- sanskritdocuments में 'श्रियै' छपा है; दोनों का अर्थ 'श्री के लिए' है।
- श्लोक 6 की अन्तिम पंक्ति
- विकिस्रोत: 'महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः'। sanskritdocuments: 'महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः' (महाकपाली का जटाधारी शीश हमें सम्पदा दे), और विकिस्रोत वाला पाठ पाठान्तर के रूप में।
- श्लोक 13 की तीसरी पंक्ति
- विकिस्रोत: 'विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं'। sanskritdocuments: 'विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः'।
- श्लोक 17 की अन्तिम पंक्ति
- विकिस्रोत: 'लक्ष्मीं प्रसादसमये प्रददाति शम्भुः'। sanskritdocuments: 'लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः' (सदा प्रसन्न रहने वाली लक्ष्मी)।
- अतिरिक्त श्लोक
- कुछ पाठों में 'नमामि पार्वतीपतिं नमामि जाह्नवीपतिं…' और 'रावणेन कृतं स्तोत्रं…' भी जुड़े हैं, जिससे 18-19 श्लोक हो जाते हैं। sanskritdocuments के अनुसार 15 से 19 श्लोकों तक के पाठ मिलते हैं। यहाँ केवल वे 17 श्लोक दिए गए हैं जो दोनों स्रोतों में समान हैं।
पाठ-विधि और समय
स्तोत्र स्वयं (श्लोक 17) कहता है कि प्रदोष काल में, यानी त्रयोदशी की सन्ध्या को, शिव-पूजा के अन्त में इसका पाठ करें। सोमवार, पूरे श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर भी इसका पाठ बहुत प्रचलित है, और बहुत से भक्त रोज़ सुबह या शाम की पूजा के बाद इसे पढ़ते हैं।
1. स्नान के बाद शिवलिंग या शिव-चित्र पर जल, दूध या बिल्वपत्र चढ़ाएँ और दीपक जलाएँ। 2. स्थिर बैठकर धीरे-धीरे आरम्भ करें। समास लम्बे हैं, इसलिए किसी आचार्य या रिकॉर्डिंग से एक-एक श्लोक सीखें और हर पंक्ति को आठ-आठ अक्षरों के स्वाभाविक भागों में तोड़कर पढ़ें। 3. सभी श्लोकों का एक बार पाठ करें। बहुत से लोग रोज़ एक बार, और विशेष दिनों पर 3, 5 या 11 बार पाठ करते हैं। 4. अन्त में 'ॐ नमः शिवाय' या आरती करें।
संस्कृत में शुद्ध उच्चारण आवश्यक है; गलतियों के साथ तेज़ पढ़ने से अच्छा है धीरे और स्पष्ट पढ़ना।
परम्परा में वर्णित फल
फलश्रुति के अनुसार जो इसका नित्य पाठ, स्मरण या कथन करता है, वह शुद्ध होता है और शीघ्र शिव-भक्ति पाता है (16), और जो प्रदोष में इसका पाठ करता है, उसे 'रथ, गज और अश्व' सहित स्थिर लक्ष्मी मिलती है (17)। भक्त यह भी मानते हैं कि इसका पाठ:
- ऊर्जा, साहस और आत्मविश्वास भरता है; - भय और नकारात्मकता दूर करता है, क्योंकि श्लोक 9-10 में शिव स्वयं काल के भी विनाशक हैं; - श्लोक 12 में वर्णित समभाव जगाता है; - शिव की कृपा और अन्ततः मोह से मुक्ति देता है।
ये श्रद्धा और परम्परा की बातें हैं, निश्चित परिणाम का वादा नहीं।
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
शिव ताण्डव स्तोत्र किसने लिखा?
परम्परा के अनुसार लंकापति रावण ने, जो शिव के परम भक्त थे; अन्तिम श्लोक इसे 'दशवक्त्र' (दस मुखों वाले) का गीत कहता है। विद्वानों के अनुसार रावण का यही एकमात्र उल्लेख है, इसलिए यह मान्यता परम्परागत है।
शिव ताण्डव स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?
प्रचलित पाठ में 17 श्लोक हैं, जो यहाँ पूरे दिए गए हैं। कुछ पाठों में 15, 18 या 19 श्लोक मिलते हैं।
शिव ताण्डव स्तोत्र का अर्थ क्या है?
इसमें शिव के प्रचण्ड नृत्य और उनके आभूषणों (गंगा, चन्द्रमा, सर्प, तीसरा नेत्र) का वर्णन है, उन्हें काम और काल का विनाशक कहा गया है, और भक्ति तथा समभाव की प्रार्थना की गई है।
शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
श्लोक 17 के अनुसार प्रदोष काल में शिव-पूजा के बाद। सोमवार, श्रावण मास और महाशिवरात्रि भी प्रचलित हैं, और बहुत से लोग रोज़ पाठ करते हैं।
क्या कोई भी शिव ताण्डव स्तोत्र पढ़ सकता है?
हाँ। यह भक्ति-स्तोत्र है, प्रतिबन्धित वैदिक मन्त्र नहीं, और हर कोई इसका पाठ करता है। शुद्ध उच्चारण पर ध्यान देना अच्छा है।
शिव ताण्डव स्तोत्र किस छन्द में है?
पंचचामर छन्द में, जिसकी हर पंक्ति में सोलह अक्षर लघु-गुरु क्रम में आते हैं; इसी से डमरू जैसी लय बनती है। अन्तिम श्लोक वसन्ततिलका में है।
स्रोत
- https://sa.wikisource.org/wiki/शिवताण्डवस्तोत्रम्
- https://sanskritdocuments.org/doc_shiva/shivtAND.html
- https://en.wikipedia.org/wiki/Shiva_Tandava_Stotra
- https://advaita-vedanta.org/archives/advaita-l/2024-November/062732.html
- https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Ravanan_-_King_of_Lanka.jpg
अंतिम शोध: 2026-10-29