मेरी श्रद्धा

बाबा बैद्यनाथ धाम (वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग)

जहाँ रावण का लाया शिवलिंग सदा के लिए ठहर गया, और सावन में गूँजता है 'बोल बम'।

झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसे शक्तिपीठ भी माना जाता है, जहाँ माता सती का हृदय गिरा था। दुर्लभ पंचशूल से सुशोभित मुख्य मंदिर एक प्रांगण में 21 अन्य मंदिरों से घिरा है। हर सावन लाखों काँवरिए सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर पैदल चलते हैं और बाबा पर जल चढ़ाते हैं।

बाबा बैद्यनाथ धाम (वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग)
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

देवघर ज़िला प्रशासन के शब्दों में बैद्यनाथ धाम की उत्पत्ति प्राचीनता के अंधकार में खोई हुई है। 'देवघर' यानी देवताओं का घर, यह नाम भी संभवतः इसी महान मंदिर से पड़ा। मत्स्य पुराण में इस स्थान को 'आरोग्य बैद्यनाथिती' कहा गया है, जो इसे आरोग्य से जोड़ता है; 'वैद्यनाथ' का अर्थ भी 'वैद्यों के स्वामी' है। शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा मिलती है।

सदियों तक यह क्षेत्र गिद्धौर के राजाओं के अधीन रहा, जिनका मंदिर से गहरा नाता था। ज़िला प्रशासन के अनुसार मंदिर के अगले भाग के कुछ हिस्से सन् 1596 में गिद्धौर के महाराजा के पूर्वज पूरनमल ने बनवाए थे, और शिखर पर लगे तीन स्वर्ण कलश भी गिद्धौर के महाराजा की भेंट हैं। मूल मंदिर किसने बनवाया, इसका पता नहीं चलता।

18वीं सदी के अंत तक यह मंदिर प्रसिद्ध तीर्थ बन चुका था। 1782 में ब्रिटिश चित्रकार विलियम हॉजेस ने अपनी भारत यात्रा के दौरान देवघर के मंदिरों के चित्र बनाए, जो इस स्थान के सबसे पुराने यूरोपीय चित्रों में गिने जाते हैं। पुराने मंदिर-इतिहासों में दर्ज वृत्तांतों के अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी के बीरभूम स्थित अधिकारियों ने 1780 के दशक में कुछ समय तक तीर्थयात्रियों के चढ़ावे की वसूली पर नज़र रखने की कोशिश की, पर बाद में मंदिर का प्रबंध मुख्य पुजारी को ही सौंप दिया।

मंदिर के जीवन में पुरोहित परिवारों की भूमिका हमेशा केंद्रीय रही है। मुख्य परिसर के पश्चिम में, देवघर के मुख्य बाज़ार में तीन मंदिर हैं जिन्हें बैजू मंदिर कहा जाता है; कहा जाता है कि इन्हें मंदिर के मुख्य पुजारी के वंशजों ने बनवाया था और तीनों में शिवलिंग प्रतिष्ठित है।

आज मंदिर का प्रबंध बाबा बैद्यनाथ मंदिर प्रबंधन बोर्ड करता है, जो देवघर ज़िला प्रशासन के साथ मिलकर काम करता है। श्रावणी मेले के दौरान प्रशासन देश की सबसे बड़ी भीड़-व्यवस्थाओं में से एक चलाता है: 2025 में 12,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए, वीआईपी दर्शन बंद रहा और सामान्य कतार के साथ 'शीघ्र दर्शनम' का सशुल्क कूपन उपलब्ध कराया गया। जुलाई 2022 में खुले देवघर हवाई अड्डे से यहाँ पहुँचना काफ़ी आसान हो गया है।

कई अन्य ज्योतिर्लिंगों की तरह वैद्यनाथ के भी एक से अधिक दावेदार हैं। देवघर सबसे व्यापक रूप से मान्य स्थान है, जबकि महाराष्ट्र का परली वैजनाथ स्तोत्र की पंक्ति 'परल्यां वैद्यनाथं' के आधार पर अपना दावा करता है, और हिमाचल प्रदेश का बैजनाथ भी इस नाम से जुड़ा है। हर धाम पर भक्त समान श्रद्धा से पूजा करते हैं।

पौराणिक कथा

शिव पुराण और लोक परंपरा के अनुसार लंकापति रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया और एक-एक कर अपने सिर यज्ञ की अग्नि में अर्पित करने लगा। जब वह दसवाँ सिर चढ़ाने वाला था, तब शिवजी प्रकट हुए, उसे पूर्ववत कर दिया और वैद्य बनकर उसके घाव भरे; 'वैद्यनाथ' नाम की एक व्याख्या यही है। रावण ने शिवलिंग को लंका ले जाने का वर माँगा। शिवजी ने शर्त रखी कि रास्ते में यदि लिंग कहीं धरती पर रखा गया तो वह सदा के लिए वहीं स्थिर हो जाएगा।

देवता चिंतित हुए कि शिव के सान्निध्य से रावण अजेय हो जाएगा, और वे विष्णु की शरण में गए। रास्ते में आचमन करते समय वरुण देव रावण के शरीर में प्रवेश कर गए और देवघर के पास उसे लघुशंका की तीव्र इच्छा हुई। बैजू नाम के एक ग्वाले ने, जिसे अनेक कथाओं में वेश बदले विष्णु माना जाता है, लिंग थामना स्वीकार किया। रावण को लौटने में बहुत देर हुई तो बैजू लिंग को धरती पर रखकर चला गया। लौटकर रावण ने पूरी शक्ति लगाई, पर लिंग टस से मस न हुआ; खीझकर उसने उस पर अँगूठा दबाया और चला गया। फिर ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं ने यहीं लिंग की पूजा कर उसकी प्रतिष्ठा की। 'बैद्यनाथ' नाम को अक्सर बैजू और भगवान के नाम के मेल से भी जोड़ा जाता है।

देवघर की गिनती शक्तिपीठों में भी होती है। दक्ष यज्ञ की कथा में जब शोकाकुल शिव सती का शरीर लेकर घूम रहे थे, तब उनके अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे; मान्यता है कि यहाँ सती का हृदय गिरा, इसलिए इसे हृदयपीठ भी कहते हैं। शक्तिपीठ सूचियों के अनुसार यहाँ देवी जयदुर्गा और भैरव वैद्यनाथ के रूप में पूजे जाते हैं।

भक्त इस लिंग को 'कामना लिंग' कहते हैं, यानी मनोकामना पूरी करने वाला। मान्यता है कि सुल्तानगंज से पैदल लाया गया गंगाजल सच्चे मन से चढ़ाने पर बाबा को विशेष प्रिय होता है।

स्थापत्य कला

बैद्यनाथ धाम एक इमारत नहीं, मंदिरों का समूह है: बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर एक पक्के प्रांगण में है, जिसके चारों ओर माता पार्वती (जयदुर्गा), लक्ष्मी-नारायण आदि के 21 अन्य मंदिर हैं। ज़िला प्रशासन के अनुसार मुख्य मंदिर पूर्वमुखी है और पत्थर से बना सादा ढाँचा है, जिसका पिरामिडनुमा शिखर लगभग 72 फ़ुट ऊँचा है। गर्भगृह में वह ज्योतिर्लिंग है, जिस पर हर तीर्थयात्री गंगाजल चढ़ाता है।

मुख्य शिखर पर ऊपर-नीचे क्रम से तीन स्वर्ण कलश हैं, जो गिद्धौर के महाराजा ने भेंट किए थे। इनके साथ पाँच नोकों वाला पंचशूल और आठ पंखुड़ियों वाला कमल-रत्न 'चंद्रकांत मणि' भी है। ज़्यादातर शिव मंदिरों पर त्रिशूल होता है, पर यहाँ शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण आदि मंदिरों पर पंचशूल लगे हैं, जिन्हें महाशिवरात्रि से पहले उतारकर विशेष पूजा की जाती है।

शिव और पार्वती मंदिरों को लाल पवित्र वस्त्र से जोड़ा जाता है, जिसे गठबंधन कहते हैं; भक्त सुखी दांपत्य की कामना से इसे चढ़ाते हैं। पास ही शिवगंगा सरोवर है, जहाँ काँवरिए मंदिर में प्रवेश से पहले स्नान करते हैं।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • मंगला आरती और प्रातः पट खुलना

    लगभग सुबह 4:00 बजे (बदल सकता है)

    दिन की शुरुआत पुजारियों की प्रातः पूजा से होती है, जिसके बाद लगभग 4 बजे भक्तों के लिए दर्शन शुरू होते हैं। सावन में मंगला आरती के बाद पट खोले जाते हैं।

  • गंगाजल से जलाभिषेक

    दर्शन के समय

    बाबा धाम की सबसे प्रमुख पूजा। भक्त अजगैबीनाथ, सुल्तानगंज से लाया गंगाजल ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाते हैं।

  • शृंगार पूजा

    शाम (श्रावणी मेले में रात 8 बजे से)

    शाम को पुजारी ज्योतिर्लिंग का शृंगार कर पूजा करते हैं। 2025 के श्रावणी मेले में सामान्य पूजा सुबह लगभग 4 से रात 8 बजे तक और उसके बाद रात 8 से 12 बजे तक शृंगार पूजा हुई।

  • काँवर यात्रा

    सावन

    भक्त सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा से काँवर भरते हैं और 'बोल बम' का जयकारा लगाते हुए लगभग 105 किलोमीटर पैदल देवघर आते हैं; रास्ते भर काँवर ज़मीन से नहीं छूने दी जाती। 'डाक बम' बिना रुके 24 घंटे के भीतर यह दूरी तय करते हैं।

  • पंचशूल पूजा

    महाशिवरात्रि से पहले

    मंदिरों के शिखर से पंचशूल उतारे जाते हैं, उनकी विशेष पूजा होती है और फिर उन्हें पुनः स्थापित किया जाता है। इस दौरान पंचशूल को छूने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है।

  • गठबंधन

    लाल पवित्र वस्त्र से शिव और पार्वती मंदिरों को जोड़ा जाता है। भक्त सुखी दांपत्य के लिए इसे चढ़ाते हैं, और महाशिवरात्रि पर यह नया बाँधा जाता है।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

सावन (जुलाई–अगस्त)

श्रावणी मेला

महीने भर चलने वाला मेला और देश की सबसे बड़ी तीर्थयात्राओं में से एक। गेरुआ वस्त्रधारी काँवरिए सुल्तानगंज से जल भरकर बिहार होते हुए झारखंड तक लगभग 105 किलोमीटर चलते हैं, शिवगंगा में स्नान करते हैं और बाबा को जल चढ़ाते हैं। सोमवार को सबसे अधिक भीड़ रहती है: 2026 में सावन के दूसरे सोमवार को सुबह 7 बजे तक ही लगभग एक लाख भक्त जल चढ़ा चुके थे।

फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)

महाशिवरात्रि

पंचशूल पूजा, गठबंधन के नवीनीकरण, रात भर की पूजा और शिव-विवाह के उत्सव के साथ मनाई जाती है।

माघ (जनवरी–फ़रवरी)

बसंत पंचमी तिलकोत्सव

मिथिला के भक्त, जो कन्या पक्ष बनकर आते हैं और शिव को अपना दामाद मानते हैं, सजी हुई काँवर लेकर आते हैं, जल चढ़ाते हैं और तिलक करते हैं; इसी से शिव-पार्वती विवाह के उत्सवों की शुरुआत मानी जाती है।

आश्विन (सितंबर–अक्टूबर)

नवरात्रि

शक्तिपीठ होने के कारण देवघर में नवरात्रि पर देवी जयदुर्गा की विशेष पूजा होती है।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
2022 में शुरू हुआ देवघर हवाई अड्डा (DGH) शहर के केंद्र से लगभग 9 किलोमीटर दूर है, जहाँ से दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु, मुंबई और पटना जैसे शहरों के लिए उड़ानें हैं (उड़ानें बदलती रहती हैं, ताज़ा समय-सारणी देख लें)। राँची और पटना के बड़े हवाई अड्डे अधिक दूर हैं।
रेल मार्ग
हावड़ा–दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर स्थित जसीडीह जंक्शन मंदिर से लगभग 7–8 किलोमीटर दूर है और यहाँ कई मेल-एक्सप्रेस गाड़ियाँ रुकती हैं। बैद्यनाथ धाम और देवघर स्टेशन मंदिर के अधिक पास हैं, पर वहाँ गाड़ियाँ कम हैं।
सड़क मार्ग
देवघर सड़क मार्ग से दुमका, भागलपुर, धनबाद और राँची से जुड़ा है। काँवरिए सुल्तानगंज (भागलपुर ज़िला, बिहार) से लगभग 105 किलोमीटर पैदल आते हैं। बासुकीनाथ, जहाँ अधिकतर तीर्थयात्री आगे जाते हैं, देवघर–दुमका मार्ग पर लगभग 42–45 किलोमीटर दूर है।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
आराम से दर्शन के लिए अक्टूबर से मार्च का समय अच्छा है। सावन (जुलाई–अगस्त) सबसे पवित्र महीना है और श्रावणी मेला अविस्मरणीय अनुभव है, पर भारी भीड़, लंबी कतारें और उमस भरी गर्मी के लिए तैयार रहें; सोमवार को सबसे अधिक भीड़ होती है। महाशिवरात्रि और बसंत पंचमी पर भी बहुत भीड़ रहती है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • सावन में जा रहे हों तो लंबी कतारों और भारी भीड़ के लिए तैयार रहें; जल्दी निकलें, अपने साथियों के साथ रहें और उपलब्ध हो तो शीघ्र दर्शन कूपन पर विचार करें।
  • परंपरा के अनुसार काँवरिए पूरी यात्रा में गंगाजल की काँवर ज़मीन पर नहीं रखते और मंदिर में जाने से पहले शिवगंगा में स्नान करते हैं।
  • मान्यता है कि बैद्यनाथ की यात्रा बासुकीनाथ के दर्शन के बाद ही पूरी होती है, जो दुमका ज़िले में जरमुंडी के पास लगभग 42–45 किलोमीटर दूर है।
  • मंदिर परिसर के पश्चिम में मुख्य बाज़ार के तीन बैजू मंदिरों के दर्शन भी करें।
  • सावन और त्योहारों में दर्शन का समय बढ़ा दिया जाता है; जाने से पहले मंदिर बोर्ड या ज़िला प्रशासन की सूचना देख लें।
  • शालीन वस्त्र पहनें, जूते-चप्पल और चमड़े का सामान बाहर रखें, और 'विशेष दर्शन' का लालच देने वाले दलालों से सावधान रहें।

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श्रद्धालुओं के प्रश्न

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?

शिव पुराण और परंपरा के अनुसार रावण ने कठोर तप कर शिवजी से शिवलिंग लंका ले जाने का वर पाया, इस शर्त के साथ कि जहाँ रखा जाएगा वहीं स्थिर हो जाएगा। देवघर के पास बैजू नाम के ग्वाले ने रावण की अनुपस्थिति में लिंग धरती पर रख दिया और रावण उसे फिर कभी उठा न सका। बाद में देवताओं ने यहीं उसकी पूजा कर प्रतिष्ठा की।

सुल्तानगंज से देवघर काँवर यात्रा कितने किलोमीटर की है?

काँवरिए बिहार के सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा से बाबा बैद्यनाथ धाम तक लगभग 105 किलोमीटर (अक्सर 105–109 किलोमीटर बताया जाता है) पैदल चलते हैं। अधिकतर भक्त चार-पाँच दिन लेते हैं, जबकि 'डाक बम' बिना रुके 24 घंटे से कम में पहुँचते हैं।

बैद्यनाथ मंदिर के दर्शन का समय क्या है?

सामान्यतः प्रातः पूजा के बाद मंदिर लगभग सुबह 4 बजे खुलता है और रात में शृंगार पूजा के बाद बंद होता है; साधारण दिनों में दोपहर में कुछ देर के लिए पट बंद रहते हैं। सावन और त्योहारों में समय बढ़ा दिया जाता है, इसलिए स्थानीय रूप से ताज़ा समय पता कर लें।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग देवघर में है या परली में?

झारखंड का देवघर सबसे व्यापक रूप से मान्य स्थान है। महाराष्ट्र का परली वैजनाथ भी 'परल्यां वैद्यनाथं' पंक्ति के आधार पर वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग होने का दावा करता है। भक्त दोनों धामों को पूजते हैं।

बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर कैसे पहुँचें?

देवघर हवाई अड्डे के लिए कई शहरों से सीधी उड़ानें हैं। मुख्य रेलवे स्टेशन जसीडीह जंक्शन है, जो हावड़ा–दिल्ली मुख्य मार्ग पर मंदिर से लगभग 7–8 किलोमीटर दूर है। दोनों जगहों से मंदिर के लिए ऑटो और टैक्सी मिलती हैं।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग