मेरी श्रद्धा

भीमाशंकर मन्दिर

सह्याद्रि के घने वनों में विराजे भीमाशंकर — जहाँ से भीमा नदी का उद्गम होता है।

पुणे से लगभग 110 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में, सह्याद्रि (पश्चिमी घाट) की ऊँची चोटी पर स्थित भीमाशंकर मन्दिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। भीमा नदी का उद्गम यहीं से होता है, और मन्दिर भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य के भीतर सदाबहार जंगलों व धुँध से ढकी पहाड़ियों के बीच बसा है। काले पत्थर का यह मन्दिर अठारहवीं शताब्दी में मराठा संरक्षण में नए रूप में ढला, और आज श्रद्धालुओं, ट्रेकरों और प्रकृति-प्रेमियों — सबको आकर्षित करता है।

भीमाशंकर मन्दिर
चित्र: Wikimedia Commons

इतिहास

भीमाशंकर तीर्थ और भीमरथी (भीमा) नदी का उल्लेख लगभग तेरहवीं शताब्दी से मराठी धार्मिक साहित्य में मिलता है। वारकरी सन्त नामदेव के अनुसार सन्त ज्ञानेश्वर त्र्यम्बकेश्वर के बाद भीमाशंकर आए थे, और स्वयं नामदेव ने भी यहाँ की यात्रा की थी। फिर भी आज दिखाई देने वाला अधिकांश ढाँचा बाद का है — मराठा काल के पुनर्निर्माण और विस्तार का परिणाम।

मन्दिर को राजकीय संरक्षण मिला। छत्रपति शिवाजी महाराज ने पूजा-व्यवस्था के लिए खरोशी गाँव मन्दिर को दान में दिया, और आसपास के गाँवों के चढ़ावे से लम्बे समय तक नित्य पूजा चलती रही। अठारहवीं शताब्दी में पेशवा के मन्त्री नाना फडणवीस ने बड़े निर्माण कार्य कराए — गर्भगृह के ऊपर का शिखर और उसके आगे का मण्डप उन्हीं की देन माने जाते हैं। पेशवा काल के अन्य अधिकारियों ने भी मरम्मत के लिए धन दिया।

मन्दिर के सामने टँगा एक विशाल यूरोपीय घण्टा मराठा इतिहास की याद दिलाता है। इसे पेशवा बाजीराव प्रथम के भाई चिमाजी अप्पा ने भेंट किया था। 1739 में पुर्तगालियों से वसई का क़िला जीतने के बाद उनकी सेना वहाँ के गिरजाघरों से जो घण्टे लाई थी, यह उन्हीं में से एक है। ऐसे घण्टे नासिक के नारोशंकर मन्दिर और महाराष्ट्र के कुछ अन्य मन्दिरों में भी हैं।

मन्दिर ट्रस्ट के अपने विवरण के अनुसार मन्दिर का जीर्णोद्धार 1212 में हुआ और इसका सभामण्डप 1962 में बना। पेशवा काल के कार्यों के साथ ये तिथियाँ बताती हैं कि परिसर कई चरणों में बना-सँवरा है। पास के मनमाड गाँव की पहाड़ियों पर भीमाशंकर, भूतलिंग और अम्बा-अम्बिका की पुरानी शिल्पाकृतियाँ इस क्षेत्र की प्राचीन पवित्रता की गवाही देती हैं।

मन्दिर के चारों ओर के जंगल को 1985 में भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया, मुख्यतः महाराष्ट्र के राज्य पशु 'शेकरू' (भारतीय विशाल गिलहरी) की रक्षा के लिए। इसलिए श्रद्धालु एक संरक्षित वन से होकर मन्दिर पहुँचते हैं, और अभयारण्य के नियम यात्रियों पर भी लागू होते हैं।

मन्दिर का प्रबन्ध श्री भीमाशंकर देवस्थान ट्रस्ट करता है। भीमाशंकर क्षेत्र विकास योजना के तहत नए सभामण्डप और सीढ़ियों के निर्माण के लिए जनवरी 2026 में दर्शन बन्द किए गए। 15 जून 2026 को सीमित समय और अनिवार्य ऑनलाइन पास के साथ दर्शन फिर शुरू हुए, और अगस्त 2026 में श्रावण आरम्भ होते ही सुबह 5 से रात 9:30 बजे तक का पूरा समय बहाल कर दिया गया। वर्तमान व्यवस्था के लिए ट्रस्ट की वेबसाइट देखें।

पारम्परिक द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में 'डाकिन्यां भीमशंकरम्' कहा गया है। इसी के आधार पर असम में गुवाहाटी के पास का एक स्थान और उत्तराखण्ड के काशीपुर का मोटेश्वर महादेव मन्दिर भी यह ज्योतिर्लिंग होने का दावा करते हैं। फिर भी पुणे के पास सह्याद्रि का यह मन्दिर ही भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में सबसे व्यापक रूप से पूजा और दर्शन किया जाता है।

पौराणिक कथा

शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) की कथा सबसे प्रसिद्ध है। कुम्भकर्ण का पुत्र राक्षस भीम जब जान गया कि उसके पिता का वध विष्णु के अवतार श्रीराम ने किया था, तो उसने देवताओं से बदला लेने की ठानी। कठोर तपस्या से उसने ब्रह्मा से अपार बल का वरदान पाया, इन्द्र सहित देवताओं को हराया, और कामरूप के शिवभक्त राजा सुदक्षिण पर आक्रमण कर उन्हें कारागार में डाल दिया।

कारागार में भी राजा सुदक्षिण पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करते रहे। यह जानकर भीम ने तलवार से शिवलिंग पर प्रहार करना चाहा, तभी शिव उसी लिंग से प्रकट हुए, उसकी तलवार तोड़ दी और अपनी हुंकार मात्र से भीम को भस्म कर दिया। देवताओं और ऋषियों ने लोक-कल्याण के लिए शिव से वहीं निवास करने की प्रार्थना की, और वे भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं विराज गए।

दूसरी परम्परा, जिसे मन्दिर ट्रस्ट भी बताता है, इस धाम को त्रिपुरासुर से जोड़ती है। तपस्या से वरदान पाकर त्रिपुरासुर ने तीन अजेय नगर बसाए और तीनों लोकों को त्रस्त कर दिया। देवताओं के आग्रह पर शिव ने सह्याद्रि की इसी चोटी पर विशाल, भयंकर (भीम) रूप धारण कर उसका संहार किया। कहा जाता है कि युद्ध के बाद शिव के शरीर से बहे पसीने से भीमरथी — भीमा नदी — बनी। कार्तिक पूर्णिमा, जिसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं, इसी विजय का उत्सव है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार कमलजा माता के रूप में पूजी जाने वाली देवी पार्वती ने शिवगणों और शाकिनी-डाकिनी देवियों के साथ इस युद्ध में शिव की सहायता की थी; इनके मन्दिर मुख्य मन्दिर के पास ही हैं। भक्तों का विश्वास है कि सूर्योदय के बाद बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेते हुए यहाँ दर्शन करने से सात जन्मों के पाप मिट जाते हैं।

स्थापत्य कला

भीमाशंकर मन्दिर मुख्यतः काले बेसाल्ट पत्थर से बना है। इसका मूल ढाँचा दक्कन की हेमाडपन्ती शैली का है, जिसमें अठारहवीं शताब्दी के मराठा संरक्षकों के समय उत्तर भारतीय नागर शैली का प्रभाव जुड़ा। ट्रस्ट के अनुसार पत्थरों को चूने के गारे के बिना जोड़ा गया है, जो हेमाडपन्ती निर्माण की पहचान है। गर्भगृह सामने के मण्डप से नीचे है, इसलिए भक्त सीढ़ियाँ उतरकर ज्योतिर्लिंग तक पहुँचते हैं; इसके ऊपर का शिखर भीतर से खोखला बताया जाता है।

स्वयम्भू शिवलिंग गर्भगृह के ठीक बीच में है। ट्रस्ट के अनुसार यह लगभग 75 सेंटीमीटर चौड़ा और 100 सेंटीमीटर लम्बा है और इसके बीच से एक खड़ी दरार गुज़रती है। पुराने भाग के स्तम्भों और द्वार-चौखटों पर देवताओं, मानव आकृतियों और बेल-बूटों की बारीक नक़्क़ाशी है। गर्भगृह के सामने नन्दी विराजमान हैं, और परिसर में गणपति, कालभैरव और शनिदेव के मन्दिर भी हैं; चिमाजी अप्पा का विशाल घण्टा शनि मन्दिर के पास दो स्तम्भों के बीच टँगा है।

गर्भगृह के सामने का सभामण्डप कई बार बना है — हाल में 2026 में फिर इसका नया निर्माण शुरू हुआ। मन्दिर के पीछे ऋषि कौशिक से जुड़ा मोक्षकुण्ड तीर्थ है, और पास ही दत्तात्रेय द्वारा बनाया माना जाने वाला ज्ञानकुण्ड तथा सर्वतीर्थ हैं। दक्षिण में कुशारण्य तीर्थ है, जहाँ से भीमा नदी पूर्व की ओर बहना शुरू करती है। मन्दिर के पीछे से एक रास्ता नदी और जंगल में स्थित गुप्त भीमाशंकर तक जाता है।

दैनिक पूजा-अर्चना

  • काकड़ (प्रातः) आरती

    सुबह 5:00–5:30

    मन्दिर सुबह 5 बजे खुलता है और दिन की शुरुआत ज्योतिर्लिंग की प्रातः आरती से होती है।

  • दर्शन और अभिषेक

    सुबह 5:30–दोपहर 12:00; दोपहर 12:20–2:45

    भक्त दर्शन करते हैं और जल, दूध व बेलपत्र से अभिषेक कर सकते हैं। विशेष अभिषेक और पूजा ट्रस्ट के माध्यम से कराई जा सकती है।

  • नैवेद्य (भोग) पूजा

    दोपहर 12:00–12:20

    दोपहर में भगवान को नैवेद्य अर्पित किया जाता है; इस दौरान दर्शन कुछ देर रुकते हैं।

  • मध्याह्न आरती

    दोपहर 2:45–3:20

    दोपहर की आरती, जिसके बाद शाम तक दर्शन चलते रहते हैं।

  • सायं आरती

    शाम 7:30–8:00

    शाम की आरती, जिसके बाद रात 9:30 बजे मन्दिर बन्द होने तक दर्शन होते हैं।

  • मोक्षकुण्ड में स्नान

    परम्परा के अनुसार बहुत-से यात्री दर्शन से पहले मन्दिर के पीछे मोक्षकुण्ड तीर्थ में स्नान करते हैं या उसका जल छिड़कते हैं।

समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।

पर्व-उत्सव

फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)

महाशिवरात्रि

भीमाशंकर का सबसे बड़ा पर्व, जब रात भर पूजा होती है। एसटी (एमएसआरटीसी) विशेष बसें चलाती है, और भीड़ की सुरक्षा के लिए प्रशासन कभी-कभी प्रवेश सीमित करता है — यात्रा से पहले व्यवस्था देख लें।

कार्तिक (अक्टूबर–नवम्बर)

कार्तिक (त्रिपुरी) पूर्णिमा

मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार इस दिन त्रिपुरासुर पर शिव की विजय की स्मृति में भव्य उत्सव होता है — यही भीमाशंकर की कथा का मूल प्रसंग है।

श्रावण (जुलाई–अगस्त)

श्रावण सोमवार

सावन के हर सोमवार को हरे-भरे सह्याद्रि में भारी भीड़ उमड़ती है; इस महीने ट्रस्ट प्रायः दर्शन का समय बढ़ा देता है।

हर चान्द्र मास

मासिक शिवरात्रि

हर महीने की शिवरात्रि (कृष्ण चतुर्दशी) को भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं और अक्सर विशेष बसें चलती हैं।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग
निकटतम हवाई अड्डा पुणे अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लोहगाँव) है, जो सड़क मार्ग से लगभग 110–120 किलोमीटर (3–4 घंटे) दूर है।
रेल मार्ग
सबसे सुविधाजनक रेलवे स्टेशन पुणे जंक्शन है, जो सड़क से लगभग 110 किलोमीटर दूर है। मुम्बई की ओर से आने वाले ट्रेकर कर्जत या नेरल स्टेशन से खांडस गाँव पहुँचते हैं, जहाँ से जंगल की खड़ी पगडण्डियाँ मन्दिर तक जाती हैं।
सड़क मार्ग
पुणे से सड़क राजगुरुनगर (खेड़), मंचर और घोड़ेगाँव होते हुए घाटों पर चढ़कर भीमाशंकर पहुँचती है। पुणे के शिवाजीनगर से एसटी बसें चलती हैं, जिनमें लगभग 4–5 घंटे लगते हैं। निजी वाहन मन्दिर के ऊपर बने पार्किंग में रुकते हैं, जहाँ से सीढ़ियाँ उतरकर मन्दिर पहुँचते हैं।
दर्शन का सबसे अच्छा समय
मन्दिर पूरे वर्ष खुला रहता है। अगस्त से फ़रवरी का समय सबसे अच्छा माना जाता है — बारिश के बाद जंगल हरे-भरे रहते हैं और मौसम ठण्डा होता है। भारी मानसून (जून–जुलाई) में तेज़ बारिश, कोहरा और फिसलन रहती है, इसलिए ट्रेकिंग से बचें; गर्मियों की दोपहर गरम हो सकती है। महाशिवरात्रि और श्रावण सोमवार को सबसे अधिक भीड़ होती है।

तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव

  • जाने से पहले shreebhimashankar.com देख लें — 2026 में निर्माण कार्य के दौरान ट्रस्ट और पुणे ज़िला प्रशासन ने दर्शन का समय सीमित किया था और ऑनलाइन पास अनिवार्य किया था; ऐसी व्यवस्था फिर लागू हो सकती है।
  • स्थानीय परम्परा के अनुसार दर्शन से पहले मन्दिर के पीछे मोक्षकुण्ड में स्नान करें या उसका जल छिड़कें।
  • भीमाशंकर वन्यजीव अभयारण्य के भीतर है — तय रास्तों पर ही चलें, अपना कचरा वापस ले जाएँ और बन्दरों या अन्य जानवरों को खाना न खिलाएँ।
  • घाट अक्सर गीले और धुँध से ढके रहते हैं; अच्छी पकड़ वाले जूते पहनें। खांडस वाले रास्तों से ट्रेक करने वाले अनुभवी समूह के साथ जाएँ और भारी बारिश में इनसे बचें।
  • गुप्त भीमाशंकर, कमलजा माता मन्दिर, चिमाजी अप्पा का घण्टा और नागफणी व बॉम्बे पॉइंट जैसे दृश्य-स्थलों के लिए भी समय रखें।
  • महाशिवरात्रि और श्रावण सोमवार को बहुत भीड़ होती है — जल्दी निकलें और वाहन व ठहरने की व्यवस्था पहले से कर लें।

इस यात्रा के लिए साथ रखें

Amazon Associate के रूप में मेरी श्रद्धा योग्य ख़रीद पर कमीशन पाती है। इससे आपको कोई अतिरिक्त ख़र्च नहीं होता और यह ज्ञान-कोष निःशुल्क बना रहता है।

श्रद्धालुओं के प्रश्न

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?

शिव पुराण के अनुसार कुम्भकर्ण के पुत्र राक्षस भीम ने शिवभक्त राजा सुदक्षिण को बन्दी बनाया और उनके पूजित शिवलिंग पर प्रहार करना चाहा। तब शिव प्रकट हुए, भीम को भस्म किया और यहीं ज्योतिर्लिंग रूप में विराज गए। एक अन्य परम्परा इसे त्रिपुरासुर पर शिव की विजय से जोड़ती है, जिनके पसीने से भीमा नदी बनी।

भीमाशंकर मन्दिर के दर्शन का समय क्या है?

मन्दिर ट्रस्ट के अनुसार सामान्यतः मन्दिर सुबह 5 बजे आरती के साथ खुलता है और रात 9:30 बजे बन्द होता है; दोपहर 12 बजे नैवेद्य, 2:45 बजे मध्याह्न आरती और शाम 7:30 बजे सायं आरती होती है। 2026 के निर्माण कार्य के दौरान समय सीमित रहा, इसलिए जाने से पहले ट्रस्ट की वेबसाइट देखें।

पुणे से भीमाशंकर कैसे पहुँचें?

भीमाशंकर पुणे से राजगुरुनगर, मंचर और घोड़ेगाँव होते हुए लगभग 110 किलोमीटर दूर है। शिवाजीनगर से एसटी बसों में 4–5 घंटे लगते हैं; अपनी गाड़ी या टैक्सी से भी जा सकते हैं। निकटतम हवाई अड्डा और मुख्य रेलवे स्टेशन पुणे में हैं।

भीमाशंकर जाने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

अगस्त से फ़रवरी सबसे उपयुक्त है, जब जंगल हरे-भरे और मौसम सुहाना रहता है। ट्रेकिंग करनी हो तो भारी मानसून से बचें, और महाशिवरात्रि व श्रावण सोमवार को भारी भीड़ के लिए तैयार रहें।

क्या महाराष्ट्र का भीमाशंकर ही असली ज्योतिर्लिंग है?

पारम्परिक श्लोक में 'डाकिन्यां भीमशंकरम्' कहा गया है, और असम व उत्तराखण्ड के कुछ स्थान भी यह नाम होने का दावा करते हैं। फिर भी पुणे के पास सह्याद्रि का यह मन्दिर, जो भीमा नदी के उद्गम से जुड़ा है, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में सबसे व्यापक रूप से पूजा जाता है।

स्रोत

द्वादश ज्योतिर्लिंग