श्री भ्रमरांबा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर, श्रीशैलम
जहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ एक साथ विराजते हैं – कृष्णा तट पर नल्लमला के वनों के बीच श्रीशैल पर्वत।
आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में स्थित मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसी परिसर में माता भ्रमरांबा विराजती हैं, जिनका स्थान महाशक्तिपीठों में गिना जाता है। तमिल शैव संतों ने भी इसकी स्तुति गाई है, इसलिए यह शैव और शाक्त, दोनों परंपराओं के भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र है।

इतिहास
श्रीशैलम भारत के उन सबसे पुराने शैव तीर्थों में है जहाँ पूजा की परंपरा कभी नहीं टूटी। अभिलेखों, साहित्य और पुराणों में इस पर्वत के कई नाम मिलते हैं – श्रीपर्वत, श्रीगिरि, श्रीशैल और श्रीशैल मल्लिकार्जुनम्। स्कंद पुराण का पूरा एक भाग 'श्रीशैल खंड' इसी तीर्थ पर है, और तमिल शैव संतों ने तेवारम में इसकी स्तुति गाई है, इसलिए यह पाडल पेट्र स्थलों में गिना जाता है।
इतिहास में इसका सबसे पुराना उल्लेख सातवाहन राजा वासिष्ठीपुत्र पुलुमावि (पहली–दूसरी सदी ई.) के नासिक गुफा अभिलेख में माना जाता है, जिसमें श्रीपर्वत का नाम आता है। मल्लिकार्जुन का गर्भगृह वर्तमान परिसर का सबसे पुराना भाग माना जाता है और प्रायः लगभग 7वीं सदी का बताया जाता है। आगे की सदियों में चालुक्य, काकतीय और दक्कन के अन्य राजवंशों ने मंदिर को दान दिए, और यह पाशुपत तथा बाद में वीरशैव परंपरा का बड़ा केंद्र बना।
तटीय आंध्र के रेड्डी राजा (लगभग 1325–1448) श्री भ्रमरांबा मल्लिकार्जुन के अनन्य भक्त थे। श्रीशैलम तक चढ़ाई और कृष्णा नदी पर पाताल गंगा तक उतरने वाली सीढ़ियों का श्रेय प्रोलय वेम रेड्डी को, और वीरशिरो मंडपम का श्रेय अनवेम रेड्डी को दिया जाता है।
सबसे बड़े निर्माण विजयनगर साम्राज्य के समय हुए। मुखमंडप और दक्षिणी गोपुरम का श्रेय संगम वंश के राजाओं (प्रायः हरिहर द्वितीय) को दिया जाता है, और नक्काशीदार पैनलों वाली बाहरी प्राकार दीवार भी इसी काल की है। नंदी मंडप के एक स्तंभ पर शक संवत 1379 (1457 ई.) का अभिलेख खुदा है। कृष्णदेवराय 1516 में गजपतियों से युद्ध से लौटते हुए श्रीशैलम आए; पूर्वी राजगोपुरम और रथ-वीथी के दोनों ओर के 'सालु मंडप' (स्तंभों वाले दालान) उन्हीं की देन माने जाते हैं।
17वीं सदी में छत्रपति शिवाजी महाराज दक्षिण अभियान के दौरान श्रीशैलम आए। परंपरा के अनुसार उत्तरी गोपुरम उन्होंने बनवाया और मंदिरों की रक्षा के लिए मराठा सैनिकों की एक टुकड़ी यहाँ छोड़ी। यह भी माना जाता है कि आदि शंकराचार्य यहाँ आए और 'शिवानंद लहरी' की रचना की।
आज मंदिर का संचालन आंध्र प्रदेश सरकार के धर्मादाय (एंडोमेंट्स) विभाग के अधीन श्रीशैल देवस्थानम करता है। दिसंबर 2022 में भारत की राष्ट्रपति ने केंद्र की 'प्रसाद' योजना के तहत श्रीशैलम में तीर्थ-सुविधाओं के विकास कार्यों का उद्घाटन किया।
पौराणिक कथा
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा आती है। शिव-पार्वती ने जब पुत्रों के विवाह का विचार किया, तो गणेश जी का विवाह पहले सिद्धि और बुद्धि से हो गया। पृथ्वी की परिक्रमा से लौटे कार्तिकेय यह देखकर आहत हुए और कैलास छोड़कर क्रौंच पर्वत पर कुमार ब्रह्मचारी के रूप में अकेले रहने चले गए। माता-पिता उन्हें मनाने पीछे आए; जब वे और दूर जाने लगे, तो शिव-पार्वती पास ही श्रीशैल पर्वत पर ठहर गए और शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए।
पुराण के अनुसार हर अमावस्या को शिव और हर पूर्णिमा को पार्वती अपने पुत्र से मिलने यहाँ आते हैं। 'मल्लिकार्जुन' नाम के दो अर्थ बताए जाते हैं – 'मल्लिका' यानी पार्वती और 'अर्जुन' यानी शिव, जो यहाँ साथ विराजते हैं; या फिर चमेली (मल्लिका) के फूल, जिनसे लिंग की पूजा होती थी।
श्रीशैलम आदि शंकराचार्य से जोड़े जाने वाले स्तोत्र में गिनाए गए अठारह महाशक्तिपीठों में भी है। दक्ष-यज्ञ के बाद शोकाकुल शिव जब सती का शरीर लेकर घूम रहे थे, तब उनके अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे; एक परंपरा के अनुसार यहाँ सती की ग्रीवा (गर्दन) गिरी। देवी यहाँ भ्रमरांबा यानी 'भ्रमरों (भौंरों) की माता' के रूप में पूजी जाती हैं। भक्त मानते हैं कि उन्होंने भौंरों के झुंड का रूप लेकर अरुणासुर का वध किया था, और उनके मंदिर के पीछे आज भी हल्की गुंजन सुनाई देती है।
सभी ज्योतिर्लिंगों की तरह यह तीर्थ भी शिव पुराण की उस कथा की याद दिलाता है जिसमें शिव ब्रह्मा और विष्णु के सामने अनंत ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। श्रद्धालु यह भी मानते हैं कि श्रीशैलम के रास्ते में शिखरेश्वरम के दर्शन से पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है, और नगर के पास साक्षी गणपति हर यात्री की हाज़िरी दर्ज करते हैं।
स्थापत्य कला
मंदिर पूर्वमुखी है और लगभग दो हेक्टेयर के परिसर में है, जिसे लगभग 183 मीटर लंबी, 152 मीटर चौड़ी और करीब 8.5 मीटर ऊँची पत्थर की दीवारें घेरती हैं। चारों दिशाओं में एक-एक, कुल चार गोपुरम परिसर में प्रवेश कराते हैं। शैली दक्षिण भारत की द्रविड़ परंपरा की है, जिसमें विजयनगर काल की छाप साफ़ दिखती है। अनेक देवालयों में मल्लिकार्जुन और भ्रमरांबा के मंदिर सबसे प्रमुख हैं; भ्रमरांबा का मंदिर मल्लिकार्जुन मंदिर के पश्चिम में कुछ ऊँचाई पर है।
सबसे पुराना भाग, मल्लिकार्जुन का गर्भगृह, छोटा और सादा है – इसी कारण भीड़ के दिनों में लंबी कतारें लगती हैं। गर्भगृह की ओर ले जाने वाले मुखमंडप के स्तंभों पर बारीक नक्काशी है, और नंदी मंडप में नंदी की विशाल प्रतिमा है। पहले प्राकार के दर्पण-मंडप में नटराज की छवियाँ हैं।
बाहरी प्राकार दीवार श्रीशैलम की सबसे अनोखी विशेषताओं में है। इसकी पंक्तिबद्ध पट्टियों पर रामायण और महाभारत के प्रसंग, शिव के अनेक रूप और लीलाएँ, शैव संत, शिकार के दृश्य, पशु और शोभायात्राएँ उकेरी गई हैं, जिनसे मध्यकालीन शैव जीवन की जीवंत झलक मिलती है।
परिसर में सहस्र लिंग (एक हज़ार छोटे लिंगों वाला लिंग) भी है, जिसकी स्थापना परंपरा के अनुसार श्रीराम ने की, साथ ही पांडवों द्वारा स्थापित माने जाने वाले पाँच लिंग और वीरशिरो मंडपम भी हैं। परिसर के बाहर रेड्डी काल की लंबी सीढ़ियाँ पहाड़ी से उतरकर कृष्णा नदी पर पाताल गंगा तक जाती हैं।
दैनिक पूजा-अर्चना
अलंकार दर्शन
सुबह 4:30–7:30, 9:30–11:45, दोपहर 1:30–4:00, शाम 5:30–8:30श्रृंगारित (अलंकार) विग्रह के सामान्य दर्शन, जिसमें लिंग को स्पर्श नहीं किया जाता। ये समय दिसंबर 2024 की डेक्कन क्रॉनिकल रिपोर्ट के अनुसार हैं; देवस्थानम से पुष्टि कर लें।
स्पर्श दर्शन
सुबह 7:30–9:30, दोपहर 11:45–1:30, रात 8:30–10:00श्रीशैलम उन गिने-चुने ज्योतिर्लिंगों में है जहाँ टिकट वाले स्पर्श दर्शन में भक्त लिंग को छू सकते हैं; बुकिंग ऑनलाइन होती है। अगस्त 2026 से शनिवार, रविवार और सोमवार को यह केवल रात के स्लॉट में मिलता है।
आलय शुद्धि
शाम 4:00–5:30मंदिर की रोज़ की शुद्धि, जिस दौरान सामान्य दर्शन रुके रहते हैं।
अभिषेकम और कुंकुमार्चना
मल्लिकार्जुन का रुद्राभिषेक और भ्रमरांबा की कुंकुमार्चना देवस्थानम के माध्यम से सेवा के रूप में बुक की जा सकती है।
पाताल गंगा स्नान
मंदिर के नीचे लंबी सीढ़ियों (या रोपवे) से पहुँचकर कृष्णा नदी में पाताल गंगा पर स्नान पारंपरिक यात्रा का हिस्सा है।
शिखरेश्वरम और साक्षी गणपति दर्शन
कई यात्री पहाड़ी के सबसे ऊँचे स्थान शिखरेश्वरम और साक्षी गणपति के दर्शन करते हैं, जो मान्यता के अनुसार हर यात्री की हाज़िरी दर्ज करते हैं।
समय ऋतु और पर्वों के अनुसार बदलता है। यात्रा से पहले मंदिर ट्रस्ट से पुष्टि अवश्य करें।
पर्व-उत्सव
फाल्गुन (फ़रवरी–मार्च)
महाशिवरात्रि ब्रह्मोत्सवम
मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव – ग्यारह दिन का ब्रह्मोत्सवम, जिसमें शोभायात्राएँ, मल्लिकार्जुन-भ्रमरांबा का कल्याणम (दिव्य विवाह) और भारी भीड़ होती है; दर्शन अक्सर सीमित रहते हैं।
चैत्र (मार्च–अप्रैल)
उगादि महोत्सव
तेलुगु-कन्नड़ नववर्ष पर कर्नाटक और महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में भक्त पैदल श्रीशैलम आते हैं; वे भ्रमरांबा को अपनी धरती की बेटी मानते हैं।
आश्विन (सितंबर–अक्टूबर)
दशहरा नवरात्रि
माता भ्रमरांबा की नौ रातों की विशेष आराधना, जिसमें हर दिन देवी का अलग रूप में श्रृंगार होता है।
कार्तिक (अक्टूबर–नवंबर)
कार्तिक मास
शिव का पवित्र महीना, विशेषकर इसके सोमवार, जब दीप जलाए जाते हैं और बड़ी संख्या में सेवाएँ होती हैं।
कैसे पहुँचें
- हवाई मार्ग
- हैदराबाद का राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा सबसे सुविधाजनक है, जो सड़क से लगभग 200–220 किमी (करीब 4–5 घंटे) दूर है। कर्नूल हवाई अड्डा लगभग 180 किमी दूर है।
- रेल मार्ग
- निकटतम रेलवे स्टेशन मार्कापुर रोड है, जो लगभग 85 किमी (सड़क से 2 से 2.5 घंटे) दूर है। तर्लुपाडु और गिद्दलूर (लगभग 139 किमी) भी विकल्प हैं; ट्रेन से आने वाले अधिकतर यात्री हैदराबाद, कर्नूल या मार्कापुर होकर आते हैं।
- सड़क मार्ग
- श्रीशैलम हैदराबाद से लगभग 213 किमी और कर्नूल से लगभग 180 किमी दूर है; APSRTC और TGSRTC की बसें और टैक्सियाँ नियमित चलती हैं। रास्ता नल्लमला के टाइगर रिज़र्व से होकर जाता है, जहाँ रात लगभग 9 से सुबह 6 बजे तक वाहनों की आवाजाही बंद रहती है।
- दर्शन का सबसे अच्छा समय
- पहाड़ी यात्रा और पाताल गंगा की सीढ़ियों के लिए अक्टूबर से फ़रवरी सबसे आरामदायक है। सोमवार को छोड़कर बाकी कार्यदिवसों में भीड़ कम रहती है। महाशिवरात्रि, उगादि और नवरात्रि का विशेष महत्व है, पर इन दिनों भारी भीड़ और सीमित दर्शन रहते हैं।
तीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
- स्पर्श दर्शन और सेवाओं की बुकिंग केवल श्रीशैल देवस्थानम की आधिकारिक वेबसाइट से करें; टिकट ऑनलाइन मिलते हैं और भीड़ के हिसाब से स्लॉट बदलते रहते हैं।
- नल्लमला जंगल रात लगभग 9 बजे से पहले पार कर लें, क्योंकि रात में वन चौकियाँ सड़क बंद कर देती हैं।
- स्पर्श दर्शन और सेवाओं के लिए पारंपरिक वेश अपेक्षित है (पुरुषों के लिए धोती या कुर्ता-पायजामा, महिलाओं के लिए साड़ी या दुपट्टे के साथ सलवार); काउंटर पर ताज़ा नियम पूछ लें।
- सप्ताहांत, सोमवार और पर्वों पर छोटे गर्भगृह के कारण लंबा इंतज़ार करना पड़ता है; कार्यदिवसों की सुबह अपेक्षाकृत शांत रहती है।
- दर्शन के साथ पाताल गंगा (सीढ़ियाँ या रोपवे), शिखरेश्वरम, साक्षी गणपति और श्रीशैलम बाँध का व्यू-पॉइंट भी देखें।
- यह पहाड़ी टाइगर रिज़र्व का हिस्सा है – पानी साथ रखें, कचरा न फैलाएँ और वन नियमों का पालन करें।
इस यात्रा के लिए साथ रखें
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- रुद्राक्ष माला (108+1 मनके)शिव मंत्रों और महामृत्युंजय जाप की पारंपरिक माला।Amazon पर दाम देखें
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श्रद्धालुओं के प्रश्न
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कथा क्या है?
शिव पुराण के अनुसार गणेश जी का विवाह पहले होने से आहत कार्तिकेय कैलास छोड़कर क्रौंच पर्वत चले गए। उनके पास रहने के लिए शिव-पार्वती श्रीशैल पर्वत पर ठहर गए, जहाँ शिव मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए।
श्रीशैलम मंदिर में दर्शन का समय क्या है?
रिपोर्टों के अनुसार अलंकार दर्शन सुबह 4:30–7:30, 9:30–11:45, दोपहर 1:30–4:00 और शाम 5:30–8:30 के स्लॉट में होते हैं, और शाम 4 से 5:30 बजे आलय शुद्धि होती है। स्पर्श दर्शन ऑनलाइन बुक होते हैं। समय अक्सर बदलते हैं, इसलिए देवस्थानम से पुष्टि करें।
श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों क्यों है?
यहाँ भगवान शिव बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, मल्लिकार्जुन के रूप में विराजते हैं, और माता भ्रमरांबा अठारह महाशक्तिपीठों में गिनी जाती हैं – इसलिए एक ही परिसर में दोनों की पूजा होती है।
श्रीशैलम कैसे पहुँचें?
हैदराबाद हवाई अड्डा लगभग 200–220 किमी और मार्कापुर रोड रेलवे स्टेशन लगभग 85 किमी दूर है। हैदराबाद और कर्नूल से बसें-टैक्सियाँ चलती हैं, पर जंगल की सड़क रात लगभग 9 से सुबह 6 बजे तक बंद रहती है।
क्या श्रीशैलम में ज्योतिर्लिंग को स्पर्श कर सकते हैं?
हाँ, टिकट वाले स्पर्श दर्शन में, जिसकी बुकिंग ऑनलाइन होती है। यह हर समय उपलब्ध नहीं होता; अगस्त 2026 से शनिवार, रविवार और सोमवार को केवल रात के स्लॉट में मिलता है।
स्रोत
- https://en.wikipedia.org/wiki/Mallikarjuna_Temple,_Srisailam
- https://hi.wikipedia.org/wiki/श्री_शैलम_देवस्थानम
- https://deccanchronicle.com/news/srisailam-temple-revises-darshan-timing-1845685
- https://www.deccanchronicle.com/southern-states/andhra-pradesh/srisailam-revises-darshan-timings-to-ease-pilgrim-rush-1976246
- https://iasbaba.com/2022/12/srisailam-temple/
- https://anantamias.com/srisailam-mallikarjuna-temple/
- https://www.whatisindia.com/inscriptions/south_indian_inscriptions/volume_9/vijayanagara_452.html
- https://en.wikipedia.org/wiki/Srisailam